विज्ञापन

NEP के 6 साल: क्रेडिट बैंक, 4 साल की डिग्री और 2 बार बोर्ड एग्जाम, कितना बदला देश का एजुकेशन सिस्टम?

NEP 2020 Impact on Indian Education: नेशनल एजुकेशन पॉलिसी (NEP) को 6 साल पूरे हो चुके हैं. इन सालों में एजुकेशन सेक्टर में कई बड़े बदलाव देखे गए, हालांकि अब तक NEP की कई सिफारिशों को लागू करना बाकी है.

NEP के 6 साल: क्रेडिट बैंक, 4 साल की डिग्री और 2 बार बोर्ड एग्जाम, कितना बदला देश का एजुकेशन सिस्टम?
NEP लागू होने के बाद से कितना बदला देश का एजुकेशन सिस्टम?

NEP Explainer: नेशनल एजुकेशन पॉलिसी (NEP) 2020 को मंजूरी मिले छह साल बीत चुके हैं. इस पॉलिसी के लागू होने के बाद से भारतीय शिक्षा व्यवस्था में कई जरूरी बदलाव हुए. प्री-स्कूल एजुकेशन अब औपचारिक स्कूली शिक्षा का हिस्सा बन चुकी है, छात्र यूनिवर्सिटीज के बीच अपने क्रेडिट ट्रांसफर कर सकते हैं, विदेशी यूनिवर्सिटीज ने भारत में अपने कैंपस खोलने शुरू कर दिए हैं और भारतीय संस्थानों का विदेशों में विस्तार हुआ है. हालांकि इस सबके बावजूद अब भी कई सुधार बाकी हैं. नेशनल एजुकेशन पॉलिसी से जुड़े इन सुधारों को आगे लागू किया जाएगा. 

कई चीजों पर काम होना बाकी

यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) की जगह लेने के लिए प्रस्तावित नया रेगुलेटर अब तक नहीं बन पाया है, शिक्षक शिक्षा सुधार अधूरे हैं, परीक्षा सुधार बार-बार होने वाले विवादों के चलते ठंडे बस्ते में पड़े हैं, वहीं शिक्षा पर सरकारी खर्च अभी भी पॉलिसी के हिसाब से काफी कम है. 29 जुलाई, 2020 को केंद्रीय कैबिनेट की तरफ से मंजूर की गई NEP ने 1986 की शिक्षा नीति की जगह ली थी. इसने स्कूल और उच्च शिक्षा में पूरी तरह से बदलाव का वादा किया था. छह साल बाद, इसे लागू करने की तस्वीर मिली-जुली नजर आती है.

इन चीजों में हुआ सुधार 

पुराने 10+2 सिस्टम की जगह अब 5+3+3+4 मॉडल आ गया है, जिसने तीन से आठ साल के बच्चों को औपचारिक रूप से शिक्षा प्रणाली में शामिल किया है. अधिकांश राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने पहली कक्षा में प्रवेश की न्यूनतम उम्र भी पांच साल से बढ़ाकर छह साल कर दी है. इस नए मॉडल को सपोर्ट करने के लिए, केंद्र सरकार ने छोटे बच्चों के लिए 'जादूई पिटारा' लर्निंग किट पेश की और आंगनवाड़ियों व प्री-स्कूलों के लिए नेशनल अर्ली चाइल्डहुड केयर एंड एजुकेशन फ्रेमवर्क लागू किया. सरकार ने आंगनवाड़ी केंद्रों को नजदीकी प्राथमिक स्कूलों के साथ जोड़ने को बढ़ावा दिया है, हालांकि फ्रंटलाइन वर्कर्स को ट्रेनिंग देना अभी भी एक चुनौती बना हुआ है.

सिलेबस में भी हो रहा बदलाव

पाठ्यक्रम (Curriculum) भी बदलने लगा है. NCERT ने पहली से नौवीं कक्षा के लिए नई किताबें जारी कर दी हैं, जबकि सीनियर सेकेंडरी कक्षाओं के लिए अपडेटेड किताबें जल्द आने की उम्मीद है.  

'द इंडियन स्कूल' की प्रिंसिपल तानिया जोशी ने NDTV को बताया कि NEP ने शिक्षण और सीखने दोनों में एक बुनियादी बदलाव लाया है. उन्होंने कहा, "ये क्लासेस को रटने की आदत के बजाय योग्यता-आधारित, व्यावहारिक और पूछताछ-संचालित शिक्षण की ओर ले जाता है. यहां छात्रों को वास्तविक जीवन की स्थितियों में चीजों को समझने, सवाल पूछने और लागू करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है. इसके साथ ही, यह बुनियादी साक्षरता, बहुभाषावाद, समावेशी कक्षाओं और हर बच्चे के समग्र विकास पर जोर देता है." 

हायर एजुकेशन में बड़ा बदलाव 

अकादमिक बैंक ऑफ क्रेडिट्स (ABC) और नेशनल क्रेडिट फ्रेमवर्क अब छात्रों को अलग-अलग संस्थानों में क्रेडिट जमा करने और पढ़ाई के बीच में ब्रेक लेने के बाद भी बिना समय गंवाए दोबारा पढ़ाई शुरू करने की अनुमति देते हैं. ज्यादातर केंद्रीय विश्वविद्यालयों में अंडरग्रेजुएट प्रोग्राम्स में 'मल्टीपल एंट्री और एग्जिट' विकल्प एक वास्तविकता बन गए हैं, जिसने दशकों से चले आ रहे rigid डिग्री ढांचे को बदल दिया है. 

विदेशों में भारतीय यूनिवर्सिटीज के कैंपस

भारतीय शिक्षा को इंटरनेशनल बनाना भी NEP का एक मुख्य उद्देश्य था, उसने भी अब रफ्तार पकड़ ली है. IIT मद्रास ने जांजीबार में, IIT दिल्ली ने अबू धाबी में, और IIM अहमदाबाद ने दुबई में अपना कैंपस खोला है. IIT बॉम्बे ने जापान में कैंपस खोलने का ऐलान किया है. इसके अलावा भारत ने भी विदेशी यूनिवर्सिटीज को अपने कैंपस खोलने की इजाजत देनी शुरू कर दी है. UGC से 5 संस्थानों को मंजूरी मिल चुकी है, जिनमें से यूनिवर्सिटी ऑफ साउथेम्प्टन ने छात्रों को एडमिशन देना शुरू भी कर दिया है.

IIT डायरेक्टर ने बताया क्या है जरूरी

IIT गांधीनगर के डायरेक्टर रजत मूना का मानना है कि नई पॉलिसी को लागू करने की रफ्तार जरूर बढ़ी है, लेकिन कई पहलुओं को तेजी से आगे बढ़ाने की जरूरत है. उन्होंने कहा, "बहुविषयक शिक्षा (Multidisciplinary Education), मल्टीपल एंट्री-एग्जिट और एकेडमिक बैंक ऑफ क्रेडिट्स जैसे सुधारों को अधिकांश संस्थानों ने अपना लिया है. हालांकि, एकेडमिक बैंक ऑफ क्रेडिट्स को पूरी तरह से काम करने में थोड़ा समय लग रहा है और संस्थानों के बीच क्रेडिट का ट्रांसफर अभी भी एक चुनौती है. स्कूल स्तर पर बहुभाषी शिक्षा और उच्च शिक्षा में कई भाषाओं में परीक्षा आयोजित करने में भी तेजी की जरूरत है."

मिरांडा हाउस (दिल्ली यूनिवर्सिटी) की प्रिंसिपल बिजयालक्ष्मी नंदा ने भी इससे सहमति जताई. उन्होंने कहा कि NEP को यूनिवर्सिटी स्तर पर प्रभावी ढंग से लागू किया गया है. हालांकि, उन्होंने स्वीकार किया कि "अभी कई चुनौतियां हैं, जैसे कि छात्र-शिक्षक अनुपात को मजबूत करना और बुनियादी ढांचे में सुधार करना, लेकिन शैक्षणिक संस्थानों ने नीति को सही भावना के साथ अपनाया है.

APAAR ID से डिजिटल पहचान

नई शिक्षा नीति के तहत सबसे तेजी से आगे बढ़ने वाली पहलों में सरकार का डिजिटल अकादमिक पहचान सिस्टम APAAR रहा है. 20 करोड़ से ज्यादा छात्रों को APAAR ID जारी की जा चुकी है, जिससे एक ऐसा डिजिटल अकादमिक रिकॉर्ड तैयार हो रहा है, जो छात्र की पूरी शैक्षणिक यात्रा के दौरान उसके साथ रहेगा. प्रो. मूना ने बताया कि लगभग 80% छात्रों के पास अब APAAR ID है और अधिकांश संस्थानों ने क्रेडिट जमा करना शुरू कर दिया है.

हालांकि, इस रोलआउट से प्राइवेसी और डेटा सिक्योरिटी को लेकर चिंताएं पैदा हुई हैं. अभिभावकों ने सुप्रीम कोर्ट में इस कार्यक्रम को चुनौती दी है और तर्क दिया है कि बच्चों के पर्सनल डेटा को इकट्ठा करने और सुरक्षित रखने के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपायों की कमी है. सुनवाई के दौरान, अदालत ने संकेत दिया कि माता-पिता के पास APAAR ID बनाने के लिए सहमति न देने का विकल्प होना चाहिए.

सीखने के स्तर में हो रहा सुधार

सीखने के स्तर में सुधार दिख रहा है, लेकिन पूरी तरह से भरपाई नहीं हुई है. पॉलिसी के प्राथमिक लक्ष्यों में से एक बुनियादी साक्षरता और संख्याज्ञान को मजबूत करना था. इसे हासिल करने के लिए, केंद्र सरकार ने 2021 में निपुण भारत (NIPUN Bharat) मिशन शुरू किया. करीब 21 लाख छात्रों के बीच आयोजित PARAKH राष्ट्रीय सर्वेक्षण (2024) से पता चला कि 2021 की तुलना में सीखने के स्तर में सुधार हुआ है. कक्षा 3 के छात्रों ने भाषा में औसतन 64% और गणित में 60% अंक दर्ज किए. हालांकि, दोनों आंकड़े 2017 के राष्ट्रीय मूल्यांकन में दर्ज स्तरों से नीचे हैं, जिससे पता चलता है कि कोरोना महामारी के कारण हुए पढ़ाई के नुकसान की पूरी भरपाई अभी तक नहीं हो पाई है.

क्या-क्या बदलाव दिख रहे हैं?

  • इस साल CBSE ने कक्षा 10 की बोर्ड परीक्षाएं साल में दो बार आयोजित करने की शुरुआत की. 
  • PARAKH ने ऐसे रिपोर्ट कार्ड डिजाइन किए हैं जो अकादमिक प्रदर्शन के साथ-साथ संचार, रचनात्मकता और सहयोग का आकलन करते हैं. 
  • कक्षा 5 तक बच्चों को उनकी मातृभाषा में पढ़ाने की सिफारिश 
  • थ्री लैंग्वेज पॉलिसी को लागू करना, हालांकि इसे लेकर विवाद अब भी जारी है. 
  • 4-साल के UG प्रोग्राम को केंद्रीय विश्वविद्यालयों ने इसे बड़े पैमाने पर अपनाया है, लेकिन कई राज्य अभी भी शिक्षकों की कमी और बुनियादी ढांचे की बाधाओं का हवाला देते हैं.
  • इंटीग्रेटेड टीचर एजुकेशन प्रोग्राम (ITEP) का विस्तार हुआ है और ये 2030 से शिक्षक भर्ती के लिए न्यूनतम योग्यता बन जाएगा. 

NEP के जरूरी सुधार होना अभी बाकी

NEP के कुछ सबसे महत्वाकांक्षी प्रस्ताव कागजों पर ही बने हुए हैं. दिल्ली यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर आभा देव हबीब ने इस पर कहा, "NEP को मुख्य रूप से ऊपर से थोपे गए दृष्टिकोण से लागू किया गया है, जिसमें टीचर्स और यूनिवर्सटीज के साथ परामर्श की बहुत कम गुंजाइश है." 

इसके अलावा UGC, AICTE और NCTE को हटाकर एक एकल उच्च शिक्षा रेगुलेटर बनाने की योजना बार-बार टलती रही है. प्रस्तावित हायर एजुकेशन कमीशन ऑफ इंडिया (HECI) को संसद में पेश किया गया था, लेकिन शक्तियों के केंद्रीकरण की चिंताओं के बाद इसे संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास भेज दिया गया था. साथ ही मिड-डे मील योजना के साथ नाश्ता देने का प्रस्ताव वित्त मंत्रालय के 2021 में समर्थन देने से इनकार करने के बाद से ठंडे बस्ते में है.

परीक्षाओं में गड़बड़ी सबसे बड़ी चुनौती

भले ही नेशनल एजुकेशन पॉलिसी के तहत कई तरह के काम हो रहे हों, लेकिन सरकारी और एंट्रेंस एग्जाम में सब चीजें पूरी तरह से ठीक करना सबसे बड़ी चुनौती है. NEP का मकसद रटने की आदत से हटकर स्किल बेस्ड आकलन की ओर बढ़ना था, लेकिन पिछले दो साल बार-बार विवादों से भरे रहे हैं. CUET में तकनीकी गड़बड़ियों और बाकी चीजों को लेकर आलोचनाओं का सामना करना पड़ा है. वहीं  NEET-UG 2024 के पेपर लीक ने परीक्षा प्रणाली में विश्वास को भारी नुकसान पहुंचाया, इसी की वजह से देश में बड़ा छात्र प्रदर्शन हुआ और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा.

इसके अलावा CBSE की 12वीं की बोर्ड परीक्षाओं के लिए ऑन-स्क्रीन डिजिटल चेकिंग को लेकर भी खूब विवाद हुआ. करीब 99 लाख आंसर शीट्स के डिजिटल मूल्यांकन के बाद छात्रों और शिक्षकों ने धुंधली स्कैन की गई शीट, तकनीकी गड़बड़ियों, और गलत मार्किंग की शिकायतें कीं.

फंड की कमी भी बड़ा मुद्दा 

एक्सपर्ट्स का कहना है कि सबसे बड़ा अधूरा एजेंडा फंडिंग का बना हुआ है. प्रो. आभा देव ने कहा, "सुधारों को पर्याप्त सार्वजनिक निवेश का समर्थन नहीं मिला है. यूनवर्सिटीज से फैकल्टी या बुनियादी ढांचे के लिए अतिरिक्त अनुदान दिए बिना नए कार्यक्रम शुरू करने को कहा जा रहा है, जिससे कई संस्थान सेल्फ फाइनेंस्ड सिलेबस और ज्यादा फीस पर निर्भर हो रहे हैं." हालांकि, प्रो. मूना का तर्क है कि, शिक्षा में निवेश बढ़ाने की गुंजाइश हमेशा रहती है, लेकिन फंडिंग ठीक-ठाक रही है. फिर भी, उच्च शिक्षा अभी आत्म-निर्भर नहीं है. उदाहरण के लिए IIT की फीस 2009 के बाद से नहीं बदली गई है. 

NEP ने शिक्षा पर सार्वजनिक व्यय को भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 6% तक बढ़ाने के दीर्घकालिक लक्ष्य को दोहराया था. छह साल बाद भी, केंद्र और राज्यों का कुल मिलाकर खर्च GDP के लगभग 4.1% के आसपास ही अटका हुआ है. जब तक ये गैप कम नहीं होता, तब तक शिक्षक भर्ती, इंफ्रास्ट्रक्चर से लेकर पाठ्यक्रम सुधार तक की कई अधूरी योजनाएं अनुमान से धीमी गति से ही आगे बढ़ती रहेंगी.

ये भी पढ़ें - ऑनलाइन और डिस्टेंस लर्निंग से 1 साल के PG कोर्स की मंजूरी, UGC ने बताया किसे मिलेगा एडमिशन

पूरी स्टोरी पढ़ें

NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं

फॉलो करे:
Nep 2020 Impact On Schools, Nep 2020 Impact On Higher Education, National Education Policy, National Education Policy India
Listen to the latest songs, only on JioSaavn.com