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'न पैसों का मोह, न प्रसिद्धि की लालसा', बस इसी "मंत्र'" पर चले शमी, मेंटर ने बताई पेसर की 'अनटोल्ड स्टोरी'

मोहम्मद शमी और उनके परिवार ने शुरुआती दिनों में वह फैसला लिया, जो उनके करियर का सबसे बड़ा टर्निंग प्वाइंट बन गया

'न पैसों का मोह, न प्रसिद्धि की लालसा', बस इसी "मंत्र'" पर चले शमी, मेंटर ने बताई पेसर की 'अनटोल्ड स्टोरी'

सिर्फ मोहम्मद शमी के साथ ही नहीं, बल्कि उनके मूल राज्य उत्तर प्रदेश के क्रिकेट कर्ता-धर्ताओं ने बहुत खिलाड़ियों के साथ ऐसा किया है! करीब साल 2005 के आस-पास शमी अमरोहा जिले से अंडर-19 टीम के ट्रायल के लिए कानपुर गए थे. बेहतरीन गेंदबाजी, सभी की वाहवाही लेकिन इसके बावजूद टीम से उनका नाम गायब था. साल 2006 में भी शमी के साथ 3 दिन करीब 1600 खिलाड़ियों की भागीदारी के बीच चयन प्रक्रिया में ऐसा हुआ. और जब दिल टूटा, तो शमी के भाई और कोच बदरुद्दीन ने मिलकर बड़ा फैसला लेते हुए शमी को कोलकाता भेजने का निर्णय लिया. और  शमी और उनके परिवार का यही फैसला उनकी जिंदगी का सबसे बड़ टर्निंग प्वाइंट बन गया क्योंकि कोलकाता का रुख करने के कुछ साल बाद शमी बंगाल के लिए रणजी ट्रॉफी ही नहीं खेले, बल्कि यहां से उनका शुरू हुई यात्रा ने उन्हें भारतीय क्रिकेट इतिहास के सबसे बेहतरीन बॉलरों में शुमार करा दिया. 

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चयनकर्ता का भाई को चौंकाने वाला जवाब

जब मोहम्मद शमी के भाई ने उस समय के उत्तर प्रदेश अंडर-19 टीम के चीफ सेलेक्टर से पूछा कि उनका भाई हर राउंड में बेहतरीन गेंदबाजी कर रहा है, लेकिन फिर भी उसका चयन क्यों नहीं हो रहा. तब उस चयनकर्ता ने जवाब दिया- "अगर तुम मेरी कुर्सी हिला सकते हो (मतलब रिश्वत या राजनीतिक सिफारिश ला सकते हो), तो लड़के का चयन हो जाएगा. वरना सॉरी!"

घटना का असर, कोलकाता का रुख

इसके बाद शमी के बड़े भाई ने शमी का ट्रॉयल फॉर्म फाड़ दिया और सेलेक्टर के सामने ही कहा, "अब उनका भाई यूपी के लिए नहीं खेलेगा." इसके बाद शमी के कोच  बदरुद्दीन और परिवार ने शमी को समय बर्बाद करने के बजाय बाहर भेजने का फैसला किया. पहले वह त्रिपुरा और फिर कोलकाता पहुंचे. वहां शमी डलहौजी एथलेटिक क्ब और फिर मोहन बागान के लिए खेले. वहां क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ बंगाल (CAB) के अधिकारी देबब्रत दास उनकी गेंदबाजी से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने शमी को अपने 'टाउन क्लब' में जगह दी और 75,000 का पहला कांट्रैक्ट दिया. बाद में ईडेन गॉर्डन में उनकी गेंदबाजी देख सौरव गांगुली ने उनकी प्रतिभा को पहचाना. इसके बाद साल 2010 में उनका बंगाल रणजी ट्रॉफी टीम में चयन हुआ. और फिर यहां से अभी तक की कहानी अपने आप में इतिहास है. 

जून की चिलचिलाती धूप में 'पागलपन' जैसी ट्रेनिंग 


मोहम्मद शमी के शुरुआती दिनों के अभ्यास की कहानी उनके जुनून को दर्शाती है. मुरादाबाद के सोनकपुर स्टेडियम में जून के महीने में जब तापमान 40-42 डिग्री सेल्सियस के पार होता था और बाकी खिलाड़ी छांव में आराम करते थे, तब शमी अकेले नेट्स पर गेंदबाजी कर रहे होते थे.  उनके कोच बदरुद्दीन सिद्दीकी ने एक इंटरव्यू में बताया था कि शमी उनसे भी पहले स्टेडियम पहुंच जाते थे और पसीने से पूरी तरह तर-बतर होने के बावजूद लगातार गेंदबाजी करते रहते थे. कई बार साथी खिलाड़ी और स्थानीय कोच उन्हें देखकर मजाक में "पागल" तक कह देते थे क्योंकि उन्हें न गर्मी की परवाह होती थी और न ही थकान की. लेकिन बंगाल में उनके मेंटर देबबब्रत दास शमी के बारे में चंद लाइन में ही सबकुछ कह देते हैं. 

उन्होंने कभी कहा था, "शमी को कभी पैसों या प्रसिद्धि की लालसा नहीं रही. उनका एकमात्र जुनून था—"गेंद का सीधी सीम पर पड़ना और बैटर के बोल्ड होने पर स्टंप्स के टूटने की आवाज." शमी इसी मंत्रा के साथ नेट्स में घंटों केवल उसी एक टप्पे पर गेंद फेंकने का अभ्यास करते थे, जिससे बैटर चकमा खा जाए और स्टंप उखड़ जाए.

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