सचिन तेंदुलकर का फाइल फोटो
ये महीना सचिन तेंदुलकर के नाम है। इस कड़ी में आज मिलिए मिलिंद रेगे से जिन्होंने सचिन को बचपन से खेलते हुए देखा है। मुंबई रणजी टीम के कप्तान रहे रेगे के मुताबिक सचिन का अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से 24 साल का रिश्ता है, लेकिन मुंबई की क्रिकेट से वह 30 साल से जुड़े हैं।
ऐसे में अपनी आखों के आगे सचिन को मास्टर बनते देखने वाले खिलाड़ियों के लिए उन्हें अलविदा कहना और मुश्किल है।
पूर्व क्रिकेटर मिलिंद रेगे ने कहा, 'मुझे डॉ प्रताप राउत का फोन आया, बोला, एक लड़का है नाम तो याद नहीं है बहुत शानदार खेलता है। जब उसके शॉट्स देखे तो लगा ही नहीं 12 साल का है। मैं जब सचिन के कोच आचरेकर जी से मिला तो उन्होंने बताया कि इसका नाम सचिन तेंडुलकर है।'
स्टूडेंट मेहनत कर रहा था नतीजा दिखने लगा। अपने नियमों के पालन में कभी ढिलाई ना बरतने वाले क्रिकेट क्लब ऑफ इंडिया ने उम्र के नियमों में बदलाव किया। सचिन को एंट्री दी।
यह एंट्री कुछ यूं मिली। रेगे बताते हैं कि जब सचिन अंडर−15 में खेले तब सीसीआई उभरते खिलाड़ियों को मेंबरशिप देती थी बशर्ते वह 18 साल या उससे बड़ा हो। उस वक्त माधव आप्टे सीसीआई प्रेसिडेंट थे, उन्होंने डूंगरपुर से बात की और सीसीआई ने नियमों में बदलाव किया और सचिन को एंट्री मिली।
रेगे बताते हैं कि उस वक्त एक खिलाड़ी थे, प्रदीप सुंदरम और सचिन 15 का था। कांगा लीग का विकेट बेहद गीला था। बैटिंग मुश्किल थी, लेकिन सचिन ने बैकफुट पर जाकर 95 के स्कोर पर प्रदीप की गेंद पर छक्का मारा जिसे मैं ताउम्र नहीं भूल पाऊंगा।
तब तक क्रिकेट के उस स्टूडेंट को दुनिया पहचानने लगी थी उसकी बल्लेबाजी को लिटिल मास्टर ने भी देखा। रेगे ने बताया कि सचिन तब 15 साल का था, एक दिन बच्चों ने उसे घेर लिया और ऑटोग्राफ लेने लगे। तब मैं और सुनील गावस्कर उसे दूर से देख रहे थे, सन्नी ने मुझसे कहा, उससे कहो, वह अपने साइन ठीक से दे ताकी सब उसका नाम पढ़ सकें। ये नाम आगे चलकर बहुत बड़ा होने वाला है।
इस प्रक्रिया में सचिन के टैलेंट के साथ था उनका अनुशासन। रेगे का कहना है कि वह नेट पर सबसे पहले आता था, सबसे बाद में जाता था। सबको बॉलिंग करना सबसे बात करना। जूनियर्स को गाइड करना जैसी कई आदतें उसको दूसरों से अलग बनाती हैं।
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