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'Zomato सबके लिए नहीं, दिन काटने वाले नहीं टिकेंगे', दीपिंदर गोयल की अपील के बाद Ex-एंप्‍लाई की भावुक पोस्‍ट वायरल

दीपिंदर गोयल की भावुक अपील के बाद एक्‍स एंप्‍लाई रागिनी दास ने पोस्‍ट में जताया है कि जोमैटो, उनके लिए घर जैसा था. दीपिंदर जब कहते हैं कि 'दरवाजा बंद नहीं है' ये सिर्फ एक नौकरी से आगे एक रिश्‍ते की बात होती है.

'Zomato सबके लिए नहीं, दिन काटने वाले नहीं टिकेंगे', दीपिंदर गोयल की अपील के बाद Ex-एंप्‍लाई की भावुक पोस्‍ट वायरल
Zomato Ex Employee Post Goes Viral: जोमैटो की एक्‍स एंप्‍लॉई ने आखिर ऐसा क्‍या लिखा कि पोस्‍ट हो गई वायरल?

Zomato Ex Employee LinkedIn Post: कॉरपोरेट दुनिया में कुछ कंपनियां ऐसी भी हैं, जहां दरवाजे एक बार बंद हो जाएं तो दोबारा खुलते नहीं. लेकिन जब जोमैटो (Zomato) के फाउंडर दीपेंद्र गोयल ने X पर अपने पूर्व कर्मचारियों को खुले दिल से वापस लौटने का न्यौता दिया, तो इसे एक HR पोस्ट से बढ़कर पिछले रिश्तों को दोबारा सम्मान देने की कोशिश बताया गया. उनकी भावुक अपील के बाद जोमैटो में काम कर चुके लोग पुराने दिनों को याद कर रहे हैं और इन्‍हीं में से एक हैं- रागिनी दास, जिनकी एक लिंक्‍डइन पोस्‍ट ने सोशल मीडिया पर लोगों का ध्‍यान खींचा है. आप भी पढें, उनकी पोस्‍ट में ऐसा क्‍या लिखा है कि वो वायरल हो गई. 

'जोमैटो सबके लिए नहीं है… और यही बात है'

जोमैटो में 6 साल से ज्‍यादा समय तक का कर चुकीं एक्‍स एंप्‍लॉई रागिनी दास ने लिंक्डइन पर एक पोस्ट (Ragini Das LinkedIn Post) लिखी, जो देखते ही देखते सिर्फ एक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि एक यादों का दस्तावेज बन गई. उन्होंने लिखा- 'Zomato isn't for everyone. And that is the point.' यानी जोमैटो सबके लिए नहीं है और ये एक अहम बात है. 

रागिनी खुद को गर्व से ex-Zoman कहती हैं. उनके लिए जोमैटो सिर्फ नौकरी नहीं था, बल्कि वह जगह थी जिसने उन्हें काम करना, गिरना, उठना और लंबा खेल खेलना सिखाया.

जहां घड़ी देखकर काम नहीं होता

रागिनी लिखती हैं कि जोमैटो में काम '9 से 5' नहीं होता. वहां रफ्तार है, दबाव है, अपेक्षाएं हैं. अगर आप सिर्फ समय काटना चाहते हैं, तो आप वहां टिक नहीं पाएंगे. लेकिन अगर आप टिक गए- तो कंपनी आपको बदले में भरोसा देती है, जिम्मेदारी देती है और कभी-कभी आपकी क्षमता पर तर्क से परे भरोसा भी करती है.

3,000 से शुरुआत, 60 लाख के चेक तक का सफर

उनकी कहानी नंबरों के बीच पनपी ग्रोथ की है. 22 साल की उम्र में हैदराबाद और बेंगलुरु की सड़कों पर ₹3,000 के बैनर ऐड बेचने से लेकर, सेल्स छोड़ते वक्त 60 लाख रुपये के चेक उठाने तक- बीच का सफर आसान नहीं था. उसी सफर ने उन्‍हें काफी कुछ सिखाया. वही असली सीख थी.

'तैयार होने से पहले भरोसा'

26 साल की उम्र में, बिना किसी अंतरराष्ट्रीय अनुभव के, उन्हें एक मिलियन डॉलर का बजट सौंपा गया. रागिनी पूछती हैं- कितनी कंपनियां ऐसा करती हैं? जोमैटो ने भरोसा किया, और उस भरोसे ने जिम्मेदारी लेना सिखाया.

छह साल में उन्हें सोमवार का डर सिर्फ तीन बार महसूस हुआ. वजह- चारों तरफ जुनून से भरे लोग. वही लोग, वही माहौल, वही ड्रीम टीम- जहां बॉस सिर्फ मैनेजर नहीं, बल्कि जीवनभर के मेंटर बन गए. उनमें से एक तो आगे चलकर उनका को-फाउंडर भी बना.

दोस्ती जो नौकरी से आगे चली गई

रागिनी उस आम धारणा को खारिज करती हैं कि ऑफिस में सच्ची दोस्ती नहीं होती. आज उनके सबसे करीबी लोगों में से 70% जोमैटो के पूर्व सहकर्मी हैं. वे साथ बड़े हुए- कोई फाउंडर बना, कोई माता-पिता, कोई विदेश चला गया, कोई शादीशुदा हो गया. सब बदल गया… लेकिन कुछ भी नहीं बदला.

दीपिंदर गोयल की भावुक अपील के बाद एक्‍स एंप्‍लाई रागिनी दास ने पोस्‍ट में जताया है कि जोमैटो, उनके लिए घर जैसा था. दीपिंदर जब कहते हैं कि 'दरवाजा बंद नहीं है' ये सिर्फ एक नौकरी से आगे एक रिश्‍ते की बात होती है. उन्‍होंने ये भी स्‍वीकार किया है कि एक समय जोमैटो हर किसी के लिए सही जगह नहीं थी- ना माहौल, ना लीडरशिप वैसी थी जैसी कुछ लोगों को चाहिए थी. लेकिन उन्होंने ये भी कहा, 'अगर आपको लगता है कि दरवाजा बंद हो चुका है, तो ऐसा नहीं है. मैं आप लोगों को वापस चाहता हूं.'

लेखक के बारे में
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निलेश कुमार
Senior Producer
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