देश की इकोनॉमी में Gen Z का अहम रोल है, ये बात कई सारी स्टडीज में प्रूफ हो चुकी है. अपने आसपास 10 Gen Z युवाओं से आप पूछेंगे कि उनकी प्राथमिकताएं क्या हैं तो शायद 10 में 7-8 के जवाब में अपना एक घर लेना यानी कि मकान, फ्लैट, प्लॉट वगैरह खरीदना शायद न हो. हो सकता है रेंट पर रहना उनके लिए कोई मसला न हो, या फिर विरासत में मिले घर में रहते हुए, अपना एक घर लेना वो सेकेंडरी जरूरत समझते हों.
ऐसा नहीं है कि युवा घर खरीदना पूरी तरह छोड़ देंगे, लेकिन उनकी प्राथमिकताएं बदलती दिख रही हैं. नौकरी शुरू करने के बाद तुरंत होम लोन लेकर घर खरीदने के बजाय कई युवा पहले इक्विटी, म्यूचुअल फंड और REITs जैसे फाइनेंशियल एसेट्स में पैसा लगाना चाहते हैं और बाद में अपनी कमाई के हिसाब से घर खरीदने का फैसला लेना चाहते हैं. इसका मतलब यह है कि भारत में घरों की डिमांड खत्म होने वाली नहीं है, लेकिन पहली बार घर खरीदने की उम्र और इस खरीद में लगने वाला पैसा बदल सकता है.
रियल एस्टेट कंपनियां नहीं दे रहीं जवाब
इस कहानी का एक दिलचस्प हिस्सा तब सामने आया जब NDTV ने कई रियल एस्टेट कंपनियों से पूछा कि क्या उन्हें Gen Z के बीच घर खरीदने में असली दिलचस्पी दिखाई दे रही है. कई रियल एस्टेट प्लेयर्स ने इस सवाल पर कमेंट करने से इनकार कर दिया. इनमें देश के दो बड़े स्टॉक मार्केट में लिस्टेड डेवलपर्स भी शामिल थे. उनका कहना था कि यह सवाल सेक्टर के नेगेटिव पहलू को सामने लाता है और वे इस पर अपना नाम नहीं देना चाहते.
अगर आंकड़े मजबूत हों तो उन्हें दिखाना कंपनियों के लिए अच्छी पब्लिसिटी भी हो सकता है. ऐसे में डेटा नहीं देना इस बहस का एक अहम हिस्सा बन जाता है.

Gen Z के सपने एक जैसे लेकिन बजट अलग
Gen Z का बड़ा हिस्सा अभी टीनएज या शुरुआती 20s में है. इस उम्र में घर खरीदना आम बात नहीं है. हर पीढ़ी ने इस उम्र में आर्थिक दबाव देखा है. लेकिन Gen Z के मामले में एक बदलाव पहले से दिखाई दे रहा है. कई युवा घर को अपनी सेविंग का आखिरी लक्ष्य नहीं मान रहे हैं. रांची में रहने वाला 21 साल का युवा और मुंबई में रहने वाला 21 साल का युवा आर्थिक तौर पर काफी अलग हो सकता है. उनकी सैलरी, प्रॉपर्टी की कीमत और परिवार से मिलने वाला सपोर्ट अलग हो सकते हैं. लेकिन दोनों एक ही इंस्टाग्राम फीड और एक जैसी रील्स देख रहे हैं. टेक्नोलॉजी ने उनके सपनों को काफी हद तक एक जैसा बना दिया है, लेकिन उनकी कमाई और बैंक बैलेंस एक जैसे नहीं हुए हैं.
युवाओं के खर्च के तरीके में भी बदलाव दिख रहा है. ट्रैवल, महंगा बैग या नया फोन जैसी चीजों पर खर्च करना उन्हें ज्यादा पसंद आ सकता है. इन चीजों का फायदा तुरंत मिलता है और इन्हें सोशल मीडिया पर दिखाना भी आसान है. वहीं ऐसा घर जिसके लोन की किस्त 2046 तक चल सकती है, युवाओं को उतना आकर्षक नहीं लगता.
घर खरीदने से पहले पैसा दूसरी जगह लगाने का ट्रेंड
थिनक्रेडब्लू सिक्योरिटीज चलाने वाले गौरव उदानी के मुताबिक Gen Z घर खरीदने को खारिज नहीं कर रही है. वह सिर्फ घर खरीदने का समय बदल रही है. उनके मुताबिक पहले का मॉडल काफी सीधा था. नौकरी शुरू करो, लोन लो और 20s के आखिरी सालों में घर खरीद लो. इसके बाद घर को रहने की जगह के साथ बड़ा इन्वेस्टमेंट भी माना जाता था. अब युवा पहले लिक्विड वेल्थ बनाना चाहते हैं. वे इक्विटी, म्यूचुअल फंड और REITs में पैसा लगा सकते हैं. इससे उन्हें रियल एस्टेट में इन्वेस्टमेंट का मौका मिलता है, लेकिन तुरंत होम लोन की EMI और लंबे समय के लॉक-इन से बच सकते हैं.

उदानी ने बताया कि उनका अपना टीनएज बेटा भी इसी तरह सोचता है. पहले कमाई करो और बाद में घर खरीदो. घर खरीदने का भी मकसद सिर्फ यह हो कि वह रहने के लिए है, न कि इससे अमीर बना जा सके. यानी घर अब किसी व्यक्ति की पूरी संपत्ति का सबसे बड़ा हिस्सा नहीं होगा. इसे बाद में खरीदा जा सकता है और इसमें अपनी कुल संपत्ति का कम हिस्सा लगाया जा सकता है. उदानी इसे गिरावट के बजाय देरी मानते हैं. वहीं डॉ. सिंह के मुताबिक यह सिर्फ Gen Z तक सीमित बदलाव नहीं है. कई पीढ़ियों में फिजिकल एसेट के बजाय फाइनेंशियल एसेट में पैसा लगाने की सोच बढ़ रही है.
अगर घर खरीदने में देरी हुई तो असर कहां पड़ेगा
भारत की इकॉनमी में रियल एस्टेट की बड़ी भूमिका है. अलग-अलग अनुमानों के मुताबिक यह अभी देश की GDP में करीब 7% से 13% तक योगदान देता है. सरकार का लक्ष्य 2047 तक इसे 18% तक ले जाने का है. रियल एस्टेट एग्रीकल्चर के बाद देश में सबसे ज्यादा रोजगार देने वाले सेक्टर्स में भी शामिल है. सीमेंट, स्टील, पेंट, फर्निशिंग और कंस्ट्रक्शन में काम करने वाले लोगों की कमाई भी घरों की बिक्री से जुड़ी है. अगर पहली बार घर खरीदने वाले लोग अपना फैसला 5 या 10 साल तक टाल देते हैं तो इसका असर धीरे-धीरे दिखाई दे सकता है. नए प्रोजेक्ट्स की बुकिंग कम हो सकती है. इससे आगे चलकर नए प्रोजेक्ट्स की लॉन्चिंग पर असर पड़ सकता है और इसका असर सबसे पहले दिहाड़ी पर काम करने वाले मजदूरों पर पड़ सकता है.
बैंकों के होम लोन कारोबार की ग्रोथ भी धीमी हो सकती है. होम लोन बैंकों के लिए सबसे सुरक्षित लेंडिंग कैटेगरी में माना जाता है. अगर इसमें ग्रोथ कम होती है, तो पैसा क्रेडिट कार्ड, पर्सनल लोन और Buy Now Pay Later जैसी ज्यादा रिस्की कैटेगरी में जा सकता है. राज्य सरकारों को भी नुकसान हो सकता है. घर खरीदने और बेचने पर मिलने वाली स्टांप ड्यूटी राज्यों के लिए आमदनी का एक सीधा और भरोसेमंद जरिया है. अगर प्रॉपर्टी ट्रांजैक्शन कम होते हैं तो सरकार की आमदनी घट सकती है और इसका असर कैपेक्स पर भी पड़ सकता है.
पैसा गायब नहीं होगा बल्कि दूसरी जगह जाएगा
Gen Z अगर घर खरीदने के लिए डाउन पेमेंट जमा करने के बजाय इक्विटी, म्यूचुअल फंड और REITs में पैसा लगाती है तो इसका मतलब यह नहीं है कि पैसा इकॉनमी से बाहर चला गया. यह पैसा दूसरी जगह इस्तेमाल होगा. इससे भारतीय कंपनियों को ज्यादा लिक्विड और कम लागत वाली फंडिंग मिल सकती है. भारत में लोगों की बड़ी मात्रा में संपत्ति लंबे समय से प्रॉपर्टी में फंसी रही है. ऐसे में अगर युवा अपनी संपत्ति को अलग-अलग जगह लगाते हैं तो इससे उनका रिस्क भी बढ़ सकता है.
जापान की 1980s की इकॉनमी और चीन का हालिया रियल एस्टेट संकट दिखाता है कि किसी देश की इकॉनमी का बहुत ज्यादा रियल एस्टेट पर निर्भर होना आगे चलकर कमजोरी भी बन सकता है. इसलिए Gen Z का जल्दी अलग-अलग एसेट्स में पैसा लगाना लंबे समय में इकॉनमी के लिए फायदेमंद भी हो सकता है. इससे शुरुआत में कंस्ट्रक्शन जॉब्स और स्टांप ड्यूटी कलेक्शन पर असर पड़ सकता है, लेकिन 20 साल के नजरिए से यह ज्यादा मजबूत फाइनेंशियल सिस्टम बनाने में मदद कर सकता है.
तो क्या Gen Z कभी घर नहीं खरीदेगी
ऐसा कहना सही नहीं होगा. Gen Z घर खरीदेगी, लेकिन हो सकता है कि वह इसे पहले की पीढ़ियों के मुकाबले देर से खरीदे और इसे अपनी पूरी संपत्ति का सबसे बड़ा हिस्सा न बनाए. हाउसिंग की डिमांड खत्म होने की संभावना नहीं है. बढ़ती आबादी अपने आप घरों की ज़रूरत पैदा करती रहेगी.
असली सवाल यह है कि इस डिमांड का कितना हिस्सा घर की खरीद में बदलेगा, लोग कितनी उम्र में घर खरीदेंगे और तब तक उनका पैसा इक्विटी मार्केट, किराए के घरों और रोजमर्रा के खर्च में कितना इस्तेमाल होगा. इस पूरी बहस में सबसे दिलचस्प बात यह है कि देश के बड़े लिस्टेड रियल एस्टेट डेवलपर्स Gen Z की खरीदारी को लेकर पॉजिटिव दावा तो कर रहे हैं, लेकिन अपने दावे को सपोर्ट करने के लिए ठोस सेल्स आंकड़े देने से पीछे हट रहे हैं.
(प्रतीक शुक्ला की रिपोर्ट)
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