Rasna Brand Success Story: 80 और 90 के दशक में भारतीय मिडिल क्लास के घरों में खुशियों का एक तय फॉर्मूला था. घर में मेहमान आए नहीं कि किचन से कांच के गिलासों में चमकीला ओरेंज लिक्विड हाजिर हो जाता था. वह दौर कोल्ड ड्रिंक की बोतलें खरीदकर फिजूलखर्ची करने का नहीं, बल्कि 'रसना' के एक पैकेट से पूरे घर और मेहमानों की भी प्यास बुझाने का था. यानि उस दौर में भारतीय मिडिल क्लास के ड्राइंग रूम का अपना एक अलग समाजशास्त्र था.मध्यमवर्ग के 'वैल्यू-फॉर-मनी' वाले डीएनए की वजह से रसना नाम का एक ऐसा ब्रैंड निकला था जिसने बाजार के 80 फीसदी हिस्से पर कब्जा कर लिया...इसने पेप्सी और कोका कोला जैसी ग्लोबल कंपनियों को भी ये सिखा दिया कि भारत को जीतने के लिए महंगे एंबेसडर्स की नहीं, बल्कि भारतीय माताओं के बजट को समझने की जरूरत है.ऐसे में ये जानने की भी जरुरत है कि इतना बड़ा और लोकप्रिय ब्रांड नई सदी के पहले ही दशक में मार्केट से बाहर कैसे हो गया...क्यों भारतीय मिडिल क्लास ने इसे अपने ड्राइंग रूम से बाहर कर दिया? अब कहां है रसना, क्या कर रही है इसकी कंपनी? जानिए सारे सवालों के जवाब इस रिपोर्ट में
'जाफ्फ्रान' का वो फ्लॉप मॉडल और 'रसना' का उदय
इस कहानी की शुरुआत गुजरात के अहमदाबाद से होती है.यहां एक कारोबारी थे अरीज खंबाता...1970 के दशक में उनकी कंपनी थी 'पियोमा मैन्युफैक्चरिंग' जो 'जाफ्फ्रान' (Jaffran) नाम से सॉफ्ट ड्रिंक कंसंट्रेट बेचती थी. लेकिन बहुत सफल नहीं थी. अरीज दूरदर्शी बिजनेसमैन थे..उन्होंने अपने ब्रांड को विस्तार देने के लिए गजब का का दिमाग लगाया. अपने ब्रांड का नाम बदलकर रसना किया और 1976 में नए तेवर और कलेवर के साथ मार्केट में उतारा.

'रसना' नाम संस्कृत के शब्द 'रस' और जीभ (रसना) से प्रेरित था, जो हर भारतीय को अपना सा लगा.उन्होंने बोतलों के बजाय सिर्फ लिक्विड और पाउडर का एक छोटा पाउच बेचा, जिससे ट्रांसपोर्टेशन का खर्च काफी कम हो गया. लेकिन नाम का यह देसीपन तो सिर्फ एक शुरुआत थी, असली जादू तो उस आर्थिक गणित में छिपा था जिसने भारतीय किचन की सोच को ही बदल दिया.
1 पैकेट, 32 गिलास और मिडिल क्लास का आर्थिक गणित
80 और 90 के दशक के भारत का आर्थिक ढांचा बहुत सीमित था. उस समय बाजार में थम्सअप, कैंपा कोला या बाद में आई पेप्सी की एक बोतल करीब 3 से 5 रुपये की आती थी. अगर घर में 5-6 मेहमान आ जाएं, तो 20-25 रुपये का सीधा खर्च था, जो उस दौर के मासिक बजट के हिसाब से एक बड़ी फिजूलखर्ची मानी जाती थी.
कम लागत का यह फॉर्मूला तैयार था, लेकिन इसे देश के हर ड्राइंग रूम की जरूरत बनाना अभी बाकी था. यहीं से शुरू हुआ विज्ञापन जगत का वो कल्ट दौर.
"आई लव यू रसना": वो विज्ञापन जो अब तक याद है
80 के दशक में दूरदर्शन का एकाधिकार था और विज्ञापन सीधे लोगों के ड्राइंग रूम में एंट्री करते थे. एड गुरु एजी कृष्णमूर्ती के साथ मिलकर रसना ने भारतीय विज्ञापन जगत का बेहद कल्ट कैंपेन तैयार किया. पेप्सी और कोका-कोला जहां हॉलीवुड और बॉलीवुड के बड़े स्टार्स के दम पर खुद को 'कूल' दिखाने की आक्रामक कोशिश कर रहे थे, वहीं रसना ने एक मासूम बच्चे को अपना चेहरा बनाया.घुंघराले बाल और फ्रॉक पहने वो छोटी बच्ची (अंकिता झावेरी) जब हाथ में ऑरेंज रसना का गिलास लेकर मुस्कुराते हुए बोलती थी— "आई लव यू रसना", तो वह सिर्फ एक विज्ञापन नहीं रह जाता था. वह भारत के हर घर की बच्ची बन गई थी. गर्मियों की छुट्टियों में दोपहर को खेलकर आने के बाद फ्रीजर में रसना की बर्फ वाली कुल्फी जमाकर खाना, बर्थडे पार्टियों में लाल-पीले रसों के बड़े-बड़े जग सजाना— यह एक पूरी पीढ़ी का साझी विरासत बन गया. रसना ने खुद को 'एलीट' नहीं, बल्कि 'हैप्पी फैमिली ड्रिंक' के रूप में स्थापित किया और देखते ही देखते सॉफ्ट ड्रिंक कंसंट्रेट मार्केट के 80 से 85 फीसदी हिस्से पर एकछत्र राज कायम कर लिया.

टर्निंग पॉइंट: ड्राइंग रूम से विदाई की वो तीन वजहें
अब आते हैं उस सबसे जरूरी और तीखे सवाल पर कि— इतना बड़ा और लोकप्रिय ब्रांड नई सदी (2000 के दशक) के पहले ही दशक में मार्केट से बाहर कैसे हो गया? क्यों भारतीय मिडिल क्लास ने इसे करीब-करीब छोड़ दिया? दरअसल इसके पीछे भारतीय उपभोक्ताओं के व्यवहार और बाजार की रणनीति में आए तीन बड़े बदलाव थे
दरअसल उदारीकरण के बाद नए भारत के मिडिल क्लास की आमदनी बढ़ी, लेकिन इसके साथ ही उनके पास समय की कमी होने लगी. अब किचन में आधा घंटा लगाकर पानी उबालना, चीनी घोलना, रसना का लिक्विड-पाउडर मिलाना और फिर उसे ठंडा करना लोगों को एक 'बड़ा झंझट' लगने लगा. उपभोक्ता अब 'मेहनत' के बजाय 'तुरंत' मिलने वाली चीजों की तरफ भाग रहा था.
एक तथ्य ये भी है कि 80 के दशक में हर घर में फ्रिज नहीं होता था, इसलिए रसना को नॉर्मल पानी या मटके के पानी में घोलकर मेहमानों को पिलाया जाता था. 2000 के दशक तक आते-आते फ्रिज हर मिडिल क्लास घर की बुनियादी जरूरत बन गया, जिसने रेडी-टू-ड्रिंक बोतलों को स्टोर करना बेहद आसान बना दिया.
₹1 का सैशे वॉर: रसना का वो आखिरी आक्रामक पलटवार
जब रसना को यह अहसास हुआ कि शहरी मिडिल क्लास उसके हाथ से फिसल रहा है, तो उसने ग्रामीण भारत (Rural Market) की तरफ रुख किया. साल 2002-2003 के आसपास रसना ने महज ₹1 का सैशे (Sachet) लॉन्च किया. यह कोला ब्रांड्स के खिलाफ रसना का सबसे बड़ा और आखिरी दांव था. गांव के देहातों और कस्बों में जहां लोग ₹10 की बोतल भी रोज नहीं खरीद सकते थे, वहां बच्चे ₹1 की पॉकेट मनी से दुकान जाकर रसना का सैशे खरीदने लगे. इस स्ट्रेटेजी ने रसना को वॉल्यूम (बिक्री की संख्या) के मामले में बाजार में जिंदा रखा, लेकिन शहरों के ड्राइंग रूम से इसकी विदाई तय हो चुकी थी.
अब कहां है रसना?
यह सोचना गलत होगा कि रसना पूरी तरह खत्म हो चुका है. वह सिर्फ हमारे ड्राइंग रूम से ओझल हुआ है, बाजार से नहीं.रसना आज भी दुनिया की सबसे बड़ी सॉफ्ट ड्रिंक कंसंट्रेट निर्माता कंपनियों में से एक है. यह आज भी दुनिया के 60 से ज्यादा देशों में एक्सपोर्ट होता है. बदलते वक्त को देखते हुए रसना ने खुद को री-ब्रैंड किया है. अब कंपनी ने 'रसना हेल्दी डे' (हनी, सत्तू, सूप), विटामिन-सी से भरपूर प्री-मिक्स पाउडर (जिसमें चीनी पहले से मिली होती है और सिर्फ पानी में घोलना होता है) और रेडी-टू-ड्रिंक सिरप के जरिए खुद को मार्केट में बनाए रखा है. अरीज़ खंबाता के निधन के बाद अब उनके बेटे पिरुज़ खंबाता इस ₹1000 करोड़ से ज्यादा के साम्राज्य को संभाल रहे हैं. हालांकि रसना की केस स्टडी बिजनेस की दुनिया के लिए एक बड़ा सबक है.रसना की कहानी हमें सिखाती है कि ग्लोबल ब्रांड्स के बड़े बजट को केवल भारी-भरकम पैसों से नहीं, बल्कि अपने देश के लोगों की नब्ज और उनकी जेब को समझकर मात दी जा सकती है. आज भले ही हमारे फ्रिज में कई तरह के महंगे ब्रांड्स रखे हों, लेकिन दोपहर की चिलचिलाती धूप में स्कूल से घर लौटने के बाद, मां के हाथ से बने उस ठंडे-ठंडे रसना का स्वाद आज के किसी महंगे कोला में नहीं मिल सकता.
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