Rameshwaram Cafe owner struggle journey: साल 2005. दिल्ली की तपती धूप और कड़कड़ाती ठंड. 22 साल का एक नौजवान, जेब पूरी तरह खाली, सिर पर कोई छत नहीं. रात गुजरती थी मंदिर से सटे एक पार्क की बेंच पर और पेट भरता था इस्कॉन के लंगर की लाइन में लगकर. ढाबे पर बर्तन मांजने और टेबल साफ करने वाले इस लड़के ने तब सपने में भी नहीं सोचा होगा कि एक दिन दुनिया उसकी बनाई रसोई के आगे कतार में खड़ी होगी. आज बात उसी राघवेंद्र राव की, जिन्होंने जमीन से उठकर खड़ा किया भारत का सबसे चर्चित फूड ब्रांड 'द रामेश्वरम कैफे'.
जब सपनों को लगा पहला झटका
बेंगलुरु की तंग गलियों में पले-बढ़े राघव का बचपन से ही संघर्षों भरा रहा. अखबार बांटकर पढ़ाई का खर्च निकाला और फिर इंजीनियरिंग की फीस भरने के लिए होटल ले मेरीडियन में झाड़ू-पोंछे से लेकर कैशियर तक का काम किया.
उसी दौरान किसी ने कह दिया, "तुम तो बिल्कुल ऋतिक रोशन जैसे दिखते हो." उस दौर में 'कहो ना प्यार है' का जादू सिर चढ़कर बोल रहा था. बस, राघव की आंखों में भी बॉलीवुड का सपना तैरने लगा. लेकिन जब यह बात पिता को बताई, तो जवाब में एक जोरदार थप्पड़ मिला. सपने को टूटते देख 19 साल का राघव चुपचाप घर से निकल पड़ा.
मुंबई की ठोकरें खाई
थिएटर ने हुनर तो दिया, लेकिन रोटी नहीं दी. मुंबई पहुंचे तो अनुपम खेर के एक्टिंग स्कूल की भारी-भरकम फीस ने दरवाजे बंद कर दिए. दिल्ली के NSD पहुंचे तो ग्रेजुएशन की डिग्री न होने की वजह से दाखिला नहीं मिला. पेट की आग बुझाने के लिए नेहरू प्लेस के एक ढाबे में वेटर और डिशवाशर बन गए. रात को इस्कॉन का पार्क आशियाना था और मंदिर का प्रसाद निवाला.
चेन्नई जाकर बैकग्राउंड डांसर और स्टंटमैन बनने की आखिरी कोशिश भी की, लेकिन 6 साल के इस वनवास के बाद राघव को समझ आ गया कि मायानगरी की राहें उनके लिए नहीं हैं. साल 2009 में, 25 साल की उम्र में वे खाली हाथ घर लौटे और ठान लिया कि अब अपनी जिंदगी की नई स्क्रिप्ट खुद लिखेंगे.

10 लाख का कर्ज और तीन पहियों की ठेला
ढाबों और होटलों में काम करते हुए राघव फूड बिजनेस की नब्ज पहचान चुके थे. 2012 में दोस्तों से 10 लाख रुपए जुटाए. किसी ने मिक्सर दिया, किसी ने बर्तन और शुरू हुई एक तिपहिया ठेले पर इडली-डोसा की दुकान.
शुरुआत से ही राघव का एक ही उसूल था, स्वाद में कोई समझौता नहीं, खाना बनेगा तो सिर्फ शुद्ध देसी घी में.
काम चल निकला तो इसे नाम दिया 'IDC' (इडली, डोसा, कॉफी). देखते ही देखते आउटलेट्स बढ़े, लेकिन जैसे-जैसे बिजनेस बढ़ा, पार्टनर्स से अनबन शुरू हो गई. राघव के लिए खाना खिलाना एक 'सेवा' थी, जबकि पार्टनर्स के लिए सिर्फ 'मुनाफा'. शुद्ध घी के इस्तेमाल को फिजूलखर्ची बताया जाने लगा. राघव अपने ही बनाए आशियाने में बेगाने महसूस करने लगे.

दिव्या की एंट्री: जब मिला बिज़नेस को नया दिमाग
तभी जिंदगी के इस मोड़ पर एंट्री हुई दिव्या की. एक कामयाब चार्टर्ड अकाउंटेंट, जो अपनी सीए प्रैक्टिस से सालाना करीब 3 करोड़ रुपये कमा रही थीं. जब उन्होंने आईडीसी के खातों और विवादों को परखा, तो साफ कह दिया, "राघव, इस माहौल में तुम्हारा विजन कभी पूरा नहीं हो सकता."
राघव ने दिव्या पर भरोसा किया और बिना एक पैसा लिए आईडीसी से बाहर निकल आए. लोग समझे राघव का खेल खत्म, लेकिन यह तो एक नए अध्याय की शुरुआत थी.
राघव का सपना था साउथ इंडियन खाने को इंटरनेशनल पहचान दिलाना. इस सपने पर दिव्या ने इतना यकीन किया कि अपनी करोड़ों की सीए प्रैक्टिस और डिग्री तक को दांव पर लगा दिया.
रेस्टोरेंट नहीं, मंदिर का महाप्रसाद
राघव भूले नहीं थे कि बुरे वक्त में मंदिरों के लंगर ने ही उनकी जान बचाई थी. उन्होंने तय किया कि उनका रेस्टोरेंट किसी मंदिर से कम नहीं होगा. रसोई उसका गर्भगृह, रसोइये उसके पुजारी और आने वाले ग्राहक श्रद्धालु.
साल 2021 में बेंगलुरु के इंदिरानगर में खुला 'द रामेश्वरम कैफे'. नाम जुड़ा था रामेश्वरम धाम और डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम की सादगी से.
नो फ्रिज पॉलिसी: किचन में कोई बड़ा रेफ्रिजरेटर नहीं. बासी खाने का नामोनिशान नहीं.
ताजगी की गारंटी: हर आधे घंटे में ताजा चटनी और दिन में 4-5 बार तैयार होता फ्रेश बैटर.
शुद्धता: सिर्फ नंदिनी का शुद्ध देसी घी, बेकिंग सोडा पर सख्त पाबंदी.
कड़ी ट्रेनिंग: डोसा मास्टर बनने के लिए 15 हजार डोसे और कॉफी मास्टर के लिए 2 लाख कप कॉफी बनाने का कड़ा अनुभव.
स्वाद ऐसा कि इंदिरानगर में पैर रखने की जगह नहीं बची. इसी कामयाबी के बीच राघव ने फिल्मी अंदाज में दिव्या से कहा, "तुम मेरी बिजनेस पार्टनर तो हो ही, क्या मेरी लाइफ पार्टनर बनोगी?" और दोनों परिणय सूत्र में बंध गए.

वो खौफनाक दोपहर और 8 दिन में वापसी
कामयाबी की उड़ान भर ही रहे थे कि 1 मार्च 2024 की दोपहर ब्रुकफील्ड आउटलेट में एक जोरदार धमाका हुआ. एक आतंकी ने रवा इडली के बहाने टाइम बम प्लांट कर दिया था. नौ लोग घायल हुए.
यह किसी को भी तोड़ देने के लिए काफी था. लेकिन राघव और दिव्या टूटे नहीं. दिव्या ने कहा, "इस हादसे ने हमें और मजबूत बनाया है." और महज आठ दिन के भीतर उसी आउटलेट के दरवाजे फिर से ग्राहकों के लिए खोल दिए गए.
आज बेंगलुरु, हैदराबाद, मुंबई और पुणे में रामेश्वरम कैफे के 9 बड़े आउटलेट्स हैं. बेंगलुरु के होसुर रोड पर बना 9,000 स्क्वायर फीट का आउटलेट, जहां अंदर मंदिर और पुंगनूर गायों की गौशाला तक मौजूद है.
सैकड़ों करोड़ का यह ब्रांड सिर्फ मुनाफे की कहानी नहीं है. यह उस इंसान के जुनून की कहानी है, जिसने भूख की कीमत समझी और उस जीवनसाथी के भरोसे की मिसाल है, जिसने शून्य से शिखर तक का सफर साथ तय किया. अगर राघव इस कैफे की आत्मा हैं, तो दिव्या इसकी रीढ़ की हड्डी.
कैफे ने वित्त वर्ष 2025 में ₹17.8 करोड़ का रेवेन्यू (राजस्व) दर्ज किया, जिसमें शुद्ध लाभ (Net Profit) करीब ₹2 करोड़ रहा. ब्रांड का बिजनेस मॉडल भारी वॉल्यूम पर टिका है. एक अकेला आउटलेट हर दिन औसतन 7,000 से 7,500 बिल प्रोसेस कर रहा है. बेंगलुरु और हैदराबाद में 5 से 6 प्राइम आउटलेट्स के साथ यह चेन पूरी तरह बूटस्ट्रैप्ड मॉडल पर काम कर रही है. घरेलू बाजार में मजबूत पकड़ बनाने के बाद कंपनी साल 2026 में दुबई में अपना पहला इंटरनेशनल आउटलेट खोलने जा रही है. सोशल मीडिया पर ब्रांड का वैल्यूएशन ₹18,000 से ₹18,800 करोड़ आंका जा रहा है, लेकिन मार्केट एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह महज अनुमान है और किसी आधिकारिक फंडिंग राउंड पर आधारित नहीं है.
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