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Explainer: नीदरलैंड का बड़ा गोल्ड मूव, संकट से पहले 86 हजार किलो सोना लंदन क्यों पहुंचाया?

नीदरलैंड्स ने अमेरिका और कनाडा से 86000 किलो सोना हटाकर लंदन पहुंचाया. वजह है बढ़ती जियोपॉलिटिकल अनिश्चितता और संकट के समय सोने को तेजी से इस्तेमाल करने की तैयारी, क्या दुनिया भर के सेंट्रल बैंक अपनी गोल्ड नीति को बदल रहे हैं?

Explainer: नीदरलैंड का बड़ा गोल्ड मूव, संकट से पहले 86 हजार किलो सोना लंदन क्यों पहुंचाया?
बैंक ऑफ इंग्लैंड में जमा गोल्ड
AFP
  • नीदरलैंड ने अमेरिका और कनाडा से अपना 86 टन सोना हटाकर लंदन के बैंक ऑफ इंग्लैंड में रखा है.
  • नीदरलैंड ने बढ़ती जियोपॉलिटिकल अनिश्चितता के दौरान गोल्ड रिजर्व की लिक्विडिटी के मद्देनजर ये कदम उठाया है.
  • यह कदम गोल्ड की लोकेशन और संकट के समय इस्तेमाल करने की क्षमता पर भी ध्यान खींचता है.

नीदरलैंड्स ने अपने सोने के भंडार को लेकर एक ऐसा कदम उठाया है, जिसने दुनिया की आर्थिक और रणनीतिक हलचल पर नजर रखने वालों का ध्यान खींचा है. नीदरलैंड्स के केंद्रीय बैंक डी नेदरलैंड्शे बैंक (डीएनबी) ने अमेरिका और कनाडा से करीब 86000 किलो सोना हटाकर लंदन पहुंचाया है. बैंक का कहना है कि यह कदम बढ़ते वैश्विक राजनीतिक अस्थिरता को देखते हुए देश की संकट की परिस्थितियों में आर्थिक तैयारियों को मजबूत करने के उद्देश्य से उठाया गया है.

यह फैसला सिर्फ सोने को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने की कहानी नहीं है. इसके पीछे बड़ा सवाल यह है कि आखिर कोई देश अपने अरबों डॉलर के बराबर सोने को अमेरिका और कनाडा से हटाकर लंदन क्यों ले जाएगा? क्या यह अमेरिका पर भरोसा कम होने का संकेत है? क्या दुनिया के केंद्रीय बैंक किसी बड़े वैश्विक संकट के लिए अपनी तैयारी बदल रहे हैं? और सबसे अहम, इस पूरे घटनाक्रम का भारत और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर क्या असर हो सकता है?

डच सेंट्रल बैंक ने बुधवार को घोषणा की कि मार्च से अगस्त के बीच, न्यूयॉर्क और ओटावा (कनाडा) में रखे कुल लगभग 313 मीट्रिक टन सोने में से करीब 86 मीट्रिक टन सोना लंदन भेजा गया है. इस बदलाव से पहले, न्यूयॉर्क में नीदरलैंड के कुल सोने का 31.3% और ओटावा में 19.7% हिस्सा मौजूद था. बैंक ने बताया कि इस बदलाव के बाद, अब दोनों शहरों में 18.5% सोना बचा है.

बैंक के पास कुल 612.4 मीट्रिक टन (675 टन) सोना है, जिसकी कीमत 2025 के आखिर में 72.2 बिलियन यूरो (करीब 83.6 बिलियन डॉलर) थी. यह करीब  7.90 लाख करोड़ रुपये होता है.

बैंक के गवर्नर ओलाफ स्लेइपेन ने एक लिखित बयान में कहा, "इस बदलाव से हमने अपने सोने के भंडार की ट्रेड करने की क्षमता को बेहतर बनाया है. हमें उम्मीद है कि हमें कभी इनका इस्तेमाल करने की जरूरत नहीं पड़ेगी, लेकिन हमें अपनी मजबूती और तैयारी को बेहतर बनाने की जरूरत है."

बैंक ने बताया कि 27 मीट्रिक टन से अधिक सोना अमेरिका और कनाडा से जिस्ट शहर के बास एक मिलिट्री बैस पर बने डच बैंक के कड़ी सुरक्षा वाले वॉल्ट में ट्रांसफर किया गया है. हालांकि बैंक ने यह नहीं बताया कि सोने की ईंटें अटलांटिक महासागर के पार कैसे लाई गईं. बैंक ने बताया कि बाकी करीब 59 मीट्रिक टन सोना न्यूयॉर्क में बेचकर और उससे मिली रकम से लंदन में सोना खरीदकर ट्रांसफर किया गया.

Gold in Bank of England

Photo Credit: AFP

आखिर नीदरलैंड्स ने सोना लंदन ही क्यों रखा?

डच सेंट्रल बैंक का कहना है कि बैंक ऑफ इंग्लैंड के पास रखा सोना दुनिया में सबसे आसानी से ट्रेड किया जा सकने वाला सोना माना जाता है.

डच सेंट्रल बैंक ने कहा कि बैंक ऑफ इंग्लैंड में रखा सोना, "आधुनिक अंतरराष्ट्रीय ट्रेड स्टैंडर्ड्स को पूरा करता है और इसे दुनिया का सबसे आसानी से ट्रेड होने वाला सोना माना जाता है, इसलिए संकट की स्थिति में यह सबसे आसानी से उपलब्ध होगा. न्यूयॉर्क और ओटावा में रखे सोने के भंडार का ऐसी स्थिति में उतनी तेजी और सीधे तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता."

सरल भाषा में समझें तो अगर किसी बड़े आर्थिक या वित्तीय संकट के दौरान नीदरलैंड्स को तुरंत अपने सोने के बदले नकदी या दूसरी मुद्रा चाहिए, तो लंदन में रखा सोना अपेक्षाकृत आसानी से बाजार में इस्तेमाल किया जा सकता है.

यानी मामला सुरक्षा से अधिक लिक्विडिटी और जरूरत पड़ने पर सोने को जल्दी इस्तेमाल करने की क्षमता का भी है.

किसी संकट के समय केंद्रीय बैंक के लिए सिर्फ यह जरूरी नहीं होता कि उसका सोना सुरक्षित हो. यह भी जरूरी है कि वह सोना ऐसी जगह हो जहां उसे जल्दी से खरीदा-बेचा या वित्तीय लेनदेन में इस्तेमाल किया जा सके और इस मामले में लंदन दुनिया के सबसे बड़े और पुराने गोल्ड ट्रेडिंग हब में से एक है.

क्या यह अमेरिका पर भरोसा कम होने का संकेत है?

डच सेंट्रल बैंक ने ये नहीं कहा कि उसे अमेरिका या कनाडा की बैंकिंग सिस्टम या गोल्ड स्टोरेज व्यवस्था पर भरोसा नहीं है. उसने भू-राजनीतिक जोखिम बढ़ने की बात जरूर कही है.

दरअसल, अमेरिका और कनाडा के बीच व्यापारिक तनाव बढ़ा हुआ है. दोनों देशों के बीच टैरिफ को लेकर विवाद चल रहा है. अमेरिका ने कनाडा के स्टील, एल्युमिनियम, इमारती लकड़ी और ऑटोमोबाइल जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर टैरिफ लगाए हैं.

ऐसे माहौल में केंद्रीय बैंकों के लिए जियोपॉलिटिकल रिस्क मायने रखता है. एक ट्रेड वार, आर्थिक प्रतिबंध, टैरिफ लगाना, डॉलर में अस्थिरता और इंटरनेशनल पेमेंट सिस्टम में तनाव भी जोखिम की वजह बन सकते हैं.

ऐसे में अपने रिजर्व असेट को ऐसे जगह रखना जरूरी होता है जहां उसका इस्तेमाल जल्द से जल्द किया जा सके. नीदरलैंड ने वही किया.

भारत के लिए इसका क्या मतलब है?

भारत के पास भी बड़ा गोल्ड रिजर्व है. नीदरलैंड का यह कदम ग्लोबल रिजर्व मैनेजमेंट की दिशा को समझने के लिए महत्वपूर्ण है. क्योंकि भारतीय रिजर्व बैंक भी समय समय पर अपनी गोल्ड होल्डिंग और उनकी स्टोरेज लोकेशन को लेकर कदम उठाता रहता है. हालांकि, भारत के लिए यह घटनाक्रम सीधे तौर पर कोई तत्काल खतरा नहीं है.

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