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लगातार 12वीं तिमाही में उम्मीद से ज्यादा ग्रोथ... वो 'सीक्रेट' जिस कारण बढ़ रही भारत की GDP

भारतीय अर्थव्यवस्था में तेजी बनी हुई है. 2026-27 की पहली तिमाही में जीडीपी ग्रोथ रेट 7.8% रहने का अनुमान है. क्या है इसकी वजह?

लगातार 12वीं तिमाही में उम्मीद से ज्यादा ग्रोथ... वो 'सीक्रेट' जिस कारण बढ़ रही भारत की GDP
पहली तिमाही में जीडीपी में 7.8% की ग्रोथ का अनुमान है. (सांकेतिक तस्वीर)
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वैश्विक झटकों के बावजूद मजबूत होती भारतीय अर्थव्यवस्था के पीछे एक वजह प्राइवेट इन्वेस्टमेंट को भी माना जा रहा है. भारत एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है. अप्रैल-जून तिमाही में भारत की जीडीपी ग्रोथ रेट 7.8% रही, जो लगातारा 12वीं तिमाही में अर्थशास्त्रियों के अनुमान से बेहतर प्रदर्शन है. 

एक ओर,  पश्चिम एशिया में तनाव के कारण तेल की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं और भारत अपनी जरूरत का 88% से ज्यादा तेल आयात करता है तो दूसरी ओर, विदेशी निवेशक लगातार पैसा निकाल रहे हैं और भारतीय रुपया कमजोर हो रहा है. ऐसे में उम्मीद से बेहतर ग्रोथ भारत को फायदा पहुंचा रही है.

अच्छे आंकड़ों की वजह क्या?

GDP के अच्छे आंकड़ों के पीछे की बड़ी बात यह है कि अब विकास मुख्य रूप से खपत और सरकारी खर्च से नहीं हो रहा है. कई सालों से पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर पर किए जा रहे खर्च की वजह से अब प्राइवेट इन्वेस्टमेंट भी बढ़ रहा है. अप्रैल-जून तिमाही में इन्वेस्टमेंट में 11.9% की बढ़ोतरी हुई है.

फिर भी, रोजगार के मामले में स्थिति कमजोर बनी हुई है. क्योंकि अर्थव्यवस्था का ऑटोमेशन, सेमीकंडक्टर और डेटा सेंटर की ओर तेजी से झुकाव होने के कारण, इन्वेस्टमेंट के हर डॉलर से पहले के मुकाबले अब कम नौकरियां पैदा हो रही हैं.

सिटी के एनालिस्ट्स ने सोमवार को एक नोट में कहा, 'कोविड के समय की अस्थिरता को छोड़ दें, तो यह 2018 के आखिर के बाद से सबसे मजबूत रियल इन्वेस्टमेंट का आंकड़ा है और यह कॉर्पोरेट कैपेक्स (कैपिटल एक्सपेंडिचर) की रफ्तार में सुधार को पुख्ता करता है.'

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल-जून तिमाही में ग्रॉस फिक्स्ड कैपिटल फॉर्मेशन यानी मोटे तौर पर अर्थव्यवस्था में इन्वेस्टमेंट का हिस्सा एक साल पहले के 31.4% से बढ़कर 34.3% हो गया.

इंडस्ट्री चैंबर ASSOCHAM के महासचिव सौरभ सान्याल ने कहा, 'रेलवे, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सेमीकंडक्टर में इन्वेस्टमेंट बढ़ा है, जिससे आर्थिक विकास को सहारा मिला है.'

जानकारों का मानना है कि ऑटो, रिन्यूएबल एनर्जी और डिफेंस सेक्टर में प्राइवेट सेक्टर का इन्वेस्टमेंट तेजी से बढ़ा. उन्होंने कहा कि इस तिमाही में कैपिटल इन्वेस्टमेंट, खासतौर पर प्राइवेट सेक्टर का 5 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा बढ़ गया है.

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सरकारी से प्राइवेट सेक्टर की ओर

पिछले दो सालों में ज्यादातर समय, इन्वेस्टमेंट में बढ़ोतरी मुख्य रूप से सरकारी इंफ्रास्ट्रक्चर खर्च पर निर्भर रही, जबकि टैक्स में कटौती और राज्य के स्तर सरकारी मदद ने कंज्यूमर डिमांड को बनाए रखने में मदद की.

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 2026-27 में इंफ्रास्ट्रक्चर पर 12.2 लाख करोड़ रुपये खर्च करने का प्रस्ताव दिया है, जो पांच साल पहले के खर्च से दोगुना से भी ज्यादा है.

एनालिस्ट और बैंकरों का कहना है कि सरकारी खर्च से प्राइवेट इन्वेस्टमेंट को बढ़ावा मिल रहा है. यह बैंक क्रेडिट में भी दिखता है. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के डेटा के अनुसार, 31 जुलाई तक इसमें 19% से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई, जो पिछले एक दशक में सबसे तेज रफ्तार है, जबकि इंडस्ट्री को दिए जाने वाले क्रेडिट में 20% की बढ़ोतरी हुई.

एक्सिस बैंक के CEO अमिताभ चौधरी ने पिछले महीने रॉयटर्स को बताया कि बड़ी कंपनियों, नॉन-बैंक लेंडर्स और गोल्ड लोन की वजह से डिमांड बढ़ रही है.

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टेक्नोलॉजी और मैन्युफैक्चरिंग से अगले दौर की शुरुआत

इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च तो मजबूत बना हुआ है, लेकिन भारत अब डेटा सेंटर, सेमीकंडक्टर और एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग में निवेश बढ़ाने पर जोर दे रहा है. गूगल और अमेजन जैसी बड़ी ग्लोबल टेक्नोलॉजी कंपनियों ने अगले पांच सालों में भारतीय डेटा सेंटरों में 40 अरब डॉलर से ज्यादा निवेश करने की योजना का ऐलान किया है.

एयरोस्पेस और डिफेंस सेक्टर में हाल की गतिविधियां इन महत्वाकांक्षाओं को दिखाती हैं, क्योंकि भारतीय कंपनियां और सरकारी एजेंसियां ​​स्वदेशी रॉकेट और एयरक्राफ्ट-इंजन टेक्नोलॉजी पेश कर रही हैं. 

न्यूज एजेंसी रॉयटर्स ने सिटी के डेटा के हवाले से बताया है कि लिस्टेड भारतीय कंपनियों ने मार्च 2026 तक अपने कैपिटल एक्सपेंडिचर में 11% की बढ़ोतरी की, जो पहले 8% थी.

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आगे क्या उम्मीद है?

उम्मीद है कि निवेश में यह सुधार 2027-28 तक जारी रहेगा. इंडस्ट्री बॉडी PHDCCI के प्रेसिडेंट राजीव जुनेजा ने रॉयटर्स से कहा, 'ऐसे कई संकेत हैं जिनसे लगता है कि स्ट्रक्चरल पहलू मजबूत हो रहा है. पिछले दशक में निवेश में आई सुस्ती के मुकाबले कॉर्पोरेट बैलेंस शीट अब काफी बेहतर स्थिति में हैं.'

हालांकि, इस आउटलुक में कुछ जोखिम भी हैं. तेल की ऊंची कीमतें, जियोपॉलिटिकल तनाव और रुपये की कमजोरी से इनपुट कॉस्ट बढ़ सकती है, जिससे महंगाई बढ़ सकती है और ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंची बनी रह सकती हैं.

HSBC के अर्थशास्त्रियों ने एक नोट में कहा, 'हालांकि अब तक GDP ग्रोथ अच्छी रही है, लेकिन इसमें थोड़ी नरमी आ सकती है.'

उन्होंने चेतावनी दी कि पब्लिक सेक्टर में कैपिटल एक्सपेंडिचर की धीमी रफ्तार, कम बारिश का असर, टैक्स कटौती से मिलने वाले सपोर्ट में कमी और पिछले साल के आंकड़ों से तुलना की वजह से साल के बाकी समय में ग्रोथ धीमी हो सकती है.

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