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युद्ध के इस दौर में कैसी होनी चाहिए हमारी अर्थनीति, डॉलर पर निर्भरता को घटाएं या बढ़ाएं?

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  • Updated:
    सितंबर 14, 2026 14:01 pm IST
    • Published On सितंबर 14, 2026 14:01 pm IST
    • Last Updated On सितंबर 14, 2026 14:01 pm IST
युद्ध के इस दौर में कैसी होनी चाहिए हमारी अर्थनीति, डॉलर पर निर्भरता को घटाएं या बढ़ाएं?

जब फरवरी के आखिर में अमेरिका और इजरायल ने ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान शुरू किया, तब लगभग सभी लोगों ने इसे एक ही नजरिए से देखा. हमें लगा कि यह एक ऐसा अचानक आया संकट है, जिसे कुछ समय तक झेलना पड़ेगा. कच्चे तेल की कीमत बढ़ेगी, रुपये पर दबाव आएगा, रसोई गैस सिलेंडर थोड़ा महंगा होगा और फिर कुछ समय बाद हालात सामान्य हो जाएंगे. लेकिन छह महीने बाद भी वह राहत नहीं मिली है. शुरुआती तेज संकट अब होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर लंबे समय से चल रहे संकट में बदल गया है. जब ऐसा लग रहा था कि क्षेत्र में स्थिति शांत हो रही है, तभी बार-बार नए हमले शुरू हो गए. इस युद्ध की सबसे महत्वपूर्ण बात अब इसकी गंभीरता नहीं, बल्कि इसका लगातार लंबा खिंचते जाना है.

अस्थायी संकट है या नई सामान्य स्थिति 

यह स्थिति हमें किसी एक चीज की बढ़ी हुई कीमत से कहीं ज्यादा चिंतित करनी चाहिए. किसी अचानक आए संकट को आमतौर पर ऐसी घटना माना जाता है, जो कुछ समय के लिए सामान्य स्थिति से अलग होती है और फिर हालात वापस सामान्य हो जाते हैं.लेकिन हम जिस स्थिति से गुजर रहे हैं, वह कोई अस्थायी बदलाव नहीं है. यह हमारी नई सामान्य स्थिति बनती जा रही है. हम बार-बार इसे सिर्फ एक अस्थायी संकट समझने की गलती कर रहे हैं.

देखिए, इस युद्ध से पहले भी दुनिया ने कितने संकट देखे हैं.2020 में कोरोना महामारी ने पूरी दुनिया को घरों में बंद कर दिया था. 2022 में रूस के यूक्रेन पर हमले ने ऊर्जा और खाद्य बाजारों को बुरी तरह प्रभावित किया. यह युद्ध अब पांचवें साल में पहुंच गया है. इसके जल्द खत्म होने के संकेत नहीं दिख रहे हैं. इसके बाद अमेरिका और दूसरे देशों के बीच टैरिफ यानी आयात शुल्क को लेकर व्यापार युद्ध शुरू हुआ. एक अनुमान के मुताबिक, सिर्फ एक साल में इससे 400 अरब डॉलर से ज्यादा का वैश्विक व्यापार प्रभावित हुआ. अब होर्मुज जलडमरूमध्य का संकट सामने है, जहां से दुनिया के करीब पांचवें हिस्से का तेल और गैस गुजरता है.

हमने इन सभी घटनाओं को ऐसे देखा जैसे हर बार एक आपात स्थिति आई है, जिसे किसी तरह पार करना है और फिर उसे पीछे छोड़ देना है. लेकिन जब ऐसे संकट एक के बाद एक आते रहें, तो वे केवल आपात स्थिति नहीं रह जाते. वे हमारी रोजमर्रा की आर्थिक और वैश्विक परिस्थितियों का हिस्सा बन जाते हैं. भारत के लिए 2019 के बाद से अब तक वास्तव में कोई ऐसा आर्थिक साल नहीं आया है, जिसे पूरी तरह सामान्य कहा जा सके.

पश्चिम एशिया के संकट में भारत के लिए सबक क्या है

भारत के लिए इस पूरे संकट का सबक सिर्फ तेल की कीमत बढ़ने तक सीमित नहीं है. हमारी असली कमजोरी यह है कि हमारी अर्थव्यवस्था एक साथ कई अस्थिर व्यवस्थाओं पर निर्भर है. हमारे आयातित गैस का बड़ा हिस्सा ऐसे समुद्री रास्ते से आता है, जो किसी भी समय बाधित हो सकता है. रुपये पर वैश्विक आर्थिक संकट के समय दबाव बढ़ जाता है. लाखों भारतीय परिवारों की आय विदेशों से आने वाले पैसे यानी रेमिटेंस पर निर्भर है. इसके अलावा वैश्विक व्यापार व्यवस्था के नियम भी तेजी से बदल रहे हैं.

भारत ने अपनी निर्भरता कम करने के लिए काफी प्रयास किए हैं. हमने रूस से ज्यादा तेल खरीदना शुरू किया है, होर्मुज के रास्ते पर निर्भरता कम करने के लिए दूसरे रास्तों से कच्चा तेल मंगाने की कोशिश की है और खाड़ी देशों के साथ नए समझौते किए हैं. ये प्रयास बेकार नहीं हैं. इनसे हमारी जोखिम वाली स्थिति कुछ कम होती है. लेकिन इससे हमारी पूरी निर्भरता खत्म नहीं होती. जब दुनिया में कई चीजें एक साथ बदल रही हों, तो केवल अलग-अलग स्रोतों से सामान खरीदकर सभी जोखिमों से बचना संभव नहीं है.

किसी घटना के वास्तव में होने से पहले भी अनिश्चितता की बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है. अगर किसी कंपनी को यह पता नहीं हो कि कच्चे माल की कीमत कितनी होगी, किसी व्यापारिक रास्ते पर सामान भेजना संभव होगा या नहीं या किसी बाजार के नियम क्या होंगे, तो वह अपने जोखिम को कम करने की कोशिश करेगी. वह निवेश टालेगी, फैसले लेने में देरी करेगी और ज्यादा सावधानी बरतेगी. ऐसा तब भी होगा, जब बाद में वह संकट वास्तव में आए ही नहीं.

आर्थिक नीति का मुख्य लक्ष्य क्या होना चाहिए

ऐसे दौर में, जब अचानक संकट लगातार आते रहते हैं, अनिश्चितता केवल संकट का एक छोटा प्रभाव नहीं है. यह हमारी अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले एक तरह के स्थायी अतिरिक्त बोझ की तरह है. हमारी हर योजना और हर निवेश पर इसका असर पड़ता है.

अगर समस्या यह है, तो हमारी रणनीति अभी भी मूल समस्या को ठीक करने के बजाय उसके लक्षणों का इलाज कर रही है. जिस आर्थिक व्यवस्था को हमने पिछले दौर में बनाया था, वह अपेक्षाकृत शांत और स्थिर दुनिया को ध्यान में रखकर बनाई गई थी. उसमें हर चीज को ज्यादा से ज्यादा कुशल और सस्ता बनाने पर जोर था, सबसे सस्ता सप्लायर, कम से कम सामान का भंडार, जरूरत पड़ते ही सामान की डिलीवरी और वैश्वीकरण से मिलने वाला फायदा. लेकिन अब यही व्यवस्था हमारे लिए कमजोरी बनती जा रही है, क्योंकि इसे ऐसी स्थिर दुनिया के लिए तैयार किया गया था, जो अब पहले जैसी नहीं रही. हमें आर्थिक मजबूती और संकट से निपटने की क्षमता यानी लचीलेपन को महंगा सुरक्षा इंतजाम मानना बंद करना होगा. इसे हमारी आर्थिक नीति का मुख्य लक्ष्य बनाना होगा.

व्यवहार में इसका मतलब कई स्तरों पर बदलाव करना है. ऊर्जा के क्षेत्र में केवल अलग-अलग देशों से तेल और गैस खरीदना पर्याप्त नहीं है. अगर वे सभी सामान एक ही समुद्री रास्ते से भेजते हैं, तो जोखिम बना रहेगा. इसलिए हमें ऊर्जा के स्रोतों में भी विविधता लानी होगी. इसके लिए नवीकरणीय ऊर्जा को तेजी से बढ़ाना होगा, परमाणु ऊर्जा की क्षमता बढ़ानी होगी और ऐसे रणनीतिक भंडार तैयार करने होंगे, जो कुछ दिनों के नहीं बल्कि लंबे संकट का सामना कर सकें.

व्यापार के क्षेत्र में हमें उस चीज में प्रतिस्पर्धा करनी चाहिए जिसकी आज दुनिया में सबसे ज्यादा कमी है, वह है भरोसेमंद और स्थिर व्यवस्था. भारत को ऐसी दुनिया में, जहां नियम लगातार बदल रहे हैं, स्थिर और भरोसेमंद व्यापारिक नियमों वाला देश बनना चाहिए.

भारत के लिए कितनी जरूरी है डॉलर पर निर्भरता

वित्तीय क्षेत्र में विदेशी मुद्रा भंडार जरूरी हैं, लेकिन इसके साथ-साथ हमें डॉलर पर अपनी निर्भरता और डॉलर के उतार-चढ़ाव से होने वाले जोखिम को भी कम करना होगा. इसके लिए रुपये में व्यापार बढ़ाना और ज्यादा देशों के साथ आर्थिक साझेदारी करना जरूरी है.

रेमिटेंस यानी विदेशों से भारत आने वाले पैसे पर भी हमें लंबे समय से बहुत ज्यादा भरोसा रहा है. अब इसके साथ घरेलू स्तर पर कौशल विकास और रोजगार बढ़ाने की व्यवस्था भी मजबूत करनी होगी, ताकि खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्था में मंदी आने पर वहां काम करने वाले भारतीयों के परिवारों के लिए यह बड़ा घरेलू संकट न बन जाए.

इन सभी उपायों में पैसा खर्च होगा. अतिरिक्त क्षमता रखना, विकल्प तैयार रखना और रणनीतिक भंडार बनाना उस व्यवस्था की तुलना में महंगा है, जिसमें हर चीज को सिर्फ सबसे सस्ता और सबसे कुशल बनाने की कोशिश की जाती है. लेकिन अब हिसाब बदल गया है. ऐसी दुनिया में जहां संकट बार-बार आने वाले हैं, मजबूत और संकट झेलने वाली अर्थव्यवस्था बनाने की कीमत अब कमजोर और असुरक्षित व्यवस्था की कीमत से कम है. जो देश इसे सबसे पहले समझेंगे, वे आगे चलकर वैश्विक अर्थव्यवस्था के नियम तय करने में ज्यादा सक्षम होंगे.

यह युद्ध उन सभी अनुमानों से ज्यादा लंबा चल चुका है, जो हमने शुरुआत में लगाए थे. सच्चाई यह है कि यह आखिरी संकट नहीं होगा. यह आने वाले लंबे दौर में लगातार सामने आने वाली समस्याओं की सिर्फ मौजूदा कड़ी है. अब सवाल यह नहीं है कि भारत इस एक संकट से कैसे बाहर निकलेगा. असली सवाल यह है कि क्या हम ऐसी अर्थव्यवस्था बना पाएंगे, जो यह मानकर चले कि आगे भी संकट आते रहेंगे.

हमारी आर्थिक रणनीति इस युद्ध से ज्यादा लंबे समय तक चलने वाली होनी चाहिए. लेकिन अभी तक हमारी रणनीति बदलती हुई दुनिया के साथ पूरी तरह कदम नहीं मिला पाई है.

(डिस्क्लेमर: लेखक अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के पश्चिम एशिया और उत्तर अफ्रीका अध्ययन विभाग में पढ़ाते हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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