त्योहारों के इस मौसम में कंपनियां भले ही डिस्काउंट दे रही हों, लेकिन दिवाली के बाद आम आदमी की रसोई का बजट बिगड़ने वाला है. पाम ऑयल, चीनी और पैकेजिंग महंगी होने से FMCG कंपनियों की मुश्किलें बढ़ गई हैं. सितंबर तिमाही में बढ़ती लागत का असर कंपनियों के मुनाफे और ऑपरेटिंग मार्जिन पर पड़ा है. फिलहाल कंपनियां दिवाली के दौरान ग्राहकों की खरीदारी बनाए रखने के लिए बढ़ी लागत का कुछ बोझ खुद उठा रही हैं. लेकिन अगर कच्चे माल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो दिसंबर से साबुन, खाने-पीने की चीजों और रोजमर्रा के दूसरे सामान महंगे हो सकते हैं.
इनपुट कॉस्ट बढ़ने से FMCG कंपनियों की बढ़ी मुश्किलें
FMCG कंपनियों के लिए सितंबर तिमाही में कच्चे माल की बढ़ती कीमतें बड़ी चिंता बनकर सामने आई हैं. क्रूड से बनने वाले प्रोडक्ट्स, पैकेजिंग मटीरियल, पाम ऑयल और चीनी महंगी होने से कंपनियों की लागत बढ़ी है. इससे पिछले तीन महीनों में लागत को लेकर मिली कुछ राहत भी कम हो गई.
एक साल में पाम ऑयल 21% तो चीनी 18% महंगी
कंपनियों के मुनाफे पर असर
कच्चे माल की बढ़ती कीमतों की पूरी भरपाई प्रोडक्ट्स के दाम बढ़ाकर या खर्च घटाकर नहीं हो पा रही है. इसका सीधा असर कंपनियों के ऑपरेटिंग मार्जिन पर पड़ रहा है.तिमाही नतीजों से पहले के एनालिस्ट अनुमानों के मुताबिक, बड़ी कंज्यूमर कंपनियों के एक समूह का ऑपरेटिंग मार्जिन सालाना आधार पर करीब 45 बेसिस पॉइंट घट सकता है. कुछ कंपनियों के लिए यह गिरावट 150 बेसिस पॉइंट तक रहने का अनुमान था. कम कीमत वाले प्रोडक्ट्स बनाने वाली कंपनियों के सामने मुश्किल ज्यादा है. इनके ग्राहक कीमत को लेकर काफी सतर्क रहते हैं, इसलिए कंपनियां तुरंत बड़े दाम बढ़ाने से बच रही हैं. फिलहाल खरीदारी की लागत घटाने, कामकाज में बचत और सोच-समझकर कीमतें तय करने पर जोर है.
दिसंबर से बढ़ सकते हैं दाम
उनके मुताबिक, शहरों और गांवों, दोनों जगह मांग अभी मजबूत है. कंपनियां त्योहारों के दौरान ग्राहकों पर पूरी बढ़ी लागत का बोझ डालने से बच रही हैं. हालांकि, फेस्टिव सीजन खत्म होने के बाद कीमतें बढ़ाने पर विचार हो सकता है. कृषि उत्पादों के दाम और दुनिया के हालात को देखते हुए दिसंबर से कुछ प्रोडक्ट्स महंगे होने की संभावना है.कंपनियां खर्च संभालने के लिए डिस्काउंट और ऐड पर होने वाले खर्च में कटौती भी कर रही हैं.इसके जरिये उनकी कोशिश है कि लागत का असर कम हो, लेकिन ग्राहकों की खरीदारी पर ज्यादा दबाव न पड़े.
चीनी, तेल और कॉफी पर नजर
नेस्ले इंडिया के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर मनीष तिवारी ने भी पिछले हफ्ते बढ़ती महंगाई, खासकर खाने-पीने की चीजों की महंगाई को एक बड़ी चुनौती बताया था. नेस्ले इंडिया के मुताबिक, दिसंबर तिमाही में कॉफी और गेहूं की कीमतें एक सीमित दायरे में रह सकती हैं. चीनी और खाने के तेल की कीमतें ऊंचे स्तर पर स्थिर होने की उम्मीद है. खराब मौसम के कारण कोको की कीमतों में उतार-चढ़ाव बना हुआ है. वहीं, दूध की कीमतें सीजन के हिसाब से बढ़ी हैं, लेकिन दूध की सप्लाई बढ़ने पर इनमें राहत मिल सकती है.
ग्रामीण मांग पर भी रहेगी नजर
वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी छमाही में FMCG कंपनियों के लिए लागत और मांग, दोनों को संभालना चुनौती रहेगी. नवीन मालपानी के मुताबिक, आने वाले महीनों में भी कंपनियों पर लागत का दबाव रह सकता है. मुनाफे में अच्छी रिकवरी इस बात पर निर्भर करेगी कि कच्चे माल की कीमतें कितनी घटती हैं और पहले किए गए दाम बढ़ाने के फैसलों का कितना फायदा मिलता है.
अल नीनो ने भी बढ़ाई चिंता
अक्टूबर से दिसंबर के बीच अल नीनो की स्थिति मजबूत होने की आशंका ने भी चिंता बढ़ाई है. इसका असर खेती और खाद्य कीमतों पर पड़ सकता है, हालांकि यह मौसम और अलग-अलग इलाकों की परिस्थितियों पर निर्भर करेगा. फिलहाल खाद्य महंगाई बढ़ने की आशंका है. लेकिन अगर खाने-पीने की चीजें महंगी होती हैं या गांवों में लोगों की कमाई पर दबाव आता है, तो ग्राहक सस्ते ब्रांड चुन सकते हैं, छोटे पैक खरीद सकते हैं या खरीदारी कम कर सकते हैं. ऐसे में कंपनियों के लिए सिर्फ कीमतें बढ़ाना काफी नहीं होगा, उन्हें ग्राहकों की मांग भी बनाए रखनी होगी.
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