डॉलर के मुकाबले रुपया पिछले काफी दिनों से लगातार दबाव में है और 2026 में अब तक इसमें तेज कमजोरी देखने को मिली है. रुपया हाल में 97 के करीब पहुंच गया. ऐसे में सवाल उठ रहा है क्या डॉलर जल्द 100 रुपये पार कर सकता है? इसी बीच नीति आयोग के पूर्व वाइस-चेयरमैन और अर्थशास्त्री अरविंद पनगढ़िया ने RBI को साफ सलाह दी है कि सिर्फ 100 रुपये के स्तर से डरकर बाजार में आक्रामक दखल नहीं देना चाहिए.
हालिया दबाव के बीच रुपये ने कुछ राहत भी दिखाई. आज शुरुआती कारोबार में रुपया डॉलर के मुकाबले 18 पैसे मजबूत होकर 96.18 तक पहुंचा. इससे पहले यह रिकॉर्ड निचले स्तर के करीब पहुंच गया था. बाजार में RBI के USD 5 बिलियन buy-sell swap auction से भी भरोसा बढ़ा है, जिससे लिक्विडिटी और वोलैटिलिटी मैनेजमेंट में मदद मिल सकती है.
‘100 सिर्फ एक नंबर है', RBI को पैनिक नहीं करना चाहिए
अरविंद पनगढ़िया का कहना है कि 100 रुपये प्रति डॉलर सिर्फ एक मनोवैज्ञानिक आंकड़ा है, आर्थिक संकट का संकेत नहीं. उनके मुताबिक RBI को इस स्तर को बचाने के लिए जरूरत से ज्यादा डॉलर बेचकर फॉरेक्स रिजर्व पर दबाव नहीं डालना चाहिए. उनका मानना है कि अगर रुपया धीरे-धीरे कमजोर होता है, तो बाजार इसे बेहतर तरीके से अब्जॉर्ब कर सकता है.
क्यों कमजोर हो रहा है रुपया?
रुपये पर दबाव की सबसे बड़ी वजह अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की ऊंची कीमतें और भू-राजनीतिक तनाव हैं. भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए डॉलर की मांग बढ़ने से रुपये पर दबाव आता है. इसके अलावा ट्रेड डेफिसिट और करेंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) भी चिंता बढ़ा रहे हैं.
फॉरेक्स रिजर्व बचाने पर जोर
पनगढ़िया ने कहा कि अगर कच्चे तेल का संकट लंबा चलता है, तो RBI अगर लगातार डॉलर बेचकर रुपये को सहारा देता रहा, तो इससे फॉरेक्स रिजर्व घटेगा लेकिन स्थायी राहत नहीं मिलेगी. उनका संकेत साफ है करेंसी को आर्टिफिशियली सपोर्ट करने की बजाय नियंत्रित गिरावट बेहतर रणनीति हो सकती है.
महंगे शॉर्टकट से बचने की सलाह
उन्होंने डॉलर बॉन्ड जारी करने या NRI डॉलर डिपॉजिट पर ज्यादा ब्याज देने जैसे विकल्पों को भी महंगा और अस्थायी उपाय बताया. उनका कहना है कि ऐसे कदम लंबे समय में ज्यादा फायदे के बजाय लागत बढ़ा सकते हैं और मुख्य फायदा बड़े विदेशी निवेशकों को हो सकता है.
क्या 2013 जैसा करेंसी संकट आ सकता है?
पनगढ़िया के मुताबिक, फिलहाल भारत की स्थिति 2013 के मुकाबले काफी मजबूत है. उस समय महंगाई दोहरे अंक में थी, लेकिन अभी महंगाई नियंत्रण में है. बैंकिंग सिस्टम और मैक्रोइकोनॉमिक हालात भी पहले से बेहतर हैं. इसलिए कमजोर रुपया दबाव जरूर बना सकता है, लेकिन इसे तुरंत संकट मानना सही नहीं होगा.
अगर डॉलर 100 के पार गया तो आम आदमी पर क्या असर?
अगर डॉलर 100 रुपये के करीब या ऊपर जाता है, तो इसका असर सीधे आम लोगों पर पड़ सकता है...
- पेट्रोल-डीजल और कच्चे तेल की लागत बढ़ सकती है
- इंपोर्टेड सामान महंगे हो सकते हैं
- विदेश यात्रा और पढ़ाई का खर्च बढ़ सकता है
- महंगाई पर दबाव आ सकता है
- कंपनियों की लागत और व्यापार घाटा बढ़ सकता है
डॉलर का 100 रुपये तक पहुंचना बड़ा मनोवैज्ञानिक स्तर जरूर है, लेकिन एक्सपर्ट के मुताबिक यह अपने आप में आर्थिक संकट नहीं है. फिलहाल नजर कच्चे तेल की कीमतों, RBI की रणनीति और ग्लोबल टेंशन पर रहेगी. अगर बाहरी दबाव बढ़ता है तो रुपया कमजोर हो सकता है, लेकिन भारत की मौजूदा आर्थिक स्थिति 2013 जैसी नहीं मानी जा रही.
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