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क्रोनोलॉजी, कॉर्पोरेट कंपटीशन और कॉन्स्पिरेसी... एक्सपर्ट्स ने डिकोड किए अमेरिका में अदाणी ग्रुप की कानूनी जीत के मायने

Adani Group's Legal Victory in US Court- अमेरिका में अदाणी ग्रुप को मिली बड़ी कानूनी जीत. कोर्ट ने खारिज किए सभी मामले. विशेषज्ञों ने डिकोड किए क्रोनोलॉजी, कॉर्पोरेट कॉम्पिटिशन और कॉन्स्पिरेसी के '3C फैक्टर्स' के असली मायने. जानिए ग्रुप के वैश्विक विस्तार और फंडिंग पर क्या होगा असर.

अमेरिका में अदाणी ग्रुप को मिली जीत पर क्‍या कह रहें कानूनी एक्‍सपर्ट्स?

अमेरिका में भारतीय उद्योगपति गौतम अदाणी और उनके ग्रुप के खिलाफ चल रहे कानूनी मामलों को पूरी तरह से खत्‍म कर दिया गया है.  अमेरिकी न्याय विभाग ने अपने विवेकाधिकार का इस्तेमाल करते हुए इन सभी मामलों को आगे न बढ़ाने का फैसला किया है और केस वापस ले लिए हैं. इसके साथ ही, अमेरिकी सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज कमीशन (SEC) का सिविल सेटलमेंट भी पूरा हो चुका है. भारतीय उद्योग जगत के लिए ये बेहद महत्‍वपूर्ण खबर है. इस बड़े घटनाक्रम पर नीतिगत मामलों, कानून और अंतरराष्ट्रीय राजनीति के विशेषज्ञों ने विस्तार से मंथन किया है और उनका स्पष्ट मानना है कि ये केवल एक कानूनी जीत नहीं है, बल्कि इसके गहरे मायने हैं. एक्‍सपर्ट्स ने इसके पीछे 3C फैक्‍टर्स गिनाए- क्रोनोलॉजी, कॉरपोरेट कंपटीशन और कॉन्‍सपिरेसी. 

NDTV के एक खास शो में पहुंचे कानूनी एक्‍सपर्ट, राजनीतिक विशेषज्ञ और सीनियर अधिवक्‍ता ने माना कि इसके पीछे गहरे जियो-पॉलिटिकल (Geopolitical) और कॉर्पोरेट प्रतिद्वंद्विता के पहलू भी शामिल थे. जानकारों के अनुसार, इस फैसले से अदाणी समूह के वैश्विक विस्तार (Global Expansion), अंतरराष्ट्रीय फंडिंग और इन्वेस्टर सेंटीमेंट को एक नई और बेहद तेज रफ्तार मिलने वाली है. बता दें कि अदाणी समूह शुरू से ही इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज करता रहा है और अब, जबकि ये मामला बंद हो गया है, तो अदाणी ग्रुप के दावे सही साबित हो रहे हैं. 

ओफेक (OFAC) मामला, गैस इंपोर्ट और अमेरिकी बैंकों का दबाव: यतीश राजावत

नीतिगत मामलों के विशेषज्ञ और वरिष्ठ पत्रकार यतीश राजावत ने इस पूरे मामले को तीन अलग-अलग हिस्सों में बांटकर इसके तकनीकी और व्यावहारिक संदर्भ को समझाया है. उन्होंने स्पष्ट किया कि इस पूरे विवाद में तीन मुख्य केस शामिल थे- डिपार्टमेंट ऑफ जस्टिस (DoJ) का केस, सिक्योरिटी एंड एक्सचेंज कमीशन (SEC) का मामला और तीसरा सबसे महत्वपूर्ण 'ऑफिस ऑफ फॉरेन एसेट्स कंट्रोल' (OFAC) का केस.

राजावत के अनुसार, ओफेक (OFAC) वाले मामले में अदाणी समूह पर यह आरोप था कि उन्होंने ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंध होने के बावजूद वहां से गलत तरीके से एलपीजी (LPG) गैस का आयात किया था. लेकिन इस आरोप के बैकग्राउंड को समझना जरूरी है. जब ये चार्ज लगे थे, तब दुनिया भर की करीब 7,000 कंपनियों पर इसी तरह के आरोप थे, जिनमें कई अमेरिकी कंपनियां भी शामिल थीं. उस समय भारत को अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए एलपीजी की सख्त जरूरत थी और देश के हित में सही दामों पर गैस का आयात करना बेहद महत्वपूर्ण था. अब यह तय हो चुका है कि अदाणी समूह द्वारा जांच में पूरा सहयोग देने के बाद यह इन्वेस्टिगेशन खारिज हो रही है और एक तय पेनल्टी के साथ ये मामला पूरी तरह सुलझ गया है.

यतीश राजावत ने इसके आर्थिक और स्थानीय प्रभावों पर बात करते हुए बताया कि इन मुकदमों के कारण एक ऐसी स्थिति बन गई थी जिसके चलते अमेरिकी बैंक चाहकर भी अदाणी समूह के बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर या रिन्यूएबल एनर्जी के प्रोजेक्ट्स में पैसा नहीं लगा पा रहे थे. इससे अमेरिकी बैंकों को भारी नुकसान हो रहा था और वे एक बेहतरीन निवेश के अवसर को खो रहे थे. इसी वजह से खुद अमेरिका के भीतर से भी ओफेक और न्याय विभाग पर इन मामलों को खारिज करने का एक स्थानीय दबाव (Local Pressure) बन रहा था. अब इन केसेस के खत्म होने से अदाणी समूह के लिए वैश्विक स्तर पर डेट (Debt) रेज करना बेहद आसान हो जाएगा और अमेरिकी बैंक भी भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में खुलकर भाग ले सकेंगे, जिससे देश के विकास को भी गति मिलेगी.

ठोस सबूतों का अभाव, फर्जी केसेस और डिप्लोमैटिक चैनल्स का असर: स्वप्निल कोठारी

वरिष्ठ वकील स्वप्निल कोठारी ने इस पूरे घटनाक्रम को विशुद्ध रूप से कानूनी और रणनीतिक चश्मे से देखा है. उनका कहना है कि किसी भी कानूनी मामले के अदालत में टिकने के लिए ठोस सबूतों और स्पष्ट तथ्यों का होना सबसे पहली और अनिवार्य शर्त है. अमेरिकी न्याय विभाग का यह कहना कि उनके पास इस केस को आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं हैं, सीधे तौर पर यह दर्शाता है कि उनके पास अदाणी समूह के खिलाफ कोई मजबूत सबूत थे ही नहीं.

कोठारी के मुताबिक, जब आपके पास ठोस सबूत नहीं होते और आप अदाणी जैसे दुनिया के इतने बड़े कॉर्पोरेट समूह के पीछे पड़ते हैं, तो अंततः खुद आपकी अपनी साख पर उंगलियां उठने लगती हैं. यही कारण है कि अमेरिकी एजेंसियों को समझ आ गया कि कोर्ट में यह मामला टिकने वाला नहीं है. इसके अलावा, स्वप्निल कोठारी ने संकेत दिया कि इस मामले को सुलझाने में बैक-चैनल्स और डिप्लोमैटिक (राजनयिक) संपर्कों ने भी अपनी भूमिका निभाई होगी, क्योंकि भारत की उन्नति में अदाणी समूह का बहुत बड़ा योगदान है और भारत सरकार के उच्चतम स्तर से भी यह संदेश गया होगा कि बिना सबूत के ऐसे मामलों को खींचा न जाए.

ओफेक (OFAC) के प्रतिबंधों पर कानूनी पक्ष रखते हुए कोठारी ने कहा कि अमेरिकी प्रतिबंध सीधे तौर पर किसी भारतीय कंपनी पर लागू नहीं होते. अदाणी समूह का अमेरिकी प्रतिबंधों को जानबूझकर वायलेट करने का कोई इरादा नहीं था. अमेरिकी एजेंसियां इस मामले में जरूरत से ज्यादा उत्तेजित (Over-enthusiastic) होकर काम कर रही थीं और यह केस पूरी तरह से फर्जी नजर आ रहा था. अदाणी समूह जैसी बड़ी कंपनियों के पास शीर्ष वकीलों की फौज और मजबूत वित्तीय ताकत होती है, जिसके दम पर वे पूरी तंदुरुस्ती से लड़ सकते हैं. अंततः, इस फर्जी मामले को हटाना ही अमेरिकी प्रशासन के लिए सबसे बेहतर विकल्प था.

सोलर सेक्टर में चीन का दबदबा और अंतरराष्ट्रीय साजिश: प्रो. संगीत रागी

दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और राजनीतिक विश्लेषक संगीत रागी ने इस पूरे मामले के पीछे एक गहरी अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक साजिश (Conspiracy Theory) और कॉर्पोरेट वॉर की बात कही है. उनका मानना है कि इस केस को केवल कानूनी नजरिए से नहीं, बल्कि इसके क्रोनोलॉजी और समय (Timing) के हिसाब से देखा जाना चाहिए.

प्रोफेसर रागी के अनुसार, अदाणी समूह मुख्य रूप से सोलर एनर्जी, पोर्ट्स और इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर बहुत तेजी से पैर पसार रहा है. दुनिया भर के सोलर एनर्जी सेक्टर और उसकी टेक्नोलॉजी पर इस समय चीन का एकछत्र दबदबा है. ऐसे में जब कोई भारतीय कंपनी चीन को सीधी टक्कर देते हुए दुनिया भर में अपना साम्राज्य बढ़ाती है, तो अंतरराष्ट्रीय प्रतिद्वंद्वियों को परेशानी होना स्वाभाविक है. हिंडनबर्ग की रिपोर्ट से लेकर अमेरिकी कोर्ट के इन मामलों तक, यह सब अदाणी समूह के ग्लोबल एक्सपेंशन को रोकने और उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर डैमेज करने का एक सोचा-समझा प्रयास था.

उन्होंने भारतीय राजनीति और राष्ट्रीय हितों का जिक्र करते हुए कहा कि वर्तमान भारत सरकार चाहती है कि देश के कॉर्पोरेट की धमक पूरी दुनिया में हो. जब अदाणी समूह जाकर ऑस्ट्रेलिया में निवेश करता है या श्रीलंका में चीन के बढ़ते प्रभाव के बीच अपना रणनीतिक पोर्ट खड़ा करता है, तो वह वास्तव में भारत के राष्ट्रीय हितों (National Interests) को सुरक्षित कर रहा होता है. ऐसे में घरेलू स्तर पर कुछ राजनीतिक ताकतों द्वारा बिना तथ्यों के इस मुद्दे को उठाना देश के विकास को बाधित करने जैसा था. अब अमेरिकी अदालतों द्वारा इस केस को पूरी तरह खारिज कर दिए जाने से यह साबित हो गया है कि यह मामला शुरू से ही एक सोची-समझी साजिश के तहत बुना गया था, जिसके पीछे कई वैश्विक और घरेलू कॉर्पोरेट प्रतिद्वंद्वी शामिल थे.

अदाणी ग्रुप के वैश्विक विस्‍तार को मिलेगी मजबूती 

अमेरिकी कोर्ट द्वारा गौतम अदाणी पर चल रहे सभी आपराधिक और नागरिक मामलों को पूरी तरह खारिज करने को एक्‍सपर्ट्स इस बात के प्रमाण के तौर पर देख रहे हैं कि उनके खिलाफ लगाए गए आरोप कानूनी रूप से बेहद कमजोर और बिना किसी ठोस एविडेंस के थे. विशेषज्ञों ने साफ किया कि इस फैसले के बाद अदाणी समूह के वैश्विक विस्तार, इन्वेस्टर सेंटीमेंट और अंतरराष्ट्रीय फंडिंग को एक अभूतपूर्व और सकारात्मक मजबूती मिलेगी. जियो-पॉलिटिकल राजनीति और कॉर्पोरेट प्रतिद्वंद्विता के चलते जो लीगल ओवरहंग पिछले दो वर्षों से समूह पर बना हुआ था, वह अब हमेशा के लिए खत्‍म हो गया है. 

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(Disclaimer: New Delhi Television is a subsidiary of AMG Media Networks Limited, an Adani Group Company.)

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