ब्रिक्स सम्मेलन के बाद चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग रविवार दोपहर स्वदेश रवाना हो गए. लेकिन दिल्ली-एनसीआर में बसे चीनी समुदाय के कई लोग निराश हो गए. ये वे परिवार हैं, जिनके पुरखे करीब सौ साल पहले भारत आकर बस गए थे. उन्हें उम्मीद थी कि शी जिनपिंग के साथ चीनी दूतावास में एक शिष्टाचार मुलाकात हो जाएगी. सुबह तक वे दूतावास से फोन का इंतजार करते रहे. लेकिन फोन नहीं आया.
चीनी दूतावास में मिले थे राष्ट्रपति से
शी जिनपिंग अपनी पिछली भारत यात्रा के दौरान चाणक्यपुरी स्थित चीनी दूतावास में दिल्ली-एनसीआर के चीनी मूल के भारतीय नागरिकों और संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों में काम करने वाले चीनियों से मिले थे. वह 2014 की बात है. तब वे पत्नी पेंग लियुआन के साथ ताज पैलेस में ठहरे थे, लेकिन समुदाय से मुलाकात दूतावास में ही हुई.
कनॉट प्लेस के एक जूते के शोरूम के मालिक जॉर्ज च्यू बताते हैं कि वह मुलाकात करीब दो घंटे चली थी. वहां डिनर की व्यवस्था भी थी. उस समय दिल्ली के क्रिकेटर एसएस ली और पहाड़गंज के डॉ स्टीफन चेन भी अपनी पत्नियों के साथ पहुंचे थे. ली का कुछ साल पहले निधन हो गया.
दिल्ली में तिब्बत मार्केट तो है, चाइनाटाउन नहीं
अनुमान है कि दिल्ली-एनसीआर में चीनी मूल के करीब 250 भारतीय नागरिक रहते हैं. आमतौर पर जहां चीनी समुदाय बसता है, वहां चाइनाटाउन बन जाता है. लेकिन राजधानी में ऐसा कोई इलाका नहीं है. पिछले कुछ सालों में कई युवा अन्य देशों में जाकर बस गए. एक अन्य युवा भारतीय मूल के चीनी कहते हैं कि काम-धंधे की व्यस्तता के कारण यहां के लोग अक्सर एक साथ नहीं मिल पाते. अगर राष्ट्रपति शी से मुलाकात का कार्यक्रम बन जाता, तो कम से कम सब एक जगह इकट्ठा हो जाते.

दिल्ली के कनॉट प्लेस में जूते का शोरूम चलाने वाले जॉर्ज च्यू उन लोगों में शामिल हैं, जो 2014 में चीनी दूतावास में आयोजित डिनर में शामिल हुए थे.
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इस यात्रा में चीनी राष्ट्रपति को राजधानी में तिब्बती शरणार्थियों के बड़े विरोध का सामना नहीं करना पड़ा, हालांकि प्रयास हुए थे. पिछली बार उनके होटल के बाहर कई बार तिब्बती पुलिस को चकमा देकर पहुंचे थे. जब भी कोई शीर्ष चीनी नेता भारत आता है तो दो धाराएं साथ चलती हैं. एक ओर रेड कारपेट और उच्चस्तरीय वार्ता, दूसरी ओर नारे, झंडे, दूतावास के बाहर धरना और पुलिस की घेराबंदी.
शी की यह यात्रा लगभग सात साल बाद हुई. पिछली बार वे 2019 में मामल्लपुरम आए थे. साल 2014 की यात्रा में हैदराबाद हाउस और होटल के बाहर 'फ्री तिब्बत' के नारे गूंजे थे. पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को रोका था. यही दृश्य 2012 में चीन के राष्ट्रपति हु जिंताओ के दिल्ली आगमन पर भी देखा गया था. उस समय जंतर-मंतर पर कार्यकर्ता जम्फेल येशी ने आत्मदाह कर दिया था. बाद में उनकी मृत्यु हो गई थी. उस दिन को जनपथ की तिब्बत मार्केट के कई दुकानदार अब भी याद करते हैं.
भारत में चीन का विरोध करते तिब्बती
तिब्बती समुदाय के लिए ये प्रदर्शन सिर्फ विरोध नहीं, स्मृति और अस्तित्व दोनों हैं. 10 मार्च 1959 को ल्हासा में चीनी शासन के खिलाफ विद्रोह हुआ था. उसके बाद 14वें दलाई लामा भारत आए. तब से हर वर्ष 10 मार्च को राष्ट्रीय विद्रोह दिवस मनाया जाता है और दिल्ली स्थित चीनी दूतावास के बाहर प्रदर्शन होते हैं. 2008 के बीजिंग ओलंपिक से पहले ये प्रदर्शन सबसे मुखर रहे थे. कनॉट प्लेस तक मार्च निकले, पुलिस से झड़प हुई और कुछ भारतीयों ने भी समर्थन दिया.
तिब्बत की नई पीढ़ी अब सोशल मीडिया से वैश्विक ध्यान खींचती है. दूतावास के बाहर बैनर, तिब्बती झंडे और 'तिब्बत इज बर्निंग' जैसे नारे उनके प्रतीक बन गए हैं. कभी-कभी कार्यकर्ता घेरा तोड़कर दीवारों के करीब पहुंच जाते हैं. पुलिस को महिलाओं और बुजुर्गों समेत भीड़ संभालनी पड़ती है. कार्यकर्ता कहते हैं कि लोकतंत्र में शांतिपूर्ण प्रदर्शन उनका अधिकार है. हिरासत को वे भारत की कूटनीतिक मजबूरी बताते हैं.
शी जिनपिंग ने जहां दिल्ली के चीनी मूल के भारतीयों को निराश किया, वहीं वे इस बात से संतुष्ट होंगे कि इस बार तिब्बती विरोध प्रदर्शन उनकी यात्रा के दौरान सफल नहीं हो पाया.
(डिस्क्लेमर: लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, वो देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में अलग-अलग विषयों पर लेख लिखते हैं.इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)