उत्तराखंड में मानसून की हर बारिश में अब सड़कें धंस रही हैं. जगह-जगह पहाड़ भी दरक रहे हैं. पिछले कुछ सालों में जोशीमठ धंसाव, सिलक्यारा सुरंग धंसने की घटना, केदारनाथ क्षेत्र में बार-बार आने वाली आपदाएं और चारधाम मार्ग पर लगातार हो रहे भूस्खलन हिमालयी क्षेत्र की बढ़ती संवेदनशीलता की ओर संकेत करते हैं.
अब भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) मद्रास के शोधकर्ताओं की एक रिपोर्ट ने इस चिंता को और गहरा कर दिया है. अध्ययन के अनुसार भारतीय हिमालयी क्षेत्र के जिलों में पश्चिमी हिमालय, जिसमें उत्तराखंड भी शामिल है, पूर्वी हिमालय की तुलना में जलवायु परिवर्तन से पैदा होने वाले खतरों के प्रति अधिक जोखिमग्रस्त पाया गया है.
भारत के हिमालयी जिलों में कितने में जोखिम
IIT मद्रास के शोधकर्ताओं कृष्णा मलाकर और आयुष शाह द्वारा तैयार अध्ययन 'Climate-change-induced risk mapping of the Indian Himalayan districts using the latest IPCC framework' में भारतीय हिमालयी क्षेत्र के 109 जिलों का विश्लेषण किया गया. शोध में जलवायु जोखिम का आकलन करने के लिए इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (IPCC) के नवीनतम ढांचे का इस्तेमाल किया गया.
इस अध्ययन में उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर सहित कई हिमालयी राज्यों को उच्च जलवायु जोखिम वाले क्षेत्रों में रखा गया है. हालांकि पूर्वी हिमालय में सामाजिक और आर्थिक कमजोरियां अधिक हैं, लेकिन प्राकृतिक खतरों और जोखिमों के मामले में पश्चिमी हिमालय आगे है.रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र में खतरों की तीव्रता और उनका प्रभाव अपेक्षाकृत अधिक दिखाई देता है.
भारत में सबसे अधिक खतरे वाला पहाड़ी जिला कौन सा है
अध्ययन में हिमाचल प्रदेश के शिमला जिले को पूरे भारतीय हिमालयी क्षेत्र का सबसे अधिक खतरे वाला जिला बताया गया है. इसके बाद पूर्वी सिक्किम का स्थान आता है. शोधकर्ताओं ने भूकंप, बाढ़, ठंड की लहर, बर्फबारी और ओलावृष्टि जैसी 11 भौतिक परिस्थितियों को आधार बनाकर जोखिम का आकलन किया है. अध्ययन में पाया गया कि पश्चिमी हिमालय के 47 जिलों में से 34 जिले उच्च या अत्यधिक जोखिम वाले वर्ग में आते हैं.यह निष्कर्ष इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश दोनों राज्यों में तेजी से सड़क, सुरंग और पर्यटन अवसंरचना का विस्तार हो रहा है.
उत्तराखंड पिछले एक दशक में कई बड़ी प्राकृतिक आपदाओं का सामना कर चुका है.साल 2013 की केदारनाथ त्रासदी में हजारों लोगों की जान गई थी. वहीं 2021 में चमोली जिले में ऋषिगंगा क्षेत्र में आई आपदा ने फिर दिखाया कि हिमालयी इलाकों में छोटे बदलाव भी कितने बड़े संकट का रूप ले सकते हैं.
साल 2023 में जोशीमठ में जमीन धंसने की घटना ने विकास परियोजनाओं, भूगर्भीय अस्थिरता और जलवायु परिवर्तन पर विमर्श को नए सिरे से शुरू कर दिया. इसके बाद से राज्य में भूस्खलन, बादल फटने और अतिवृष्टि की घटनाओं पर लगातार चिंता व्यक्त की जाती रही है.
आईआईटी रुड़की ने क्या चेतावनी दी है
IIT रुड़की के जल विज्ञान विभाग के शोधकर्ताओं स्पंदिता मित्रा, दिव्या सरदाना और अंकित अग्रवाल द्वारा किए गए अध्ययन 'Seasonal Shifts and Structural Changes in Western Disturbances Over Hindu Kush Himalayas' ने हिमालयी क्षेत्र के मौसम में आ रहे बदलावों को लेकर नई चिंता जताई है.
International Journal of Climatology में प्रकाशित इस अध्ययन में 1950 से 2022 तक के मौसम संबंधी आंकड़ों का विश्लेषण किया गया. शोधकर्ताओं ने पाया कि पश्चिमी विक्षोभों के स्वरूप और समय में बदलाव आ रहा है. पहले जहां इनकी सक्रियता मुख्य रूप से सर्दियों के महीनों में रहती थी, वहीं अब प्री-मानसून अवधि में भी इनके प्रभाव बढ़ने के संकेत मिल रहे हैं.
क्या केवल जलवायु परिवर्तन ही जिम्मेदार है?
अध्ययन के अनुसार इस बदलाव का असर वर्षा के पैटर्न पर पड़ सकता है. इससे हिमालयी क्षेत्रों में अतिवृष्टि, फ्लैश फ्लड और भूस्खलन जैसी घटनाओं का खतरा बढ़ सकता है. उत्तराखंड जैसे राज्यों में बड़ी आबादी पहाड़ी ढलानों पर रहती है और वहां महत्वपूर्ण सड़कें, पुल और अन्य अवसंरचनाएं मौजूद हैं. इसलिए मौसम में ऐसे बदलावों का असर यहां अधिक पड़ सकता है.
रिपोर्ट में यह भी लिखा है कि जोखिम का स्तर इस बात पर निर्भर करता है कि कोई समाज आपदा का सामना करने और उससे उबरने के लिए कितना तैयार है. यानी समस्या सिर्फ बढ़ती बारिश या बदलते मौसम की नहीं है.स्वास्थ्य सेवाएं,संचार व्यवस्था, रोजगार के अवसर,शिक्षा, सुरक्षित आवास और स्थानीय आजीविका भी किसी क्षेत्र की जलवायु संवेदनशीलता तय करते हैं. उत्तराखंड जैसे राज्य में जहां बड़ी आबादी पहाड़ी और दूरस्थ क्षेत्रों में रहती है, वहां यह चुनौती और जटिल हो जाती है.
केदारनाथ हादसे से क्या सीख मिली
रिपोर्ट में 2013 की केदारनाथ आपदा का जिक्र करते हुए बेहतर संचार व्यवस्था और शुरुआती चेतावनी प्रणाली को बेहद महत्वपूर्ण बताया गया है. शोधकर्ताओं का मानना है कि दूरदराज के इलाकों तक सूचना तेजी से पहुंचाने की व्यवस्था विकसित की जाए तो जान-माल के नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है. इसके साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़ाने, स्वास्थ्य सुविधाओं को मजबूत करने, शिक्षा तक पहुंच आसान बनाने और कृषि पर निर्भरता कम कर आय के विविध स्रोत विकसित करने की भी सिफारिश की गई है.
(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)