ब्लैक फंगस के मरीजों की संख्या क्यों नहीं बताती है सरकार?

ब्लैक फंगस की बीमारी के मामले न सिर्फ बढ़ते जा रहे हैं बल्कि इसके इंजेक्शन को हासिल करना भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है. लेकिन अधिकृत रूप से आपको नहीं बताया जाता है कि भारत में ब्लैक फंगस के कितने मरीज़ हैं. जबकि सरकार ने इसे महामारी के रूप में नोटिफाई किया है.

ब्लैक फंगस की बीमारी के मामले न सिर्फ बढ़ते जा रहे हैं बल्कि इसके इंजेक्शन को हासिल करना भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है. लेकिन अधिकृत रूप से आपको नहीं बताया जाता है कि भारत में ब्लैक फंगस के कितने मरीज़ हैं. जबकि सरकार ने इसे महामारी के रूप में नोटिफाई किया है. मतलब किसी प्राइवेट डॉक्टर के पास भी ब्लैक फंगस का मरीज़ आएगा तो उसे सरकार को बताना होगा. जब यह महामारी है तब केंद्र सरकार हर दिन क्यों नहीं बताती है कि ब्लैक फंगस के मरीज़ों की संख्या कितनी है. सरकार के पास संख्या है लेकिन आपको नहीं बता रही है. 26 मई को रसायन व उवर्रक मंत्री सदानंद गौड़ा ने ट्वीट किया था कि भारत में 25 मई तक ब्लैक फंगस के 11,717 मामने हैं, इसके बाद से केंद्रीय स्तर पर इस तरह की कोई संख्या नहीं दी जाती है. क्या इसलिए आप नागरिकों को अंदाज़ा ही न हो कि कितने मरीज़ हैं और उन पर क्या बीत रही है. पहले से कोविड की स्टोरी को छोड़ने का बहाना खोज रहा गोदी मीडिया ब्लैक फंगस से भी नज़र फेर ले और आपको पता ही न चले कि इस बीमारी के इलाज में लोगों पर क्या बीती है. ख़र्चा कितना आया है.

30 मई को कर्नाटक से डॉ रघुराज हेगड़े ने ट्वीट किया कि अम्फोटेरिसीन B की ख़राब सप्लाई के कारण पिछले हफ्ते एक मरीज़ की आंख निकालनी पड़ी क्योंकि उसका संक्रमण दूसरी आंख में भी फैलने लगा था. हम क्यों इस हालत के लिए मजबूर हैं. सरकारों ने ब्लैक फंगस दवा हासिल करने की लंबी चौड़ी सरकारी प्रक्रिया तो बना दी ताकि काला बाज़ारी न हो लेकिन इसके बाद भी इस दवा को हासिल करना मुश्किल भरा काम है. दवा तो पूरी नहीं मिल रही है और इसके इलाज का ख़र्चा भी परिवार को तबाह कर रहा है.

1 जून को दिल्ली से 36 साल के जतिन मक्कड़ के लिए मंदद मांगी गई कि अम्फोटेरिसिन B इंजेक्शन के 120 वायल चाहिए. अर्जेंट. उनका इलाज मैक्स पटपड़गंज में चल रहा है और स्थिति गंभीर है. यहां लोगों को दो इंजेक्शन नहीं मिल रहे हैं, 120 इंजेक्शन खोजना मक्कड़ परिवार के लिए कितना मुश्किल साबित हो रहा होगा. इसका मतलब है कि मरीज़ को ही दवा का बंदोबस्त करना पड़ रहा है. सरकार की तरफ से उपलब्ध कराने की जो भी व्यवस्था बनी है वो पर्याप्त नहीं है. सरकार सबको ज़रूरत के हिसाब से दवा नहीं दे पा रही है.

1 जून को कोलकाता से ममता अग्रवाल ने ट्वीट किया है कि उनके पिता परबन अग्रवाल को 9 दिनों तक 50mg हर दिन चाहिए लेकिन इस वक्त उनके पास एक भी इंजेक्शन नहीं है. 1 जून को मयंक झा ने भी कोलकाता से ट्वीट किया है कि उनके पिता AMRI अस्पताल में भर्ती है और लिपोसोमल अम्फोटेरिसिन B कहीं नहीं मिल रहा है. उनकी ज़िंदगी ख़तरे में हैं. 49 वायल चाहिए.

कोई देख रहा है कि पिता की जान किसी भी वक्त जा सकती है और दवा नहीं है. मुसीबत में वह किसी न्यूज़ एंकर को टैग करता है तो प्रधानमंत्री को करता है तो रेल मंत्री को करता है लेकिन दवा नहीं है. आश्वासन और आयात निर्यात की सूचना पकड़ा कर इस देश में मरीज़ों को उनके हाल पर छोड़ दिया गया है. हमने कुछ मरीज़ों के परिजनों से बात की. उन सब पर दवा के इंतज़ाम का दबाव तो है ही, इलाज का खर्चा भी किसी का दस लाख तो किसी का 20 लाख हो चुका है. मीडिया के सामने आने से कतराते हैं. उनकी चिन्ता समझी जा सकती है. उन्हें लगता है कि मीडिया में आने से इलाज प्रभावित होगा और सरकारी अधिकारी दवा देने में दिक्कत करेंगे. इस प्रक्रिया को सेल्फ ब्लैकमेल सिंड्राम कहते हैं. सिस्टम ऐसा चक्र बनाता है कि नागरिक अपने आप ही ब्लैक मेल होने लगता है. ऑटोमेटिक रूप से. वह जानता है कि न बोलने से भी दवा नहीं मिल रही है, लाखों का खर्च भी हो रहा है, जान भी नहीं बच रही है तब भी चुप रहने का फैसला करता है. ऐसे कई मामलों को लेकर हमने वकील के के सिंह से बात की जो दिल्ली हाई कोर्ट में ऐसे मामलों के लिए लड़ रहे हैं. के के सिंह की बातों से इसका अंदाज़ा तो होता ही है कि ब्लैक फंगस के मरीज़ों पर क्या बीत रही है.

सरकार जो दवा उपलब्ध करा रही है वह पर्याप्त नहीं है. किसी को चाहिए छह इंजेक्शन तो मिल रहा है तीन इंजेक्शन. आज चाहिए तो मिल रहा है कल. बल्कि चार चार दिन बाद. देरी होने से ब्लैक फंगस तेज़ी से पसरने लगता है. मरीज़ का परिवार लाखों रुपये के कर्ज़ में डूबने लगता है. इसीलिए इलाज का खर्चा सरकार को देना चाहिए क्योंकि उसके कर्तव्य न निभाने के कारण परिवार कर्ज़ में डूबा है. दिल्ली हाई कोर्ट में इस इंजेक्शन की कमी को लेकर 20 मई से सुनवाई चल रही है. अदालत की सख्त टिप्पणियां तो आ जाती हैं लेकिन उसके बाद भी इंजेक्शन नहीं मिल रहा है. दिल्ली सरकार हर दिन बता रही है कि उसके पास इंजेक्शन की कमी है. जबकि दिल्ली में ब्लैक फंगस के मरीज़ों की संख्या 1000 से अधिक मरीज़ हो चुकी है.

सभी को पता होना चाहिए था कि ब्लैक फंगस के मामले दुनिया में सबसे अधिक भारत में होते हैं. पिछले साल केस कम थे लेकिन तब भी ब्लैक फंगस के मामले सामने आए थे. दिसंबर 2020 में दिल्ली के गंगाराम अस्पताल में ब्लैक फंगस के 13 मामले आए थे. ये खबर कई जगहों पर छपी है. तभी ख़तरे की आहट का अंदाज़ा हो जाना चाहिए था और इसकी दवा का बंदोबस्त भी होना था और इसे लेकर जागरुकता शुरू कर देनी चाहिए थी. लेकिन क्या ऐसा किया गया। जवाब आप जानते हैं.

हमारी सहयोगी पूजा भारद्वाज ने पिछले साल मुंबई से 14 दिसंबर को ही ब्लैक फंगस पर रिपोर्ट फाइल की थी. उस रिपोर्ट में पूजा ने बताया था कि ब्लैक फंगस से अहमदाबाद में दो लोगों की मौत हुई है और दो लोगों की आंखें निकाली गई हैं. पूजा ने अपनी रिपोर्ट में रेटीना एंड ऑक्यूलर ट्रॉमा सर्जन डॉ पार्थ राणा का बयान दिखाया था जिसमें डॉ राणा ने कहा था कि पहले एक हज़ार केस में 7 मामले ब्लैक फंगस के आ रहे थे तो अब 20 आ रहे हैं. ये दिसंबर 2020 की बात है.

दिसंबर 2020 में अहमदाबाद और मुंबई में ब्लैक फंगस को लेकर अलर्ट जारी किया गया था. पांच महीने बाद दूसरी लहर में पूजा दस मई को ब्लैक फंगस पर ही पहली रिपोर्ट फाइल करती है. जिसमें बताया था कि मुंबई के सायन अस्पताल में डेढ़ महीने में ब्लैक फंगस के 30 मरीज़ आए थे जिनमें से छह की मौत हो गई. 11 लोगों की आंखें निकाली गईं. पूजा की रिपोर्ट में एक डाक्टर ने कहा था कि एक सप्ताह में ब्लैक फंगस के पांच पांच मरीज़ आए थे.

महाराष्ट्र में आठ दिन के भीतर ब्लैक फंसग के मरीज़ों की संख्या डबल से अधिक हो गई है. 4 मई को हमारी सहयोगी वृंदा के पास वसुंधरा पवार का मैसेज आया था कि मां को म्यूकर माइकोसिस हुआ है और डाक्टर ने कहा है कि पंद्रह दिन का इलाज है और हर दिन चार इंजेक्शन लगेंगे. कहीं से भी नहीं मिल रहा है. पूजा की रिपोर्ट 10 मई की है. यह हम इसलिए बता रहे हैं तकि पता चले कि मई तक सरकार और उसकी कमेटियां क्या कर रही थीं. शुरूआती मामलों को देखते ही इंजेक्शन के इंतज़ाम को लेकर सरकार को हरकत में आना चाहिए था, जो नहीं आई. सरकार की हालत ये थी कि 24 मई को मंत्रियों के समूह की बैठक में स्वास्थ्य मंत्री डॉ हर्षवर्धन कहते हैं कि भारत में ब्लैक फंगस के 5424 मरीज़ हैं. उसके दो दिन पहले रसायन मंत्री सदानंद गौड़ा ट्वीट करते हैं कि भारत में ब्लैक फंगस के मरीज़ों की संख्या 8848 है. दो दिन में 3,424 का फ़र्क़.

यही नही हर्षवर्धन के बयान के बाद सदानंद ग़ौड़ा ट्वीट कर बताते हैं कि अगले दिन 25 मई की सुबह तक भारत में ब्लैक फंगस के कुल मामले 11,717 हो चुके थे. आधे दिन में 6,293 मामलों की बढ़ोत्तरी हो जाती है. या तो ब्लैक फंगस इतनी तेज़ी से बढ़ रहा था या संख्या को लेकर सरकार के पास ही साफ-साफ जानकारी नहीं थी या सरकार साफ-साफ नहीं बता रही थी.

20 मई को स्वास्थ्य मंत्रालय ब्लैक फंगस को महामारी की आपदा घोषित करती है. 21 मई को पांच नई कंपनियों को ब्लैक फंगस की दवा के उत्पादन की अनुमति दी जाती है. कुल 11 कंपनियां उत्पादन करने लगेंगी और छह लाख इंजेक्शन के आयात का आर्डर भी दे दिया गया है. 21 मई को आयात की अनुमति देते है और 2 जून को निर्यात पर रोक लगाई जाती है. कितना शानदार काम हो रहा है आप समझ सकते हैं. 24 मई को ICMR ब्लैक फंगस पर एक अध्ययन प्रकाशित करता है. बताता है कि कोविड के जितने मरीज़ अस्पतालों में भर्ती है उनमें से 3.6% मरीज़ों को फंगस हो जाता है.

आप खबरों को खंगालें तो पता चलेगा कि ब्लैक फंगस को लेकर सरकार का हर बड़ा एक्शन 15 मई के बाद शुरू होता है. जबकि सितंबर 2020 में इस पर रिसर्च पेपर छप चुका था कि कोविड के मरीज़ों में ब्लैक फंगस देखा जा रहा है. आप सोचिए टास्क फोर्स के मेंबरान क्या कर रहे थे. क्या वे रिसर्च पेपर भी नहीं पढ़ते हैं. क्या यह बड़ी चूक नहीं है. आज इंजेक्शन की कमी से सब जूझ रहे हैं. लोग मर रहे हैं.

ब्लैक फंगस के मरीज़ों को उनके हाल पर छोड़ दिया गया है. फगवाड़ा की मेरी जोसेफ कोरोना के इलाज के दौरान ब्लैक फंगस से संक्रमित हो गईं. 40 साल की मैरी के परिवार वालों ने अम्फोटेरिसिन B के इंतज़ाम के लिए क्या क्या नहीं किया. पंजाब के सभी ज़िलों में पता किया कि इंजेक्शन कहां मिलेगा. उसके बाद मैरी के जानने वालों ने स्वास्थ्य मंत्री तक पहुंचने का रास्ता निकाला. दो दिन तो इंजेक्शन खोजने में ही लग गए. तब जाकर अमृतसर से 12 इंजेक्शन का इंतज़ाम हो सका. बाद में इंजेक्शन का मिलना बंद हो गया. इस बीच किसी ने एक नंबर भी दिया कि इस नंबर पर संपर्क करने से इंजेक्शन मिल जाएगा. 54000 उसके खाते में डालने के बाद पता चला कि फ्राड था. दवा की तलाश में लोग धोखा खाने में भी पैसे गंवा रहे हैं. क्या पता इस नंबर से यह ठग दूसरे मजबूर लोगों की जेब खाली कर रहा होगा. पूरी दवा न मिलने के कारण मेरी नहीं बच सकी. मेरी के इलाज के लिए उनके पति जोसेफ ने दोस्तों और रिश्तेदारों से चार लाख रुपये उधार लिए थे. 8 लाख खर्चा आया. कर्ज़ा भी हो गया और दो बेटियों की मां मैरी की जान भी नहीं बची. 

इसलिए कहता हूं ब्लैक फंगस के इलाज का खर्चा सरकार को भरना चाहिए. जितना पैसा झूठे विज्ञापनों पर खर्च होता है प्रोपेगैंडा करने में उसी से लोगों का इलाज हो सकता है. इंदौर की युक्ता यादव ट्वीट पर अपने पिता जयवीर यादव के लिए मदद मांगी थी. जयवीर यादव स्टेशन मास्टर हैं. 25 दिनों से ब्लैक फंगस का इलाज चल रहा है तो अंदाज़ा लगा लीजिए कि कितना खर्च हुआ होगा.

पटना एम्स में हर दिन पूरे बिहार से ब्लैक फंगस के मरीज़ पहुंच रहे हैं. एम्स अस्पताल सरकारी है तो यहां इलाज हो जा रहा है लेकिन दवा की दिक्कत तो है ही. लेकिन जिन लोगों को प्राइवेट में इलाज कराना पड़ रहा होगा उनकी क्या हालत होती होगी.

बिहार आने वाले मरीज़ों को अगर इंदिरा गांधी आर्युविज्ञान संस्थान और एम्स में बेड मिल गया तो उनकी किस्मत. जिस तरह से बिहार भर से मरीज़ आ रहे हैं कुछ समय बाद इन अस्पतालों के सामने फिर से बेड की समस्या खड़ी हो सकती है. फिलहाल बड़ी चुनौती है दवा की. एम्स पटना के ईएनटी विभाग में ब्लैक फंगस के मरीज़ों का इलाज चल रहा है. डॉ क्रांति भावना कहती हैं कि पिछले 12 दिनों में 45 मरीज़ों का ऑपरेशन करना पड़ा है. दवा अगर समय पर न मिले तो यह बीमारी और विकराल हो जाती है. मनीष से बात करते हुए डाक्टरों ने बताया कि आपरेशन के बाद भी उसी दवा की ज़रूरत होती है. इसलिए लंबे समय के लिए मरीज़ के लिए दवा होनी चाहिए. यही नहीं शहर और गांव के लोगों को कोविड के बाद सफाई पर विशेष ध्यान देने की जररूत है.

पूर देश में ब्लैक फंगस की दवा की कमी है केवल बिहार में नहीं है. स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडे का कहना है कि बिहार में हर दिन के हिसाब से दवा है. और ब्लैक फंगस के मरीज़ों की दवा अपने खर्चे पर दे रही है. 


अस्पतालों में आक्सीजन की कमी से मरना लोगों की गलती नहीं थी. सरकार की कमी थी. दिल्ली सरकार ने 4 सदस्यों की कमेटी बनाई है. यह कमेटी अस्पतालों में आक्सीजन की कमी से जान गंवाने वाले लगों को मुआवाज़ा देना चाहती है. सरकार ने फैसला किया है कि ऐसे पीड़ितों के परिवार को पांच रुपये दिए जाएंगे.

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यही ठीक कदम है. अस्पताल में आक्सीजन की कमी से मरने वालों को मुआवज़ा मिलना ही चाहिए. राज्य की तरह केंद्र को भी देना चाहिए. Pandemic और epidemic के अंतर में उलझने की ज़रूरत नहीं है. भारत में इस वक्त दो दो महामारियां चल रही हैं. कोरोना और ब्लैक फंगस की. सरकार कहती है वह लड़ रही है. सफलतापूर्व दूसरी लहर को नियंत्रित कर लिया. लेकिन दवा आप खोज रहे हैं आज तक खोज रहे हैं. और इलाज का लाखों खर्चा आप चुका रहे हैं. आपकी तबाही हो रही है. सरकार की वाहवाही हो रही है.