- मुंढे ने खाद्य सुरक्षा नियमों का सख्ती से पालन कराने के लिए कई रेस्तरां और होटलों के लाइसेंस रद्द किए.
- मुंढे ने न्यायालय की कैंटीन पर छापा मारकर अपनी कड़ी कार्रवाई और बेबाक रवैये का परिचय दिया.
- गोविंद खैरनार ने मुंबई में अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम की अवैध इमारतों को तोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
'बॉम्बे हाई कोर्ट ने एफडीए कमिश्नर को फटकार लगायी तो अगले दिन एफडीए कमिश्नर ने हाई कोर्ट की कैंटीन पर ही छापा मार दिया.' लेकिन सालों बाद अगर महाराष्ट्र कैडर में 2005 बैच के आई.ए.एस अधिकारी तुकाराम मुंढे की जीवनी लिखी जायेगी तो उनके परिचय में इस वाकये का जिक्र जरूर होगा. अबसे तीन महीने पहले जब मुंढे ने बतौर फूड एंड ड्रग्स एडमिनिस्ट्रेशन के कमिश्नर का चार्ज संभाला, तब से महाराष्ट्र के खानपान उद्योग में हडकंप मच गया. स्वच्छता नियमों की अनदेखी और लोगों की सेहत के साथ खिलवाड के आरोप में मुंढे ने राज्य के कई नामी-गिरामी रेस्तरां, आईसक्रीम पार्लर और डेयरी के लाईसेंस रद्द कर दिए. बडे बडे पांच सितारा होटलों के साथ साथ सरकारी कैंटीन पर भी मुंढे की गाज गिरी. एक होटल पर कार्रवाई को लेकर जब हाई कोर्ट ने मुंढे पर अति करने का आरोप लगाते हुए फटकारा तो अगले दिन मुंढे की टीम ने हाई कोर्ट की कैंटीन पर ही छापा मार दिया. अपने बेबाक और निडर तौर तरीकों और ईमानदार छवि की वजह से मुंढे काफी चर्चित हुए हैं. नियमों के आगे सत्ताधारी राजनेताओं की भी न सुनने वाले मुंढे का अपने 20 साल के करियर में 25 बार से ज्यादा तबादला हो चुका है. महाराष्ट्र में हाल के सालों में उनके जैसा नौकरशाह नहीं हुआ. अब मुंढे की तुलना 90 के दशक में उन्ही की तरह एक चर्चित हुए एक और अधिकारी से हो रही है. ये अधिकारी हैं गोविंद राघो खैरनार.
मुंढे की तुलना खैरनार से इसलिए की जा रही है, क्योंकि खैरनार भी अपनी ईमानदारी, निडरता और कर्तव्यनिष्ठा की वजह से जाने जाते थे. उनका भी सत्ताधारी राजनेताओं से छत्तीस का आंकडा रहा. मुंबई में खैरनार की पहचान महानगरपालिका के उस अधिकारी के तौर पर रही है, जिसने अंडरवर्लड डॉन दाऊद इब्राहिम की ईंट से ईंट बजा दी थी. खैरनार वो शख्स थे, जिनके नाम से अवैध निर्माण करने वाले आतंकित हो जाते थे. उन्हें मुंबई का बुलडोजर मैन कहा जाता था.
दाऊद की अवैश अवैध इमारतों की लिस्ट बनाई थी.
खैरनार ने 1964 में एक क्लर्क के तौर पर महाराष्ट्र सरकार की नौकरी शुरू की थी और आगे चलकर मुंबई महानगरपालिका के उपायुक्त बने. अपना पदभार संभालने के साथ ही उन्होने अवैध फेरीवालों के खिलाफ और दबंग राजनेताओं के अवैध निर्माण के खिलाफ कार्रवाई करनी शुरू की. जब 1993 में मुंबई बमकांड हुआ तो खैरनार ने दाऊद इब्राहिम की ओर से खडी की गई अवैध इमारतों की लिस्ट बनाई. इन तमाम इमारतों को तोडने के लिए खैरनार अचानक पहुंच जाते और उन्हें मलबे के ढेर में तब्दील कर देते.
जब दाऊद के शीशमहल को कर दिया था मलबे में तब्दील
खैरनार के निशाने पर पाकमोडिया स्ट्रीट की इमारत मेहजबीन भी आ गयी. ये आलीशान इमारत दाऊद ने अपनी पत्नी के नाम पर खड़ी की थी. कांच की दीवारों वाली ये इमारत तमाम सुख सुविधाओं से लैस थी. इसमें एक स्वीमिंग पूल था और इसके फर्श पर इटालियन मार्बल लगाये गये थे. इमारत के भीतर घुसने पर ऐसा महसूस होता था जैसे किसी पांच सितारा होटल में आ गये हो. एक दिन खैरनार बुलडोजर और बीएमसी मजदूरों की टीम के साथ यहां भी पहुंच गए. दिनभर तोड़फोड़ की कार्रवाई चली और फिर दाऊद के इस शीशमहल को मलबे के ढेर में तब्दील कर दिया. खैरनार का हथौडा सिर्फ दाऊद की इमारत पर नहीं, बल्कि अंडरवर्लड में उसके रसूख और मुंबई में उसके आतंक पर चला था इसके बाद खैरनार ने मुंबई के जवेरी बाजार में बमकांड के आरोपी टाईगर मेमल की भी आलीशान इमारत को धाराशायी कर दिया. टाईगर जब भारत में था तब यहीं से अपना दफ्तर चलाता था.
दाऊद के गुर्गे ने खैरनार पर किया था हमला
खैरनार अंडरवर्लड पर अपना हथौडा चलाते जा रहे थे. लेकिन इस मुहीम पर राजनेताओं ने ब्रेक लगाने की कोशिश की. खैरनार पर आरोप लगे कि वे समुदाय विशेष के इलाकों में ही अपनी कार्रवाई करते हैं. मोहम्मद अली रोड पर किताब की एक अवैध दुकान पर हथौडा चलाते वक्त पवित्र कुरान की प्रति जमीन पर गिर पड़ी, जिससे काफी बवाल हुआ और खैरनार पर मुसलिमों की धार्मिक भावनाओं को आहत करने का आरोप लगा. कार्रवाई के वक्त दाऊद के गुर्गे सलीम तलवार ने उनका घेराव किया और उन पर हमला करने की कोशिश की.
शरद पवार पर भी लगाए थे गंभीर आरोप
खैरनार की कार्रवाई का तत्कालीन सत्ताधारी पार्टी के राजनेताओं ने विरोध किया, जिसके बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री शरद पवार ने उनके पर कतरे. इसके बावजूद खैरनार ने अपनी मुहीम जारी रखी और शरद पवार के खिलाफ गंभीर आरोप लगाए. उन्हें अनुशासनहीनता और वरिष्ठों से दुर्व्यवहार के आरोप में निलंबित कर दिया गया. निलंबन के दौरान उन्होने भ्रष्टाचार के खिलाफ महाराष्ट्र भर में जनजागृति की मुहीम छेडी. वे जगह जगह जाकर सभाएं संबोधित करने लगे. ऐसी ही एक सभा में उन्होनें आरोप लगाया कि शरद पवार के दाऊद इब्राहिम से रिश्तों के ट्रकभर सबूत उनके पास हैं. हालांकि, खैरनार कभी उन सबूतों को पेश नहीं कर पाए. लेकिन उनके आरोपों की गंगा में शिव सेना-बीजेपी गठबंधन ने 1995 के विधान सभा चुनाव में अपने हाथ धो लिए. खैरनार के हथौडे से टूटी शरद पवार की छवि ने उन चुनावों में कांग्रेस की हार के रूप में अपना असर दिखाया. शिव सेना-बीजेपी गठबंधन पहली बार राज्य की सत्ता में आ गया और मनोहर जोशी नए मुख्यमंत्री बने. लेकिन ईमानदार अधिकारी को सिर पर बिठाने का जोखिम कोई सरकार नहीं लेना चाहती, फिर चाहे सत्ता में किसी भी पार्टी की क्यों न हो. महाराष्ट्र में सत्ता परिवर्तन के बाद जब खैरनार का निलंबन खत्म करने की बात आयी तो उसी शिव सेना ने उनका विरोध किया जो कांग्रेस के खिलाफ मुहीम चलाते वक्त खैरनार के साथ खडी थी. उस मौके पर खैरनार का समर्थन किसने किया? कांग्रेस ने!
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