पंजाब की राजनीति में एक बार फिर भाजपा (BJP) और शिरोमणि अकाली दल (SAD) के संभावित गठबंधन को लेकर चर्चाएं तेज हैं. हाल ही में SAD प्रमुख सुखबीर सिंह बादल की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात के बाद यह अटकलें बढ़ गई हैं कि लगभग छह साल बाद दोनों पुराने सहयोगी फिर साथ आ सकते हैं. हालांकि राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह राह उतनी आसान नहीं है जितनी दिखाई देती है.
कभी 23 वर्षों तक साथ रहने वाला भाजपा-अकाली गठबंधन पंजाब में शहरी हिंदू और ग्रामीण सिख वोटों के संतुलन का बड़ा उदाहरण माना जाता था. लेकिन 2020 में कृषि कानूनों के मुद्दे पर SAD ने NDA का साथ छोड़ दिया था. इसके बाद दोनों दल अलग-अलग चुनाव लड़े और दोनों को अपेक्षित सफलता नहीं मिली.
पहली चुनौती: भाजपा अब 'छोटा भाई' बनने को तैयार नहीं
पुराने गठबंधन में अकाली दल प्रमुख साझेदार था और अधिकांश सीटों पर चुनाव लड़ता था. भाजपा को सीमित सीटें मिलती थीं और उसका प्रभाव मुख्य रूप से शहरी क्षेत्रों तक था.
लेकिन पिछले कुछ वर्षों में भाजपा ने पंजाब की सभी 117 विधानसभा सीटों पर अपना संगठन मजबूत करने की कोशिश की है. पार्टी अब पहले की तुलना में ज्यादा सीटों की मांग कर सकती है. दूसरी ओर अकाली दल भी अपनी राजनीतिक जमीन छोड़ने को तैयार नहीं होगा. यही मुद्दा संभावित गठबंधन के सामने सबसे बड़ी बाधा माना जा रहा है.
दूसरी चुनौती: किसान आंदोलन की यादें अब भी ताजा
केंद्र सरकार तीन कृषि कानून वापस ले चुकी है, लेकिन पंजाब के किसानों में उस दौर की नाराजगी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है. MSP की कानूनी गारंटी, कर्ज माफी और कृषि से जुड़े कई मुद्दों को लेकर किसान संगठन लगातार सक्रिय हैं.
अकाली दल को डर है कि भाजपा से फिर हाथ मिलाने पर उसका पारंपरिक जाट सिख वोट बैंक नाराज हो सकता है. किसान संगठनों का एक वर्ग भी ऐसे गठबंधन को किसानों के मुद्दों से समझौता मान सकता है. ऐसे में ग्रामीण क्षेत्रों में दोनों दलों को राजनीतिक नुकसान का खतरा बना हुआ है.
तीसरी चुनौती: पंथक राजनीति और पहचान का सवाल
अकाली दल लंबे समय से खुद को पंथक पार्टी के रूप में प्रस्तुत करता रहा है. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में पार्टी की धार्मिक और राजनीतिक साख को झटके लगे हैं. सुखबीर सिंह बादल को 2024 में अकाल तख्त द्वारा तंखैया घोषित किए जाने के बाद पार्टी की छवि पर असर पड़ा. इसी दौरान अमृतपाल सिंह और सरबजीत सिंह खालसा जैसे उम्मीदवारों की चुनावी सफलता ने यह संकेत दिया कि पंथक राजनीति का एक हिस्सा अकाली दल से दूर हुआ है. ऐसे माहौल में भाजपा के साथ गठबंधन अकाली दल के लिए और मुश्किलें खड़ी कर सकता है क्योंकि विरोधी दल इसे मुद्दा बना सकते हैं.
चौथी चुनौती: पंजाब की राजनीति का बदला हुआ गणित
पंजाब अब पहले जैसा दो-दलीय मुकाबले वाला राज्य नहीं रहा. आम आदमी पार्टी (AAP) के उभार और कुछ कट्टरपंथी समूहों की राजनीतिक सक्रियता ने मुकाबले को बहुकोणीय बना दिया है.
2022 विधानसभा चुनाव में AAP ने ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ी बढ़त हासिल की थी. वहीं कांग्रेस भी अपनी पारंपरिक जमीन को मजबूत करने में लगी है. ऐसे में भाजपा और अकाली दल का साथ आना जीत की गारंटी नहीं माना जा रहा. राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अब पंजाब का मतदाता पहले की तुलना में कहीं ज्यादा बंटा हुआ है और पुराने वोट समीकरण पूरी तरह बदल चुके हैं.
पांचवीं चुनौती: जमीनी कार्यकर्ताओं की नाराजगी
पिछले छह वर्षों में भाजपा और अकाली दल के कार्यकर्ता एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ चुके हैं. इससे स्थानीय स्तर पर राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता बढ़ी है. भाजपा के भीतर भी पुराने नेताओं और दूसरे दलों से आए नेताओं के बीच असंतोष की खबरें सामने आती रही हैं. इसी तरह अकाली दल के कार्यकर्ताओं को भी सीट बंटवारे और स्थानीय नेतृत्व को लेकर आपत्तियां हो सकती हैं. सबसे बड़ा सवाल वोट ट्रांसफर का है. पहले जहां शहरी हिंदू वोट भाजपा के साथ और ग्रामीण सिख वोट अकाली दल के साथ आसानी से जुड़ जाते थे, अब वैसी स्थिति नहीं रही. यही वजह है कि गठबंधन होने की स्थिति में भी दोनों दलों को जमीनी स्तर पर काफी मेहनत करनी होगी.
यह भी पढ़ें- हालात बदल गए तो जज़्बात बदल गए…दिल्ली से रांची तक सेलेक्टिव गुस्सा और सेलेक्टिव चुप्पी!
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं