दिल्ली के जंतर मंतर पर नीट पेपर लीक के खिलाफ आंदोलन हुआ तो विपक्ष के तमाम नेता पहुंचे थे. अरविंद केजरीवाल, उद्धव ठाकरे, डिंपल यादव समेत कई नेताओं की मौजूदगी दिखी थी. इसके अलावा कांग्रेस के नेता राहुल गांधी और प्रियंका गांधी भी मंच तक नहीं गए, लेकिन सड़क पर प्रदर्शन कर समर्थन किया. फिर उसी तरह का आंदोलन जब रांची में जेपीएससी परीक्षा में धांधली को लेकर खड़ा हुआ तो माहौल अलग था. यहां भले ही विपक्षी दलों के नेता नहीं पहुंचे, लेकिन केंद्र की सत्ता पर काबिज भाजपा ने समर्थन किया. यहां तक कि मंगलवार को तो भाजपा ने राज्यव्यापी बंद भी किया.
रांची में भाजपा ने मार्च किया और दिल्ली में कांग्रेस मार्च करती दिखी. झारखंड में कांग्रेस ने अपने हिस्से की खामोशी ओढ़ ली तो दिल्ली के जंतर मंतर पर हुए आंदोलन से भाजपा के नेता कन्नी काटते दिखे. इस तरह दिल्ली से झांसी तक हालात ऐसे दिखे कि हालात बदल गए तो जज्बात बदल गए. भाजपा के नेता झारखंड में छात्र हितों के लिए तो लड़ते नजर आए, लेकिन दिल्ली में आकर उनके जज्बात बदल गए. इसी तरह दिल्ली में युवा, जेनजी और छात्र हित जैसी बातें करने वाले कांग्रेस समेत विपक्षी दलों के नेता झारखंड पर खामोश रहे. क्या अरविंद केजरीवाल, क्या अखिलेश यादव और क्या राहुल गांधी. सभी ने झारखंड को लेकर मुखरता नहीं दिखाई.
राहुल गांधी ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में झारखंड को लेकर यह जरूर कहा कि छात्रों पर हिंसा नहीं होनी चाहिए, लेकिन उसी दिन शाम को जब लाठीचार्ज का एक्शन हो गया तो कांग्रेस की कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखी. इस तरह अपने-अपने राजनीतिक हितों को देखते हुए सत्ता से लेकर विपक्ष तक ने अपने-अपने हिस्से की खामोशी भी ओढ़ ली. यही नहीं सदन में भी ऐसे ही हालात दिखे. नीट पेपर लीक के खिलाफ आंदोलन करने वालों पर लाठीचार्ज का कांग्रेस संसद में विरोध कर रही है. इसके चलते सदन नहीं चल पा रहा है. यहां भाजपा उस पर सदन का समय बर्बाद करने का आरोप लगा रही है.
रांची में ऐसे ही हालात हैं और वहां भाजपा आंदोलन की भूमिका में है और विधानसभा का कामकाज बाधित हो रहा है. इस तरह सड़क से सदन तक की लड़ाई में सब अपने हिस्से की राजनीति कर रहे हैं. बता दें कि पेपर लीक देशव्यापी मसला है. केंद्रीय स्तर पर परीक्षाएं लीक हो रही हैं तो किसी भी राज्य में हालात चिंताजनक रहे हैं. राजस्थान, यूपी, बिहार, हिमाचल और महाराष्ट्र तक तमाम राज्यों में पर्चा लीक एक समस्या रहा है. फिर भी सेलेक्टिव चुप्पी और सेलेक्टिव एक्टिविज्म दिखता रहा है. शायद यही वजह है कि पेपर लीक की समस्या से निपटने का कोई स्थायी समाधान नहीं मिल सका है. इसकी बजाय मामला राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक ही सिमटता रहा है.
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