बजट 2026–27 को केवल एक वित्तीय दस्तावेज के रूप में पढ़ना उसकी गंभीरता और दूरगामी महत्व को कमतर आंकना होगा. यह बजट नरेंद्र मोदी सरकार की राजनीतिक दृष्टि और रणनीतिक सोच का स्पष्ट बयान है. बजट के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने जिस स्पष्टता से अपनी बात रखी, उसमें एक केंद्रीय विचार बार-बार उभरा: एक अस्थिर, लेन-देन प्रधान और दबाव से भरी वैश्विक व्यवस्था में भारत अब रणनीतिक असहायता का जोखिम नहीं उठा सकता. यह बजट तात्कालिक सुख-सुविधाओं या लोकलुभावन तालियों के लिए नहीं, बल्कि दीर्घकालिक संप्रभुता और मजबूती के निर्माण के लिए है. प्रधानमंत्री ने यह स्पष्ट कर दिया कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं का सहज और उदार बना रहना अब इतिहास है. व्यापार, तकनीक, वित्त और लॉजिस्टिक्स अब भू-राजनीतिक हथियार बन चुके हैं. ऐसे परिवेश में उत्पादन के बिना उपभोग और मजबूती के बिना वृद्धि दोनों ही अस्थायी और खतरनाक हो सकते हैं. बजट 2026 की मूल भावना इसी राजनीतिक विश्लेषण से प्रवाहित होती है.
मोदी सरकार में बदलती शासन की भाषा
पिछले एक दशक में नरेंद्र मोदी की राजनीति ने शासन की भाषा को बदला है- अधिकार से सशक्तिकरण तक, सब्सिडी से व्यवस्था तक, केवल पुनर्वितरण से क्षमताओं के निर्माण तक. यह बजट उस परिवर्तन का अब तक का सबसे परिपक्व उदाहरण है. एक ऐसा दस्तावेज जिसे हम 'क्षमता की राजनीति' कह सकते हैं. सरकार ने सार्वजनिक पूंजीगत व्यय में भारी वृद्धि को जारी रखा है-2026–27 में ₹12.2 लाख करोड़ का आवंटन, जो 2013–14 की तुलना में लगभग पांच गुना है. यह कोई आर्थिक अनिवार्यता नहीं, बल्कि एक स्पष्ट राजनीतिक विकल्प है. जैसा कि प्रधानमंत्री ने बजट के बाद कहा—जो देश परिसंपत्तियां बनाते हैं, वे विकल्प बनाते हैं; जो केवल उपभोग करते हैं, वे निर्भरता बढ़ाते हैं. यह पूंजीगत व्यय उस आसान लोकलुभावन राह को भी खारिज करता है, जिसे कई लोकतंत्र संकट के समय चुनते हैं. नकद हस्तांतरण जैसी अल्पकालिक राहतों की जगह सरकार ने ऐसी अवसंरचना में निवेश को प्राथमिकता दी है जो दीर्घकाल में चक्रवृद्धि लाभ देती है-राजमार्ग, रेल, जलमार्ग, लॉजिस्टिक कॉरिडोर, ऊर्जा ग्रिड, डाटा सेंटर, इन्हें केवल परियोजनाएं नहीं, बल्कि रणनीतिक राष्ट्रीय परिसंपत्तियों के रूप में देखा गया है.

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बजट का सबसे तीव्र राजनीतिक संकेत उसके विनिर्माण दृष्टिकोण में झलकता है. दशकों तक भारतीय राजनीति ने विनिर्माण को केवल रोजगार सृजन के औजार के रूप में देखा. बजट 2026 इसे संप्रभुता की अनिवार्यता के रूप में देखता है. भारत सेमीकंडक्टर मिशन 2.0 इसका उदाहरण है—यह केवल असेंबली या पैकेजिंग नहीं, बल्कि पूरे इकोसिस्टम के निर्माण की घोषणा है- चिप डिजाइन से लेकर मटेरियल, उपकरण और भारतीय बौद्धिक संपदा तक. ₹40,000 करोड़ की इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट स्कीम भी इसी रणनीतिक आत्मनिर्भरता की पुष्टि करती है. यही सोच दुर्लभ पृथ्वी खनिज कॉरिडोरों, केमिकल पार्कों, कंटेनर निर्माण, टेक्सटाइल और पूंजीगत वस्तुओं के लिए योजनाओं में परिलक्षित होती है. ये सभी योजनाएं केवल उत्पादन नहीं, बल्कि भारत की तकनीकी आत्मनिर्भरता का कवच हैं. प्रधानमंत्री के शब्दों में,''आत्मनिर्भरता अलगाव नहीं, बीमा है.''
आर्थिक भूगोल का पुनर्निर्माण
डिजिटल अवसंरचना को भी आर्थिक नहीं, बल्कि रणनीतिक संसाधन के रूप में देखा गया है. साल 2047 तक भारत में स्थापित डाटा सेंटर्स को टैक्स में छुट देकर सरकार यह स्पष्ट कर रही है कि वह केवल डिजिटल उपभोक्ता नहीं, एक डिजिटल संप्रभु शक्ति बनना चाहती है. डेटा जहां संग्रहित और संसाधित होता है, वहीं से भविष्य की शक्ति-समीकरण तय होंगे. इससे न केवल कृत्रिम बुद्धिमत्ता और साइबर सुरक्षा में लाभ मिलेगा, बल्कि यह वैश्विक डिजिटल निर्भरता से मुक्ति का मार्ग भी प्रशस्त करेगा. यह एक मूक किन्तु प्रभावशाली संप्रभुता का दावा है.
इस बजट की अवसंरचना योजनाएं केवल तेज रफ्तार मार्ग या लंबी रेल लाइनें नहीं, बल्कि भारत के आर्थिक भूगोल के पुनर्निर्माण की कोशिश है. सात उच्च गति रेल कॉरिडोर अब केवल परिवहन साधन नहीं, बल्कि औद्योगिक समूहों, प्रौद्योगिकी हब और उभरते नगरों को जोड़ने वाले ग्रोथ कनेक्टर होंगे. इसी प्रकार, राष्ट्रीय जलमार्गों, लॉजिस्टिक्स सुधारों और डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोरों के माध्यम से सरकार लागत को कम कर भारत की प्रतिस्पर्धा को बढ़ाना चाहती है. इंफ्रास्ट्रक्चर रिस्क गारंटी फंड जैसी योजनाएं निजी पूंजी के झिझक को दूर करने और सार्वजनिक-निजी भागीदारी को सशक्त करने के उद्देश्य से लाई गई हैं. सरकार का यह परिपक्व दृष्टिकोण है, जो राज्य को केवल नियंत्रक नहीं, बल्कि उद्यमों का संरक्षक बनाता है.
प्रधानमंत्री ने इस बार के बजट में युवाओं और महिलाओं को सहयोगी के रूप में देखा है, न की कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थी के रूप में. यह सोच 'ऑरेंज इकॉनॉमी' यानी सांस्कृतिक और रचनात्मक उद्योगों को मान्यता देने में झलकती हैं. स्कूलों और कॉलेजों में एवीजीसी लैब्स की स्थापना, यूनिवर्सिटी टाउनशिप, कौशल विकास और शिक्षा से जुड़ी प्रक्रियाओं को सरल बनाना, ये सभी युवा आकांक्षाओं को अवसरों से जोड़ने की राजनीतिक रणनीति हैं. इतिहास में बहुत कम अवसर आते हैं जब कोई सरकार अपने ही बनाए राजकोषीय अनुशासन के मार्ग पर चुनावी वर्ष में भी अडिग रहती है.बजट 2026 में 4.3 फीसदी के राजकोषीय घाटे का लक्ष्य, सार्वजनिक ऋण के घटते अनुपात के साथ, एक स्पष्ट राजनीतिक संकेत है, राजकोषीय अनुशासन स्वयं राष्ट्रीय संप्रभुता की गारंटी है. राजकोषीय संतुलन के माध्यम से देश न केवल बाहरी झटकों से सुरक्षित रहता है, बल्कि निवेशकों और वैश्विक बाजारों में अपनी विश्वसनीयता भी बनाता है.

बजट में अवसंरचना योजनाएं केवल तेज रफ्तार मार्ग या लंबी रेल लाइनें नहीं, बल्कि भारत के आर्थिक भूगोल के पुनर्निर्माण की कोशिश है.
बजट में दिखता अंतरराष्ट्रीय आत्मविश्वास
इस वर्ष के बजट में रक्षा क्षेत्र के आवंटन में 15 प्रतिशत की वृद्धि भी उसी संप्रभुता केंद्रित नीति की कड़ी है. रक्षा खर्च में यह वृद्धि केवल सैन्य आधुनिकीकरण नहीं, बल्कि भारत की निरंतर बदलती सुरक्षा आवश्यकताओं और वैश्विक रणनीतिक संतुलन को ध्यान में रखते हुए की गई है. यह घरेलू रक्षा उत्पादन को प्रोत्साहन, निर्यात क्षमताओं का विकास और भारत की रणनीतिक संप्रभुता को मजबूत करने की दिशा में एक निर्णायक कदम है. आज की वैश्विक व्यवस्था, जहां नियमों की स्थिरता समाप्त हो रही है और व्यापार अब राजनयिक हथियार बन गया है, भारत का यह बजट एक स्पष्ट विकल्प प्रस्तुत करता है—निरंतरता पर निर्भरता के बजाय लचीलापन, खपत पर आत्मनिर्भरता और लोकप्रियता पर सुधार. यह न केवल घरेलू नीति का दस्तावेज है, बल्कि भारत के अंतरराष्ट्रीय आत्मविश्वास और स्थिति का सूचक भी है. यह बजट दिखाता है कि भारत अब केवल आर्थिक वृद्धि नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण रणनीतिक शासन की ओर अग्रसर है.
बजट 2026–27 किसी तात्कालिक तालियों या सुर्खियों के लिए नहीं बनाया गया है. यह भारत की आर्थिक अस्मिता और रणनीतिक स्वायत्तता के दीर्घकालिक निर्माण का एक संकल्प है. यह घोषणा करता है कि भारत मजबूती से, आत्मनिर्भरता के साथ और विश्व के दबावों के परे, अपनी आर्थिक नियति खुद रचेगा. यही इस बजट की सबसे बड़ी उपलब्धि है, यह बताता है कि भारत का भविष्य अब सुविधा या डर से नहीं, दूरदर्शिता और संकल्प से आकार लेगा.
डिस्क्लेमर: लेखक द इंडियन फ्यूचर्स थिंक टैंक के संस्थापक और दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज में एसोसिएट प्रोफेसर हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.