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21वीं सदी के 25 साल, कितने कमाल-कितने मलाल

प्रियदर्शन
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    जनवरी 02, 2026 22:56 pm IST
    • Published On जनवरी 02, 2026 18:56 pm IST
    • Last Updated On जनवरी 02, 2026 22:56 pm IST
21वीं सदी के 25 साल, कितने कमाल-कितने मलाल

देखते-देखते इक्कीसवीं सदी के 25 साल निकल गए- एक चौथाई सदी बीत गई. इन 25 सालों में दुनिया जैसे बिल्कुल बदल चुकी है. अगर साल 2000 में कोई सोया हुआ शख़्स 2026 में जागे तो ख़ुद को एक नई दुनिया में पाएगा. इस बदलाव की रफ़्तार इतनी तेज़ रही है कि दौड़ती हुई हमारी सभ्यता का दम फूलने लगा है.

1970 में ऐल्विन टॉफ़लर की किताब 'फ्यूचर शॉक' आई थी. टॉफ़लर मानव सभ्यता का एक मोटा हिसाब लगाता है. वह कहता है कि अगर बीते 50,000 सालों को 62 वर्ष के जीवन चक्र के हिसाब से बांटा जाए तो धरती पर क़रीब 800 जीवन चक्र बीत चुके. टॉफ़लर के मुताबिक इनमें 650 जीवन चक्र तो गुफाओं में कट गए. आख़िरी सत्तर जीवन चक्रों में मनुष्य ने एक जीवन चक्र से दूसरे जीवन चक्र तक अनुभव का हस्तांतरण सीखा- जब भाषा और लिखने की विधा विकसित हुई. आख़िरी 6 जीवन चक्रों में लोगों ने छपे हुए शब्द देखे. आख़िरी दो जीवन चक्रों में बिजली के मोटर का इस्तेमाल हुआ. टॉफ़लर कहता है कि बीते दो जीवन चक्रों में परिवर्तन की रफ़्तार इतनी तेज़ रही है कि उसने एक तरह का 'कल्चर शॉक'- सांस्कृतिक झटका- दिया है.

इसके बाद भी टॉफ़लर ने काफ़ी कुछ लिखा. मानव सभ्यता के तीन दौर की बात की- तीन 'वेव्स' की. उसने कहा कि पहली वेव कृषि क्रांति की थी जो कई हज़ार बरस चली. इसका समय नव पाषाण काल से शुरू होकर अठारहवीं सदी तक चला आता है. दूसरी वेव औद्योगिक क्रांति की थी जो बहुत तेज़ी से घटित हुई- क़रीब 300 साल चली. और अब उत्तर औद्योगिक वेव है- सूचना तकनीक की.

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टॉफ़लर ने 2016 में आख़िरी सांस ली. क्या वह इस दौर की रफ़्तार देखकर सांसत में रहा होगा? अभी तो समय बिल्कुल भाप की तरह उड़ता जा रहा है. बदलाव की रफ़्तार इतनी तेज़ है कि हमारी स्मृति में कुछ भी टिक नहीं रहा. तकनीक ने स्मृति पर हमारी निर्भरता भी घटा दी है. कुछ भी जानना हो, उसके लिए इंटरनेट और अब तो एआई- यानी कृत्रिम मेधा भी- मदद करने को तैयार है- यह अलग बात है कि वह प्रामाणिक जानकारी देगी या नहीं. लेकिन सच तो यह है कि तकनीक ही नहीं, हमारी स्मृति भी हमें धोखा देती है. हम भी बहुत सारी चीज़ें ग़लत याद रखते हैं. लेकिन यह याद रखने का नहीं, भूलने का दौर है.

मसलन हम भूल चुके हैं कि 2000 से पहले की दुनिया कैसी थी. भारत के संदर्भ में ही देखें तो इस दुनिया में मोबाइल तो आ चुका था, लेकिन वह गिने-चुने लोगों के हाथ में था. भारत में पहली बार मोबाइल सेवा 1995 में शुरू हुई थी- पहली बातचीत कोलकाता में बैठे पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री रहे ज्योति बसु और दिल्ली में बैठे तत्कालीन संचार मंत्री सुखराम के बीच हुई थी. 2002 के बाद ही मोबाइल सेवाएं सस्ती हुईं और अगले कुछ वर्षों में वे हर किसी की मुट्ठी में आ पाईं. लेकिन तब तक मोबाइल बस फोन करने और संदेश लेने-देने तक के काम आता था. स्मार्टफोन कुछ बरस बाद आया. इंटरनेट भी धीरे-धीरे ही आम हुआ. जो सोशल मीडिया आज हम सबके जीवन को संचालित कर रहा है, वह इन्हीं बरसों में पैदा हुआ है. फेसबुक 2004 में लांच हुआ, वाट्सऐप और ट्विटर 2009 में. आज ऐसा लगता है, जैसे ये सदियों से हमारे साथ हों.

इस बदलाव के पहलू और भी हैं. हमारा समाज बदल रहा है, हमारी प्राथमिकताएं बदल रही हैं. मध्यवर्ग की सांस्कृतिक उपस्थिति ख़त्म हो चुकी है और वह अब उपभोक्ता वर्ग में बदल गया है.

दरअसल इस मोड़ पर मशहूर चिंतक एरिक हॉब्सबॉम को याद करने की ज़रूरत महसूस हो रही है. उनका कहना था कि सदियों को सौ वर्षों में नहीं, प्रवृत्तियों में बांटा जाना चाहिए. उनके मुताबिक 19वीं सदी बहुत लंबी थी जो 1789 में फ्रांसिसी क्रांति से शुरू हुई थी और 1917 में हुई रूसी क्रांति तक चली. बीसवीं सदी 1991 तक चली और फिर इक्कीसवीं सदी शुरू हो गई.

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इस इक्कीसवीं सदी को प्रवृत्तियों के हिसाब से पहचानना बहुत मुश्किल नहीं है. इस दौर में औद्योगिक क्रांति को पीछे छोड़ सूचना क्रांति केंद्रीय भूमिका में आ चुकी है. साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद, राष्ट्रवाद अब बीते ज़माने की अवधारणाएं हैं और पिछड़े समाजों में बची हैं, इक्कीसवीं सदी भूमंडलीकरण की, अंतरराष्ट्रवाद की, क्षेत्रीय उभारों की है. इस दौर में मुख्यधारा के विमर्श को पलट कर अस्मितावादी आंदोलन तेज़ हो रहे हैं- कहीं अश्वेत आंदोलन, कहीं एलजीबीटी आंदोलन, भारत के संदर्भ में महिला, दलित और आदिवासी अस्मिताएं अपना हक़ मांग रही हैं. लोकतंत्र पर पूंजीवादी नवउदारवाद हावी है और वही नवउपनिवेशवाद का भी जनक है. साहित्य में उत्तर संरचनावाद का दौर है- यथार्थवादी शिल्प में तोड़फोड़ जारी है- नई विधाएं अपनी जगह बना रही हैं.

लेकिन परिवर्तन की इस रफ़्तार के बहुत सारे अदृश्य परिणाम हैं जो हम झेल तो रहे हैं लेकिन जिन्हें देख नहीं पा रहे. परिवार नाम की जो संस्था हमारे सबसे बड़े सामाजिक आधारों में रही, वह टूट रही है. संयुक्त परिवार तो बीती सदी में ही बीते दिनों की बात हो चुके थे, इस सदी में एकल परिवार भी टुकड़ा-टुकड़ा हैं, विवाह संस्था भी तनाव में है, लिव-इन का नया चलन युवाओं को लुभा रहा है. ये बदलाव सही हैं या ग़लत- यह अलग बात है लेकिन इन बदलावों की जो रफ़्तार है, वह समाज को संभलने का मौक़ा नहीं दे रही- उनके विकल्प तैयार करने का अवसर नहीं दे रही है. इसका नतीजा है कि अवसाद बढ़ा है, अकेलापन बढ़ा है, काम का तनाव बढ़ा है, टूटन बढ़ी है, आत्मसीमन बढ़ा है. यह सब निजी लगता है, लेकिन इसका एक सार्वजनिक करुण पक्ष है. यह अकेलापन सामाजिक होता गया है, लोग अब पहले से ज़्यादा असुरक्षित महसूस कर रहे हैं, इस वजह से सहज संबंधों पर नहीं, जातिगत और सांप्रदायिक पहचानों पर ज़ोर है. समाज में सार्वजनिक मुद्दों पर लड़ाई कमज़ोर पड़ी है, परस्पर अविश्वास बढ़ा है, एक-दूसरे की मदद करने की इच्छा, आदत और ज़रूरत भी घटी है.

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वैसे इन पच्चीस वर्षों में जितने त्वरित बदलाव दिख रहे हैं, उतने ही ज़िद्दी ठहराव भी नज़र आ रहे हैं. जिन बीमारियों को हम उन्नीसवीं सदी में ख़त्म मान ले रहे थे, वे इक्कीसवीं सदी में प्रगट हो रही हैं. जिन बहसों को बीती सदी में बीत जाना चाहिए था, वे नई धमक के साथ मौजूद हैं. भारत अपनी दो बुराइयों से अब तक जूझ रहा है और लगता है कि दोनों के सामने हार रहा है. या शायद दोनों बुराइयां जुड़वां हैं. जातिवाद की जकड़न भी बची हुई है और सांप्रदायिकता का राक्षस तो बिल्कुल अट्टहास कर रहा है. बताने की जरूरत नहीं कि दोनों को बनाए रखने या बढ़ावा देने वाली शक्तियां एक ही हैं. मैकाले से मुक्ति की बात भले हो रही हो, लेकिन मैकाले की छाया बड़ी होती जा रही है.

निश्चय ही इन पच्चीस वर्षों में भारत समृद्ध हुआ है. 40 करोड़ का एक ऐसा खाता-पीता उपभोक्तावादी वर्ग उभरा है जिसके दम पर हम अपनी जीडीपी वृद्धि दर पर गर्व कर पा रहे हैं और उम्मीद कर रहे हैं कि हम जल्द ही दुनिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएंगे. पहले जो देश साइकिलों पर चलता था, वह अब कारों पर चलने लगा है और बसों-ट्रेनों में धक्के खाने की जगह एक बड़ी आबादी इन दिनों हवाई अड्डों पर धक्के खा रही है और विमानों की इकोनॉमी क्लास की सीटें पहचानने लगी है. मगर इस समृद्धि के समानांतर असमानता भी बढ़ी है और जितनी बहुमंज़िला इमारतें खड़ी हो रही हैं, उतनी ही झुग्गी-झोपड़ियां बन रही हैं. बेदखली और विस्थापन इन पच्चीस सालों का सबसे बड़ा सच हैं. जैसे पूरा का पूरा देश अपनी जड़ों से उखड़ा हुआ है. पहले दिल्ली में जो बिहार-यूपी बसते थे, वे अब बेंगलुरु में नए ठिकाने तलाश रहे हैं. गाड़ियां इतनी ज़्यादा हैं कि सड़कों पर लोग कम दिखते हैं, कारें ज़्यादा नज़र आती हैं और उनका धुआं हमारी सांस से लेकर हमारे आकाश तक को दूषित कर रहा है. मौसम अब निश्चित हो गए हैं और देश आधे समय बाढ़ में डूबा रहता है और आधे समय सूखे में.

लेकिन इन सबके बावजूद ये पच्चीस साल खुद को नए सिरे से पहचानने के साल रहे हैं- अपनी शक्ति को भी और अपनी सीमाओं को भी. हमने तरक़्क़ी की है, मगर इस तरक़्क़ी को सभी नागरिकों तक समान रूप से पहुंचाने में नाकाम रहे हैं. विज्ञान और सूचना प्रौद्योगिकी में बहुत तेज़ी से आगे बढ़ने के बावजूद हमारे यहां अशिक्षित और बेईमान बाबाओं की संख्या भी बढ़ी है और उनका प्रभाव भी. दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने के बावजूद हमने बहुत सारे लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ खिलवाड़ किया है. बीते दिनों इस देश के बहुत सारे नागरिकों को साबित करना पड़ा कि वे यहां के नागरिक हैं.

अगले पच्चीस साल अपनी चुनौतियों को पहचानने और उनसे पार पाने के भी साल हैं. इन्हीं पच्चीस बरसों में हमारी आज़ादी भी सौ साल को छू लेगी और गांधी की शहादत भी- इस आज़ादी का मर्म समझने और उसे सबकी आज़ादी बनाने का गुरुत्तर दायित्व हमें इन्हीं वर्षों में पूरा करना है.

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