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भारत के छात्रों में बढ़ रही है आत्महत्या की प्रवृत्ति, क्या केवल 'लेबर फोर्स' तैयार कर रहे हैं स्कूल-कॉलेज

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  • Updated:
    अप्रैल 30, 2026 12:02 pm IST
    • Published On अप्रैल 30, 2026 12:02 pm IST
    • Last Updated On अप्रैल 30, 2026 12:02 pm IST
भारत के छात्रों में बढ़ रही है आत्महत्या की प्रवृत्ति, क्या केवल 'लेबर फोर्स' तैयार कर रहे हैं स्कूल-कॉलेज

भारत की अन्य अनगिनत संस्थाओं की ही तरह NIT कुरुक्षेत्र में भी छात्रों की आत्महत्याओं का सिलसिला जारी है. मीडिया का बड़ा हिस्सा इसे केवल एक खास संस्था की समस्या की तरह पेश कर रहा है. जबकि, इस समस्या की जड़ें गहरी और विस्तृत हैं. अगर फ्रेंच समाजशास्त्री इमाइल दरखाइम के नजरिए से देखें तो प्रत्येक आत्महत्या समाज द्वारा की गई एक हत्या है. और इसलिए कहा जा सकता है कि इस समस्या के कम से कम त्रिआयामी पक्ष हैं- समाज, सत्ता और पूंजी. तीनों ही इस समस्या के उत्पादन और प्रसार के लिए जिम्मेदार माने जा सकते हैं. इससे कमोबेश भारत की अधिकांश शिक्षण संस्थाएं जूझ रही हैं. यह न तो पहली घटना है और न आखिरी. मैंने कई संस्थाओं के साथ काम किया है और कइयों में मैंने देखा कि वहां का शैक्षणिक वातावरण छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य के प्रतिकूल रहा है. अनगिनत ऐसे छात्रों से हमने संवाद किया जो गंभीर मानसिक स्वास्थ्य से जूझ रहे थे. उनमें से जीवन का मोह गायब होता दिखा था. भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है, जहां छात्रों द्वारा सबसे अधिक आत्महत्याएं की जा रही हैं. समाज और सत्ता को डरना चाहिए जब छात्र अपने जीवन का मोह त्याग रहे हों. यह समाज और देश के पतन का प्रस्थान बिंदु है. 

शैक्षणिक संस्थानों का बदलता स्वरूप

हालिया दशकों में शैक्षणिक संस्थाओं ने जिस तरह से अपना चरित्र बदला है, उसने छात्रों के जीवन दर्शन में एक भयानक भाव पैदा किया है. ये भाव हैं- भय, असुरक्षा, अस्वीकृति और निराशा के. वर्तमान में अधिकतर संस्थाएं, विशेषकर निजी संस्थाएं पूंजी निर्माण से प्रेरित हैं न कि राष्ट्र या समाज निर्माण से. पैसा बनाना उनका एकमात्र और अंतिम लक्ष्य है. इसलिए शिक्षा एक मुक्तिदायी शक्ति न होकर एक अनैतिक और अमानवीय व्यापार में तब्दील कर दिया गया है. नव-उदार होती राजकीय नीतियां अनिवार्य रूप से देश के छात्रों के लिए अनुदार सिद्ध होती जा रही हैं. शिक्षा का मानवीय और जीवंत पक्ष गौण हो चुका है. पूंजी पक्ष केंद्रीय बन चुका है. परिणामस्वरूप, वर्तमान सभ्यता ने जिस तरह के सामाजिक-संसार को रचा है उसमें 'प्रतिस्पर्धा' और 'सफलता' दो ऐसे बड़े शब्द हैं, जिसे सबसे अधिक उत्सवी तरीके से समाज, सत्ता और पूंजी ने अपने लाभ के लिए प्रयोग किया है. हमें लगता है ये दोनों शब्द ही समस्या के मूल में हैं. दुनिया के इतिहास में अगर आप झांके तो हमें इन दोनों शब्दों का कोई अहम् अस्तित्व नहीं दिखाई देता. ये दोनों शब्द खेल या युद्ध को छोड़कर शायद ही इस स्तर पर प्रयोग में लाए जाते थे. लेकिन आज हमारी संपूर्ण सामाजिक और आर्थिक संरचना इन्हीं दोनों शब्दों के इर्द-गिर्द घूम रही है. ऐसा पहली बार केवल घनघोर पूंजी-केंद्रित दुनिया में प्रारंभ हुआ कि जब रात का खाना खाने के लिए, कपड़े पहनने के लिए, बीमार होने पर इलाज कराने के सामर्थ्य के लिए लोगों को प्रतिस्पर्धा में लगा दिया गया. अस्तित्व बचाए रखने के लिए इन बुनियादी सुविधाओं की प्राप्ति को सफलता से संबोधित किया गया. 

आप देखिए हमारे आसपास जो सफल लोग हैं वे कौन से लोग हैं, उनकी उपलब्धि क्या है? वे वैसे लोग हैं जिन्होंने आजीविका के लिए महज एक नौकरी पा लिया, वे लोग हैं जो बीमारी की स्थिति में अस्पताल में इलाज कराने में सक्षम भर हुए हैं, वे वैसे लोग हैं जो दोनों समय भोजन कर सकते हैं. सफलता और असफलता में अंतर बस इतने भर का ही है कि एक तरफ अस्तित्व बचाए रखने का सामर्थ्य है और दूसरी तरफ रोटी कपड़ा और मकान भी एक सपना. यह अनिवार्य रूप से विशिष्ट और ऐतिहासिक प्रघटना है कि आदमी बुनियादी चीजों के लिए जूझ रहा है और इन्हें अर्जित कर लेना ही मनुष्यता का अंतिम और एकमात्र लक्ष्य घोषित कर दिया गया है. छात्रों द्वारा जीवन से मोहभंग के भाव ऐसी ही सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि में तैयार हो रहें हैं.

क्या केवल आज्ञाकारी लेबर फोर्स तैयार कर रहे हैं स्कूल कॉलेज 

अधिकतर शिक्षण संस्थाएं चूंकि पूंजी उत्पादन के केंद्र के रूप में काम कर रही हैं, उनका शायद ही कोई सामाजिक सरोकार प्रतीत होता है, इसलिए उनके लिए जरूरी है कि वे छात्र जीवन की रचनात्मक और जीवंत शक्तियों का अंत कर उन्हें वैश्विक पूंजी में एक आज्ञाकारी 'लेबर-फ़ोर्स' के रूप में तैयार करें और उसे ही अपनी उपलब्धि बताएं. वैश्विक पूंजी की मांगें स्पष्ट है उन्हें मात्र 'मजदूर' चाहिए- 'कम्पूटर में प्रशिक्षित', 'चिकित्सा में प्रशिक्षित', 'प्रबंधन में प्रशिक्षित' और अन्य विषयों में प्रशिक्षित. इसके लिए जरूरी है कि उनकी चेतना से उनके अस्तित्व-बोध को मिटाया जाए. वे अपने इन हितों को पूरा करने के लिए शिक्षण प्रणाली को लगातार दमनकारी बनाते जा रहें हैं. 

पूंजी का एक सनातन स्वभाव है. यह अथाह अन्याय से ही एकत्र किया जा सकता है. न्यायपूर्ण तरीके से केवल जीवन यापन किया जा सकता है और जिसे शिक्षण संस्थाओं को चलाने वाले सेठों की लगातार बढती संपत्ति से समझा जा सकता है. पॉल फ्रेरों की 1968 में आई एक ख्यातिप्राप्त पुस्तक है'पेडागगी ऑफ़ द ओप्प्रेस्सेड'. इसमें वे जिस विचारपरक और आलोचनात्मक शिक्षण तंत्र की बात करते हैं, उसे आज की शिक्षण व्यवस्था से व्यवहार में गायब कर दिया गया है. फ्रेरों का 'बैंकिंग मॉडल' आज के शिक्षण तंत्र की खतरनाक सच्चाई है, जिसमें 'निष्क्रिय' छात्रों में महज जरूरी बाजारू सूचना भरी जा रही है. उनके जीवन के अन्य चिन्तनशील और सृजनात्मक पक्षों की लगातार संस्थागत हत्या की जा रही है. बाजार द्वारा रचित 'सफलता' के लिए जिस आत्मघाती 'प्रतिस्पर्धा' में उन्हें झोंक दिया गया है, उसका कोई अंत नहीं है. मनुष्य प्राकृतिक रूप से आलोचनात्मक और चिंतनशील जीव है. उसके भीतर अनगिनत संभावनाएं और संवेदनाएं हैं. उसकी इसी प्रवृत्ति ने उसे पाषाण काल से निकालकर आज यहां ला खड़ा किया है. 

दुर्भाग्य से 'सभ्यता' के शीर्ष पर आकर ऐसा लगता है जैसे मानव ने चिंतन और सृजन को निषेधित करने का अबतक का सबसे बड़ा संस्थागत हमला किया है. शिक्षण संस्थाओं में छात्रों की आत्महत्याएं समाज, सत्ता और पूंजी के इसी घातक प्रहार का परिणाम है. हम बस रेचल कार्सन की एक पंक्ति गुनगुना सकते हैं, ''Those who contemplate the beauty of the earth find reserves of strength that will endure as long as life lasts.'' 

(डिस्क्लेमर: केयूर पाठक इलाहाबाद विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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