IAS Divya Mittal on Education Sytem : आईएएस दिव्या मित्तल ने हाल ही में अपने एक्स एकाउंट पर एक ऐसी पोस्ट साझा की है, जिसके बाद से भारत के एजुकेशन सिस्टम पर बहस छिड़ गई है. उन्होंने अपने पोस्ट के जरिए कहा है कि मैंने देश की प्रतिष्ठित संस्थानों में पढ़ाई की. इस दौरान मुझे महसूस हुआ कि स्कूल आपको अचीवमेंट के बारे में सिखाते हैं, खुश कैसे रहना है ये नहीं बतलाते हैं. उन्होंने अपने पोस्ट में स्कूल सिस्टम से जुड़ी 9 खामियों को भी गिनाया है, जिसके बारे में आगे आर्टिकल में विस्तार से बता रहे हैं.
दिव्या अपने पोस्ट में लिखती हैं, ''IIT दिल्ली से IIM बैंगलोर और फिर IAS तक. मैंने देश की सबसे प्रतिष्ठित संस्थानों में पढ़ाई की. जिसने मुझे सिखाया कि मुश्किल इम्तिहान कैसे पास करने हैं और बड़ी जिम्मेदारियां कैसे निभानी हैं. लेकिन इसने मुझे यह कभी नहीं सिखाया कि अपने मन को शांत कैसे रखना है या अकेलेपन का सामना कैसे करना है. हम हासिल करना सीखने में कई साल बिता देते हैं, लेकिन खुश रहना सीखने में एक भी दिन नहीं लगाते. स्कूल की शिक्षा में क्या कमी है, इस पर मेरे विचार इस तरह हैं-
भावनात्मक नियंत्रण (Emotional Regulation)IIT Delhi to IIM Bangalore to IAS. I got the best education my country had to offer. It taught me how to crack tough exams and manage big responsibilities. But it never taught me how to quiet my own mind or handle loneliness. We spend many years learning how to achieve, but not a…
— Divya Mittal (@divyamittal_IAS) May 17, 2026
हमने पीरियोडिक टेबल रट ली, लेकिन किसी ने हमें टूटे दिल की केमिस्ट्री नहीं समझाई. स्कूल में हमसे चुप रहने की उम्मीद की जाती थी, जहां चुप्पी को ही शांति मान लिया जाता था. अब हमें यह नहीं पता कि अपने अंदर उठने वाले तूफानों का सामना कैसे करें, बिना उनमें डूबे हुए. हम खुद को खोया हुआ महसूस करते हैं, क्योंकि हमें भावनाओं को दबाना सिखाया गया, उन्हें समझना या उनसे निपटना नहीं.
गहरी बातचीत (Deep Communication)हमें बेहतरीन निबंध लिखना सिखाया गया, लेकिन यह नहीं सिखाया गया कि "मुझे तकलीफ हो रही है" या "नहीं" कैसे कहना है. हालांकि बातचीत पर बहुत जोर दिया जाता है, लेकिन हमें बड़ों की दुनिया में काम आने वाली भाषा नहीं सिखाई जाती. ऐसा कोई कोर्स नहीं है जो सिखाए कि बॉस के सामने अपनी बात पर कैसे अड़े रहें, या 'नहीं' कहकर अपनी काम की सीमाओं की सुरक्षा कैसे करें.
आलोचनात्मक सोच (Critical Thinking)स्कूल में, जिसके पास सबसे ज़्यादा जवाब होते थे, वही जीतता था. ज़िंदगी में, जिसके पास सबसे ज़्यादा सवाल होते हैं, वही टिक पाता है. यही वजह है कि बहुत से बड़े लोग पूरे आत्मविश्वास के साथ दूसरों की राय दोहरा देते हैं, बिना यह सोचे कि वह राय आई कहां से है. हमें हर बात को एकदम सच मान लेने को कहा जाता है. इसलिए हम आंख मूंदकर बस दूसरों की नकल करते रहते हैं.
आर्थिक साक्षरता (Financial Literacy)हमने गणित सीखने और 'x' का मान निकालने में कई साल बिता दिए, लेकिन यह कभी नहीं सीखा कि खुद को कर्ज के जाल में फंसने से कैसे बचाएं. पैसा सिर्फ गणित का खेल नहीं है, यह अपनी पसंद की गरिमा से जुड़ा है. हम यह नहीं सीखते कि कर्ज का सही इस्तेमाल कैसे करें, ताकि वह हमारी आजादी पर हावी न हो जाए. हम यह नहीं सीखते कि बिना सोचे-समझे खर्च करने की आदत समय के साथ कैसे बड़ी समस्या बन जाती है, या पैसा हमारे तनाव, रिश्तों और मानसिक शांति पर कैसा असर डालता है.
आर्थिक साक्षरता की कमी इसलिए है, क्योंकि शिक्षा का जोर अक्सर भविष्य में पैसा कमाने पर होता है, न कि पैसा आने के बाद उसे समझदारी से संभालने पर.
आत्म-अनुशासन (Self-Discipline)स्कूल की दुनिया घंटी और टाइम-टेबल से चलती है. कोई और ही आपको बताता है कि क्या करना है और कब करना है. लेकिन बड़ों की दुनिया में पूरी तरह सन्नाटा होता है. हम खुद को फंसा हुआ महसूस करते हैं, क्योंकि हमें कभी यह नहीं सिखाया गया कि जब कोई टीचर हम पर नजर न रख रहा हो, तब भी खुद को आगे बढ़ने के लिए कैसे प्रेरित करें. अनुशासन का सीधा सा मतलब है खुद से किए गए वादों को निभाने की आदत. यह एक ऐसी आदत है जिसकी हममें से कई लोगों में कमी है.
अकेलेपन का सामना करनास्कूल में, आप हमेशा लोगों से घिरे रहते हैं. आपको कभी एहसास नहीं होता कि बड़े होने पर खामोशी कितनी जोरदार हो सकती है, जब तक आप खुद उस दौर से नहीं गुजरते. हम अकेला महसूस करते हैं क्योंकि हमें यह नहीं सिखाया गया कि हम खुद के सबसे अच्छे दोस्त कैसे बनें. शांति का मतलब यह सीखना है कि अकेले होने का मतलब अकेलापन नहीं होता. यह एक पवित्र जगह है, न कि यह संकेत कि आपको कोई नहीं चाहता.
लोगों को समझनास्कूल का समय मासूमियत भरा होता है, जहां अक्सर दोस्तियां अपने-आप बन जाती हैं. लेकिन जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते हैं, हर कोई उस मासूमियत को बनाए नहीं रख पाता. हम ठगा हुआ महसूस करते हैं क्योंकि हमें लोगों के छिपे हुए इरादों या उनके चेहरों पर लगे नकाबों को पहचानना नहीं सिखाया गया. लोगों को समझना एक ऐसी खामोश समझदारी है, जिससे हम शब्दों के पीछे छिपी सच्चाई को देख पाते हैं.
मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखनाहमारे शरीर के लिए तो जिम क्लास होती है, लेकिन हमारी आत्मा के लिए कुछ भी नहीं. हमें सिखाया जाता है कि किसी प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए थकान के बावजूद काम करते रहो, और ठीक इसी वजह से हम 'बर्नआउट' (पूरी तरह से थककर टूट जाना) का शिकार हो जाते हैं. अपने नर्वस सिस्टम (तंत्रिका तंत्र) का सम्मान करना ही एकमात्र तरीका है जिससे आप यह पक्का कर सकें कि आपके अंदर की रोशनी कभी न बुझे.
हमें पता होना चाहिए कि हम कब किसी तनावपूर्ण स्थिति का सामना कर रहे हैं और अब उसे और ज्यादा संभाल नहीं पा रहे हैं. हमें यह भी पता होना चाहिए कि अगर हम किसी परेशानी के भंवर में डूबता हुआ महसूस कर रहे हैं, तो हमें मदद के लिए कब आगे आना चाहिए.
खुद को जाननाहम सालों तक "सबसे अच्छा" स्टूडेंट बनने की कोशिश में बिता देते हैं, और आखिर में हमें एहसास होता है कि बिना किसी गोल्ड मेडल के हम कौन हैं, यह तो हमें पता ही नहीं. हम खुद को अधूरा महसूस करते हैं क्योंकि हमने अपनी आत्मा को छोड़कर बाकी हर विषय की पढ़ाई की होती है. सबसे बेहतरीन शिक्षा तो वह है, जिसमें आप दुनिया के यह बताने से पहले ही खुद यह जान लेते हैं कि आपके लिए असल में सबसे ज्यादा मायने क्या रखता है.
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