मध्य भारत के जंगलों में पिछले 45 साल का माओवादी आंदोलन मूलतः जंगल विभाग की जमींदारी के खिलाफ रहा है. बंगाल, बिहार और आंध्र के समतल इलाकों में यह भूमि सुधार कानून के लागू ना होने के खिलाफ रहा है. दरअसल कांग्रेस समर्थक जमींदारों ने प्रशासन के साथ मिलकर उस कानून को बिल्कुल निकम्मा बना दिया था.
गृह मंत्री अमित शाह ने कहा है कि सरकार अब इन इलाकों का सहकारिता की मदद से विकास करेगी. माओवाद की समाप्ति के बाद अपने पहले छत्तीसगढ़ दौरे पर अमित शाह ने कहा था कि सरकार गुजरात के अमूल जैसे मॉडल का उपयोग करना चाहेगी. लेकिन ऐसा लगता है राज्य का वन विभाग अब भी अपने पुराने ही ढर्रे पर ही है.
महुआ और आदिवासी
महुआ मध्य भारत के वनों का एक प्रमुख उत्पाद है. माइनिंग के अलावा इन राज्यों को आबकारी से सबसे अधिक आमदनी होती है. उस आमदनी का हिस्सा स्थानीय लोगों तक भी वापस जाए इसलिए माओवादियों के खात्मे के बाद सहकारिता मॉडल पर महुए की शराब बेचने पर छत्तीसगढ़ में भी कुछ काम शुरू हुआ है.
छत्तीसगढ़ की पिछली कांग्रेस सरकार ने व्यापारियों को महुए की शराब बनाकर बेचने के लिए उनसे एमओयू करने का काम शुरू किया था.नई सरकार में भी वन विभाग के अधिकारी अभी भी नए लोक हितकारी मॉडल की बजाय पुराने मॉडल को ही आगे बढ़ा रहे हैं.
महुआ शराब के जानकार यह कहते हैं कि रूस के वोदका, ब्रिटेन के स्कॉच व्हिस्की और मेक्सिको के टेकीला की तरह महुआ में भारत के राष्ट्रीय पेय बनने की योग्यता है.
अंग्रेजों ने क्यों लगाया था महुआ की शराब बनाने पर प्रतिबंध
अंग्रेजों को महुआ के बारे में भारत आने के कुछ साल बाद ही समझ आ गई थी. उनको यह पता चल गया था कि अगर महुए की शराब भारत के शहरों में और विदेशों में लोकप्रिय हो गई तो उनके स्कॉच के व्यापार पर असर पड़ेगा.इसलिए उन्होंने महुआ से स्थानीय लोगों द्वारा शराब बनाने पर प्रतिबंध लगा दिया था.
राहुल श्रीवास्तव भारत के कानूनों से हारकर पेरिस चले गए हैं और कहते हैं आप विश्वास करें या नहीं पर पेरिस में महुए की शराब बनाना भारत से सस्ता पड़ता है. हाल में राहुल ने यह बातें वन विभाग के अधिकारियों को भी बताई कि अगर साथ में अगर इस व्यापार को सहकारिता मॉडल पर करें तो स्थानीय लोगों को भी फायदा होगा.
इससे पहले मध्य प्रदेश सरकार ने महुआ शराब बनाने की अनुमति केवल आदिवासी स्वयं सहायता समूहों को दी है. लेकिन इसे बेचने के लिए जरूरी मार्केटिंग और प्रोमोशन का काम नहीं किया. छत्तीसगढ़ के अधिकारियों ने मध्य प्रदेश की असफलता से सीखने की बजाय उसका कारण बनाकर पुराने ढर्रे पर ही काम शुरू कर दिया है.
भारत के किन राज्यों में होता है महुआ
महुआ शराब के प्रयोग को सफल बनाने के लिए केंद्रीय स्तर पर भी कानूनों में बदलाव करना पड़ेगा, जिससे विदेशों के साथ पूरे देश में इसके लिए रुचि और बाजार तैयार हो सके. महुआ मध्य भारत के 13 प्रदेशों में होता है. सहकारिता मॉडल में महुआ शराब का सफल प्रयोग यहां की स्थानीय लोगों की इकोनॉमी बदल सकती है.
अमित शाह ने अपने भाषण में अमूल के दूध के प्रयोग की बात की थी. लेकिन बस्तर के आदिवासी मानते हैं कि गाय का दूध उसके बछड़े के लिए होता है. इसलिए वह दूध नहीं दुहता. अगर बदलें तो भी इस सोच को बदलने में समय लगेगा पर महुआ की शराब बनाने का सहकारिता का प्रयोग यहां सफल होना चाहिए.
छत्तीसगढ़ के आदिवासी नेता अरविंद नेताम इंदिरा गांधी की सरकार में मंत्री थे. उन्होंने प्रधानमंत्री से कहकर कानून में यह सुधार करवाया था कि आदिवासी अपने व्यक्तिगत उपयोग के लिए महुए की शराब बना सकता है. उस कानून में बदलाव को अब आगे ले जाकर आदिवासी सहकारी समितियों को मदद करने की जरूरत है.
अमूल की सफलता के लिए किसने की थी मदद
गुजरात के अमूल के प्रयोग के लिए सभी वर्गीज कुरियन की चर्चा करते हैं. लेकिन कम लोगों को पता है कि कुरियन के पीछे त्रिभुवनदास पटेल थे, जिन्होंने उस प्रयोग के लिए वल्लभ भाई पटेल और मोरारजी देसाई जैसे नेताओं की मदद इस प्रयोग के लिए जुटाई थी, जिसके बगैर इसकी सफलता संभव नहीं होती .
बस्तर के अमूल के प्रयोग (अबूझमाड महुआ यूनियन लिमिटेड) को भी आधुनिक वर्गीज़ कुरियन जैसे मैनेजर और उनके जैसे तकनीकी, मार्केटिंग और एडवर्टाइजिंग आदि के लोगों की जरूरत होगी पर मॉडल की मुख्य बात यह होनी होगी कि लाभ का हिस्सा उनके महुआ संग्राहक मालिकों को वापस जाए.
सबसे चर्चित माओवादी माडवी हिडमा ने मुझसे एक बार कहा था, ''कम्यूनिज़्म, माओवाद, लाल किले में लाल झण्डा ये सब हम आदिवासी नहीं समझते हम सिर्फ अपने जंगल के लिए लड़ रहे हैं.'' सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि जंगल के लोक हितकारी प्रयोग एक बार फिर वन विभाग के अधिकारियों के हत्थे न चढ़ जाए.
जब नक्सलवादी आए थे तो सबसे पहला हमला उन्होंने वन विभाग के अधिकारियों पर किया था. इसके बाद वन विभाग के अधिकारी जंगल छोड़कर भाग गए थे. आज वे कह रहे हैं ये सब सहकारिता का झमेला कौन करेगा, व्यापारियों को बुलाओ और मुक्ति पाओ. अब व्यापारी सारा लाभ लेकर चला जाएगा ये हमारी दिक्कत नहीं है!
लोग यह भी कहते हैं कि अमूल एकमात्र सफल प्रयोग है. इसके बाद कोई दूसरा अमूल नहीं हुआ. बस्तर जैसी जगहों में वनोपज को लेकर कई प्रयोग हुए हैं, पर कोई सफल नहीं हुआ.ये बातें सही हैं. नक्सल समस्या के समापन के भी कई असफल प्रयोग हुए हैं. लेकिन मन लगाकर काम किया जाए तो कठिन प्रयोग भी सफल होते हैं.कवि दुष्यंत के कहा था, ''कैसे आकाश में सूराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो.''
(डिस्क्लेमर: लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. वो लोकतांत्रिक मीडिया के प्रयोग सीजीनेट स्वर और छत्तीसगढ़ में नई शांति प्रक्रिया से जुड़े हुए हैं. इस लेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)