विज्ञापन
This Article is From Jun 26, 2016

ब्रेक्ज़िट के बाद 'लीव' के लिए संपादक के नाम रवीश कुमार का पत्र

Ravish Kumar
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    जून 26, 2016 14:34 pm IST
    • Published On जून 26, 2016 11:00 am IST
    • Last Updated On जून 26, 2016 14:34 pm IST
मित्रवर संपादक,

मुझे तीन महीने का अवकाश चाहिए। मैं 'लीव' शब्द का इस्तमाल नहीं कर रहा हूं वरना आप समझने लगेंगे कि मैं फोबिया और झूठे प्रचारों के बहकावे में आ गया हूं। जबसे ब्रिटेन में 'लीव' जीता है तब से 'रीमेन' वाले लोग 'लीव' वालों को भला बुरा कह रहे हैं। 'लीव' समर्थकों को कमअक्ल और बदअक्ल समझा जा रहा है। इसलिए मैंने अवकाश शब्द का प्रयोग किया है। ब्रिटेन ने यूरोपियन यूनियन से अलग होने का जो फैसला लिया है उसे ब्रेक्ज़िट कहा जा रहा है।

मैं क्यों तीन महीने का अवकाश चाहता हूं? मैं कई दिनों से दुनिया को समझने का प्रयास कर रहा था कि पुराने मॉडल का हवाई जहाज़ लेकर नेता यहां वहां उड़ रहे हैं, कुछ हो नहीं रहा। उल्टा कई तरह के आर्थिक और कूटनीतिक क्लब बन गए हैं। अब ठेके लेने की होड़ में देश भी इस तरह से शामिल होने लगे हैं कि मुझे आशंका है कि वे मुल्क के नाम में कंस्ट्रक्शन लिमिटेड न जोड़ लें। ज़्यादा नहीं बस इतना समझ आया है कि 2008 से इन नेताओं ने कितने तेल फूंक दिये, इसके चक्कर में टीवी के ज़रिये ख़ुद महान और विश्व नायक बन गए लेकिन आर्थिक हालात में सुधार नहीं हुआ। इसमें कमाल यह है कि कोई इस आर्थिक व्यवस्था पर सवालिया निशान नहीं लगाना चाहता। कोई नहीं बता रहा है कि आठ साल के प्रयास के बाद अर्थव्यवस्था के बाग़ों में बहार क्यों नहीं आई। बचपन में मैं जब कमज़ोर विद्यार्थी था तो बैग में सारी किताबें लेकर चलता था। मेरे पड़ोसी अंकल ने कहा कि कमज़ोर विद्यार्थी का बस्ता हमेशा भारी रहता है। वही हाल इन नेताओं का है।

ख़ैर इस पत्र का मक़सद अवकाश मांगना है। अर्थव्यवस्था पर लेक्चर देकर नोबल पुरस्कार प्राप्त करना नहीं है। मेरठ, मुज़फ़्फ़रनगर, सोनीपत घूमते घूमते बीस साल गुज़र गए तो हिन्दी के इस पत्रकार को ग्लोबल नागरिक होने की इच्छा जागृत हुई है। मैं अपने भीतर संचित उत्तर भारत के तमाम अनुभवों से आज़ाद होना चाहता हूं। कब तक हर चुनाव में एक ही बात जानूंगा और बताऊंगा। लगा कि नए नए विषयों और भूगोल की तरफ कदम बढ़ा कर देखें कि क्या वहां दुनिया कुछ अलग है। मुझे नई जानकारियां रोमांचित भी कर रही थीं। सब कुछ ठीक ठाक ही चल रहा था कि ब्रेक्ज़िट हो गया।

जिस तरह से भारतीय मीडिया का गुरुत्वाकर्षण बल दिल्ली में होता है उसी तरह से ब्रिट मीडिया का लंदन में होता है। भारत से किसी ने वहां जाकर ब्रिटेन के बदलते समाज को समझने का प्रयास नहीं किया। ब्रिटेन वालों ने भी यही किया, लोगों से बात करने के बजाए सर्वे सर्वे खेलने लगे। वहां के फटीचर मीडिया का जो हाल है वही यहां के मीडिया का है। भारत में सारे लोग इंडिपेंटेंड, गार्डियन, डेली मेल, टेलिग्राफ, न्यू यार्कर, आई टीवी, बीबीसी, सीएनएन के ज़रिये ब्रिटेन को दो दिन में समझ गए हैं और भारत के अखबारों में लेख लिखने लगे हैं। दो दिन से कोई भारतीय अखबार ही नहीं पढ़ रहा है !

जबकि ब्रेक्ज़िट होने से पहले किसी को पता नहीं था कि क्या होने वाला है। हो गया तो यहां वहां का मीडिया होने वालों के समर्थकों को ही गरिया रहा है। मीडिया किसके हित में नागरिकों के विरोध में खड़ा हो रहा है। बोलता क्यों नहीं कि चवालीस लाख रुपये का क़र्ज़ा लेकर कोई ग्रेजुएट बनेगा तो बाकी कई लोग ऐसे भी होंगे जो ग्रेजुएट नहीं बनेंगे। जब ग़रीबों को ऑक्सफोर्ड नहीं मिला तो वे क्यों कैंब्रीज की तरह बात करेंगे। बताओ न भाई कि वहां कम पढ़े लिखे लोग क्यों हैं। कल अगर मोदी फ़ेल हो जाएं तो इसमें मतदाता की क्या ग़लती है। उसका फ़ैसला कैसे ग़लत है। उसी तरह से ब्रिक्जिट को वोट करने वाले ग़रीब और कम पढ़े लिखे मतदाता कैसे दोषी है। लंदन का मीडिया कह रहा है कि लोग बहकावे में आ गए। अरे तो आप लोग क्या कर रहे थे? क्या आप राजनीतिक कॉरपोरेट और मीडिया के इस खेल के खिलाफ लिख रहे थे जिसके खिलाफ वहां के लोग होते जा रहे थे। मीडिया का भी चरित्र कार्टेल क्लब की तरह होता जा रहा है।

दुनिया भर में जिस तरह से लिखने वाले सक्रिय हो गए हैं उसी तरह से सोशल मीडिया पर शेयर करने वाले सक्रिय हो गए हैं। कभी कोई गार्डियन का लेख ठेल दे रहा है तो कभी वॉक्स डॉट कॉम और मीडियम का। हम लोग वहां की मीडिया पर अपने यहां की मीडिया जितना ही भरोसा करते हैं। माडिया आंखें बंद कर लिखता है और हम लोग आंखें बंद कर पढ़ लेते हैं। बताइये सर वहां के मीडिया को पता ही नहीं चला कि 'लीव' जीतने वाला है। वो 'रीमेन' की उम्मीदें परोस रहा था। हम उस मीडिया के विश्लेषण को पढ़े जा रहे हैं। पढ़े जा रहे हैं फिर यहां के अखबारों में लिखे जा रहे हैं।

अब सब पढ़कर लिखने लगे हैं कि मैं जिस ब्रिटेन में जागा हूं, वो वह ब्रिटेन नहीं जिसे मैं जानता था। जानने वालों ने समझा था कि नया जानने की ज़रूरत नहीं है। जिन दलों के बीच वे शटल कॉर्क बने हुए हैं उनकी करतूतों पर सवाल लगभग बंद हो गए हैं। राजनीतिक दल 'कार्टेल' का कॉकटेल पी रहे हैं। किसी को देखना चाहिए कि दुनिया भर में पंद्रह साल से अधिक उम्र के दलों की समाप्ति का समय आ गया है। इनमें कुछ बचा नहीं है। नया नेता और मज़बूत नेता के टटपुंजिया तर्क बेकार साबित हो रहे हैं। जानकार कुलीनों की निष्ठा लोगों के प्रति कम इन दलों के प्रति ज़्यादा हो गई है। वहां के लोगों को कुतर्की और अंध राष्ट्रवादी बताने की जगह अमीर और ग़रीब कहा जाना चाहिए।

कॉरपोरेट का विस्तार ग़लत नहीं है लेकिन जनता को बाज़ारवाद का पहाड़ा रटाकर इन्हें सब्सिडी देना कैसे ठीक है। भारत में लाखों करोड़ो का क़र्ज़ा कॉरपोरेट ने पचा लिया किसी को ग़ुस्सा तक नहीं आया। इसके बाद भी नेता लोग महान बने हुए हैं। ट्वीटरविहीन भारतीय किसान आत्महत्या कर रहा है और सरकारी स्कूलों में स्थायी शिक्षक तक नहीं हैं। इसके बिना भी जीडीपी तरक़्क़ी कर रही है। चाटुकारिता चरम पर हैं।

तो आप बताइये कि जो इस सिस्टम से बाहर है वो क्या करें। उसे सिस्टम ने क्या दिया कि खाने की मेज़ पर कांटा छुरी से ब्रेड और आम कतरे। क्या लंदन और भारत के जानकार इन लोगों की पीड़ा जानते हैं जो कपार धुन रहे हैं कि यह वो लंदन नहीं जिसे मैं जानता था। सोशल मीडिया का बोगस राष्ट्रवाद किसी मुल्क का आइना नहीं होता। एक्सपर्ट नहीं जानते होंगे उस लंदन को लेकिन लंदन का ग़रीब मज़दूर उनको जान गया होगा। बिना पेंशन और सस्ते अस्पताल के एक्सपर्ट जी सकते हैं, आम लोग कैसे जी लेंगे। भारत में सांसद विधायक, प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री तक को पेंशन है लेकिन कर्मचारी को नहीं। जिस दिन लोग समझेंगे उस दिन वे क्या करेंगे। एक्सपर्ट बता दें कि उन्हें क्या करना चाहिए।

इसलिए लंदन वाले जानकार सदमे में हैं। उन्हीं के जैसे भाई बंधु भारत में सदमे में हैं। जैसे किसी के नईहर में चोरी हो गई हो। अरे भाई टीवी और अखबार के ज़रिये जब देश को जानेंगे तो इतना ही जानेंगे जो आप जानते रहे हैं। वहां के सोशल मीडिया में भी वही सब झलका जो मीडिया में छलका था। सब सर्कस के मौत के कुएं में बाइक गोगियां रहे थे। एक ही बात को कोई सर्वे में कह रहा था तो कोई डिबेट में ।

यहां तक तो ठीक है। अब ब्रिक्जिट हो गया है तो इस पर हज़ारों की संख्या में विश्लेषण छप रहे हैं। इतने एंगल से लेख छपे हैं कि मैं पढ़ते पढ़ते परेशान हूं। घटना से बड़ी घटना इस पर छपे लेखों के भंडार हैं। लोगों को ही गरियाने का इतना बड़ा प्रोजेक्ट मैंने कभी नहीं सुना इसलिए मैं सारे लेख पढ़ना चाहता हूं। इसके लिए मुझे तीन महीने का वक्त चाहिए। भाई लोगों ने इतना लिख दिया है कि छठ पूजा तक को टाइम लग ही जाएगा। पर मैं तीन महीने में ब्रेक्ज़िट का डोज़ पूरा कर लूंगा। इसलिए आप मेरे 'लीव एप्लिकेशन' पर विचार करें और अवकाश प्रदान करें।

आपका 'रीमेन'
रवीश कुमार

NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं

फॉलो करे:
ब्रेक्ज़िट, रवीश कुमार, लीव ईयू कैंपेन, रिमेन, यूरोपियन यूनियन, ईयू, Brexit, Ravish Kumar, Leave Camp, Remain Camp, European Union, Eu