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राष्ट्रपति भवन में किस राष्ट्रपति ने शुरू की थी रक्षाबंधन मनाने की परंपरा, कौन लोग बांधते हैं राखी

विवेक शुक्ला
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    अगस्त 28, 2026 06:32 am IST
    • Published On अगस्त 27, 2026 18:18 pm IST
    • Last Updated On अगस्त 28, 2026 06:32 am IST
राष्ट्रपति भवन में किस राष्ट्रपति ने शुरू की थी रक्षाबंधन मनाने की परंपरा, कौन लोग बांधते हैं राखी

रक्षाबंधन केवल भाई-बहन के रिश्ते का त्योहार नहीं है. यह स्नेह, सुरक्षा और पारस्परिक सम्मान का वह पवित्र सूत्र है जो परिवार की चारदीवारी से निकलकर पूरे समाज तक फैल जाता है. भारत के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के आवास पर जब यह पर्व मनाया जाता है तो उसका अर्थ और भी गहरा हो जाता है. राष्ट्रपति भवन में रक्षाबंधन की परंपरा स्वतंत्र भारत की शुरुआत से ही जुड़ी हुई है. यह परंपरा सादगी, समावेश और परिवार जैसे गर्म माहौल की कहानी कहती है.

राजेंद्र प्रसाद को कौन बांधता था राखी

भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ.राजेंद्र प्रसाद ने ही इस सिलसिले की नींव रखी थी. उनके कार्यकाल में यह उत्सव औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि सहज पारिवारिक समारोह के रूप में शुरू हुआ. डॉ. राजेंद्र प्रसाद 1950 से 1962 तक राष्ट्रपति रहे. उस समय राष्ट्रपति भवन के मुलाजिमों की बेटियां उन्हें राखी बांधती थीं. बदले में वे सबको छोटे-छोटे उपहार देते थे. राखी बंधवाने के बाद राजेंद्र बाबू अक्सर अपने काम में लौट जाते थे, पर उनकी पत्नी राजवंशी देवी प्रसाद बेटियों और उनके अभिभावकों के साथ देर तक बातें करती रहती थीं. राष्ट्रपति भवन में उन्हें सब मां जी कहते थे. उनकी सरलता और ममता ने पूरे परिसर को परिवार जैसा बना दिया था. पुराने कर्मचारियों की यादों में यह बात आज भी जीवित है कि राजेंद्र बाबू के परिवार की बेटियां कनॉट प्लेस के पास राजा बाजार स्थित रघुमल कन्या विद्यालय में पढ़ती थीं. रक्षाबंधन पर उनकी कई सहेलियां भी राष्ट्रपति भवन आती थीं और राष्ट्रपति जी को राखी बांधती थीं. आयोजन बहुत सादा होता था. गोल मार्केट या बंगाली मार्केट की पारंपरिक मिठाइयां बांटी जाती थीं. कोई दिखावा नहीं था, केवल स्नेह था.

राष्ट्रपति भवन परिसर में मंदिर और मस्जिद का निर्माण भी उन्हीं की पहल पर हुआ था. परिसर से सटे चर्च और गुरुद्वारा पहले से मौजूद थे, इसलिए उनकी अलग से जरूरत महसूस नहीं की गई. राजेंद्र बाबू और राजवंशी देवी दिवाली, ईद, क्रिसमस, गुरु नानक जयंती जैसे त्योहार पूरे परिसर के सैकड़ों कर्मचारियों के साथ मनाते थे. अगर व्यस्तता के कारण राजेंद्र बाबू कार्यक्रम में थोड़ी देर रुककर चले भी जाते थे, तो उनकी पत्नी अंत तक वहां मौजूद रहती थीं.

राष्ट्रपति भवन के स्टाफ फ्लैट में लंबे समय तक रहे भारतीय महिला फुटबॉल टीम के कोच अनादि बरूआ कहते हैं कि रमजान के महीने में खत्म शरीफ के अवसर पर राजेंद्र बाबू राष्ट्रपति भवन की मस्जिद में अवश्य जाते थे. उस दिन कुरआन का पाठ पूरा होता है.वे गाजे-बाजे के साथ पहुंचते और इमाम साहब को पगड़ी पहनाते थे. यह दृश्य परिसर के लोगों के लिए यादगार रहा. सभी प्रमुख त्योहार मनाने की यह परंपरा पहले राष्ट्रपति के समावेशी सोच का प्रमाण थी.

राष्ट्रपति भवन में रक्षाबंधन

खैर, डॉ. राजेंद्र प्रसाद के बाद भी राष्ट्रपति भवन में रक्षाबंधन का पर्व मनाया जाता है. प्रत्येक राष्ट्रपति ने इसे अपने अंदाज में आगे बढ़ाया. दार्शनिक और शिक्षाविद् डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन अमृत उद्यान में बेटियों के साथ रक्षाबंधन मनाते थे. बाग की हरियाली के बीच राखी का यह दृश्य बहुत सुंदर होता था. डॉ. शंकर दयाल शर्मा 1992 से 1997 तक राष्ट्रपति रहे. वे पहले अपने निजी स्टाफ के साथ कुछ समय बिताते थे. उसके बाद राष्ट्रपति भवन के अंदर चलने वाले स्कूल के बच्चों के साथ पर्व मनाते थे. बच्चों से बातचीत करना उन्हें अच्छा लगता था.

डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम 2002 से 2007 तक राष्ट्रपति रहे. वे स्टाफ की बेटियों से राखी बंधवाते थे. राखी और उपहार के बाद वे उनसे स्कूल-कॉलेज के पाठ्यक्रम के बारे में प्रश्न पूछते थे. विज्ञान और शिक्षा में उनकी रुचि इन मुलाकातों में भी झलकती थी. राष्ट्रपति भवन में रक्षाबंधन अब स्थायी उत्सव बन चुका है. परिसर की बेटियां हर साल इसका इंतजार करती हैं. देश के सबसे बड़े घर में वे राष्ट्रपति को भाई मानकर राखी बांधती हैं.

हाल के वर्षों में भी यह परंपरा जीवित रही. राम नाथ कोविंद और द्रौपदी मुर्मू ने इसे नए संदर्भ दिए. स्कूली बच्चियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और विभिन्न समुदायों की महिलाओं को आमंत्रित किया जाने लगा. वर्ष 2020 में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने नर्सिंग समुदाय के सदस्यों के साथ रक्षाबंधन मनाया. भारत के प्रशिक्षित नर्स संगठन, सैन्य नर्सिंग सेवा और राष्ट्रपति के एस्टेट क्लिनिक की प्रतिनिधियों ने उन्हें राखी बांधी. कोविड-19 महामारी के उन कठिन दिनों में नर्सों ने अपने अनुभव साझा किए. यह आयोजन केवल रीति-रिवाज नहीं था, बल्कि उन महिलाओं के प्रति सम्मान का प्रतीक था जो देश की सेवा में लगी थीं.

रक्षाबंधन पर पौधा रोपड़

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के कार्यकाल में भी यह उत्सव जारी है. विभिन्न स्कूलों और संगठनों की छात्राएं राष्ट्रपति भवन आती हैं. वे पर्यावरण अनुकूल राखी और हाथ से बने कार्ड भेंट करती हैं. राष्ट्रपति उनसे बात करती हैं और अक्सर पेड़ लगाने और प्रकृति की रक्षा का संदेश देती हैं. रक्षाबंधन का अर्थ अब केवल व्यक्तिगत रिश्ते तक सीमित नहीं रह गया. यह प्रेम, सुरक्षा और जिम्मेदारी का व्यापक भाव बन गया है. राष्ट्रपति भवन में यह पर्व देश की सांस्कृतिक विविधता और एकता दोनों को दर्शाता है.

आज जब राष्ट्रपति भवन में फिर राखी का आयोजन होगा तो याद रखना चाहिए कि इसकी जड़ें सात दशक पहले की उस सादगी में हैं. राजवंशी देवी की ममता, राजेंद्र बाबू की सरलता और बाद के राष्ट्रपतियों की निरंतरता ने इस परंपरा को जीवित रखा. राष्ट्रपति भवन का यह रक्षाबंधन सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं है, यह उस भारत की तस्वीर है, जहां सर्वोच्च पद पर बैठे व्यक्ति भी परिवार के बड़े भाई की तरह व्यवहार करते हैं. बहनें राखी बांधती हैं और पूरा परिसर एक बड़े परिवार की तरह जुड़ जाता है. डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने जो बीज बोया था, वह आज भी फल-फूल रहा है. हर पीढ़ी उसे नए अर्थ देती जा रही है.

(डिस्क्लेमर: लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, वो देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में अलग-अलग विषयों पर लेख लिखते हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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