दिल्ली में बुधवार शाम रंगकर्मियों ने दर्शकों को अपने सम्मोहन में बांधे रखा. मंडी हाउस के एलटीजी ऑडीटोरियम में नाटक 'पश्मीना' खेला गया. यह कोई नया नाटक नहीं था. मृणाल माथुर के लिखे 'पश्मीना' को पिछले आठ साल में देश के कई शहरों में 25 से अधिक बार मंचित किया जा चुका है. लेकिन इस बार रंगकर्म की दुनिया की प्रशिक्षित प्रतिष्ठित निर्देशक साजिदा साजी ने 'पश्मीना' को बड़े आकर्षक और नए रूप-रंग में पेश किया.
'पश्मीना' किसकी कहानी है
'पश्मीना' ज्यादा उलझाऊ कहानी नहीं है. मुख्य कथा दो सामान्य परिवारों की अपनी-अपनी निजी जिंदगियों की है. एक परिवार अमर और विभा सक्सेना का है. दोनों पेशे से शिक्षक हैं और दिल्ली में रहते हैं. उनका एक बेटा फौज में कैप्टन था. वह कश्मीर में तैनाती के दौरान दिवंगत हो गया था. दूसरा परिवार कश्मीर के श्रीनगर का है. इस परिवार का मुखिया 'पश्मीना' शाल का दुकानदार है. उसका बेटा आदिल भी कश्मीर त्रासदी की भेंट चढ़ चुका है.
एक शिक्षक के रूप में सरकारी नौकरी में रहे अमर और विभा की पृष्ठभूमि ऐसी है कि उनके पास नियमित रूप से दिल्ली से बाहर जाकर छुट्टियां बिताने की सरकारी सुविधा है. मगर वे अपने बेटे के वियोग की दुखद स्मृति के कारण हर बार कश्मीर जाने से बचते थे. खासतौर पर अमर की पत्नी विभा कश्मीर को लेकर अनमनी थी. लेकिन इस बार अमर ने विभा को कश्मीर घूमने के लिए तैयार कर लिया. कथा में ऐसा संयोग है कि सक्सेना दंपति श्रीनगर में आदिल के अब्बा की शॉल की दुकान तक पहुंच जाते हैं. कथा का अंत या चरमोत्कर्ष सक्सेना परिवार और आदिल के अब्बा के बीच बहुत ही भावुक संवाद संबंधों के बीच खत्म होता है.
जब एक हो गए दुख
'पश्मीना' की कथा में सक्सेना दंपति जैसे मध्यमवर्गीय परिवार के रोजमर्रा के सामान्य जीवन की मार्मिक झलकियां हैं. कुछ असमान्य है तो यह कि कई साल बाद भी उन्हें अपने बेटे के वियोग की पीर साल रही है. यहां इस बात का जिक्र करते चलना चाहिए कि ऐसे दुख दर्द मानव जीवन में अति दुर्लभ नहीं हैं, लेकिन उन दुख-दर्दों की अभिव्यक्ति जरूर दुष्कर है. कला मर्मज्ञ बता गए हैं कि ऐसे मनोभावों की अभियक्तियां ही कला का एक उत्कृष्ट रूप बन जाती हैं. क्योंकि वे संवेदनाओं को जगाती हैं. बहरहाल लेखक के रूप में मृणाल और रंगकर्म निर्देशक के रूप में साजिदा साजी ने ऐसे मानव सुलभ मनोभावों को बड़ी बारीकी और शिद्दत से अभिव्यक्त किया है. भारतीय रंगकर्म के मौजूदा माहौल और मिजाज में ऐसी कलात्मक और नैतिक रचनाधर्मिता आमतौर पर कम दिखती है.

मृणाल माथुर का लिखा नाटक 'पश्मीना' दो ऐसे परिवारों की कहानी है, जिनका दुख एक तरह का है.
Photo Credit: Pawan Singhal
चरमोत्कर्ष का एक दृश्य यह है कि शाल की दुकान पर ही विभा को अपने पति की जेब से अपने दिवंगत बेटे का 15 साल पुराना वह पत्र मिल जाता है, जिसमें उसने लिखा था कि इस बार वह कश्मीर से आते हुए मां के लिए 'पश्मीना' शॉल लेकर आ रहा है. विभा को इस पत्र के बारे में पहली बार पता चलता है.शॉल विक्रेता यानी आदिल के अब्बा की मौजूदगी से बेफर्क विभा यह पत्र पढ़कर भावुक हो जाती है. वह अपने पति से पूछती है कि बेटे के इस आखिरी पत्र को आखिर उससे छुपा कर क्यों रखा. इस मौके पर अमर और विभा की भावुक बातें सुनकर शॉल विक्रेता को पता चलता है कि इनकी जिंदगी में भी उसकी तरह का ही दुख है. शॉल विक्रेता यानी आदिल के अब्बा के लिए सक्सेना दंपति का जीवन उसकी अपनी जिंदगी का पर्याय बन जाता है. इस समय उसके हाथ में संयोग से एक ऐसा अनमोल 'पश्मीना' शॉल होता है जिसे उसके दिवंगत बेटे आदिल ने जीवन के आखिरी दिनों में अपने हाथों से बुना था. आदिल के अब्बा को पता चल चुका है कि अमर और विभा का दिवंगत बेटा अपनी मां को पशमीने का शॉल देना चाहता था, जो वह जीते जी दे नहीं सका. बहरहाल कश्मीर घूमने आए सक्सेना दंपति के पास महंगा शॉल खरीदने की सामर्थ्य नहीं है. आदिल के अब्बा भावुक हो जाते हैं. वे भावुक होकर सिर्फ दस हजार रुपये में वह बेशकीमती शाल सक्सेना दंपति को दे देते हैं. उनके जेहन में एक बार भी नहीं आता कि इस शॉल के साथ जुड़ी उनकी यादों और इस शॉल की गुणवत्ता के लिहाज से इस शॉल की कीमत क्या है. शॉल विक्रता की बेटी यानी आदिल की बहन इस घटना की चश्मदीद होती है. सक्सेना दंपति के जाने के फौरन बाद नाराज बेटी अपने अब्बा से पूछती है कि आपने ये क्या किया. अव्वल तो अपने भाई की आखिरी निशानी को बेचा ही क्यों और बेचा भी तो उस लाखों की कीमत वाले शॉल को केवल दस हजार में क्यों दे दिया. बेटी के इस सवाल के जबाव में अब्बा की सिर्फ भाव-भंगिमाएं थीं. बगैर संवादों के वे दृश्य रंगमंचीय अभिनय कला के नायाब स्मारक बनाकर रखे जा सकते हैं.
कश्मीर भी कथा का एक पात्र बना
वैसे तो 'पश्मीना' में छोटी-बड़ी भूमिका में 15 अभिनेता थे. लेकिन पृथ्वी के स्वर्ग सा भूखंड कश्मीर भी एक प्रमुख भूमिका में नजर आता है. मंचन की निर्देशक को जब यह दिखाने की जरूरत पड़ी कि सक्सेना दंपति दिल्ली से कश्मीर पहुंच गए हैं तो रंगकर्म के सीमित मंच पर सिर्फ एक दृश्य के जरिए ही इसे बखूबी बता लिया गया. वह दृश्य एक सम्मोहक और मनोहारी नृत्य था. कश्मीरी परिधान में तीन युवक-युवतियों के जोड़े कश्मीरी वाद्य और कश्मीरी गीत पर सुरुचिपूर्ण और मनोहारी नृत्य कर रहे थे. दर्शक ठहरे रह गए. इस बीच मंच की एक तरफ से सक्सेना दंपति आए और टहलते हुए दूसरी तरफ निकल गए. यह बताने की जरूरत ही नहीं पड़ी कि पर्यटक सक्सेना दंपति श्रीनगर पहुंच गए हैं. गौरतलब है कि ये दोनों दिल्ली में अपने एक पारिवारिक मित्र डॉ. कौल की मदद से एक शॉल विक्रेता का पता लेकर भी आए थे. डॉ. कौल कश्मीरी पंडित हैं और सक्सेना के पारिवारिक मित्र हैं. कथा में डॉ. कौल के कुछ संवाद जरूर हैं. लेकिन निर्देशक और लेखक ने उनके कश्मीरी पंडित होने जैसे सामुदायिक विषय को लंबा खींचने के लालच से बचना बेहतर समझा.
नाटक की शुरूआत में तत्कालीन कश्मीर की त्रासदी को बारूदी ध्वनियों और मृतकों के ढेर को सफेद कपड़े से ढकते हुए दिखाया गया था. उस समय जरा के लिए जरूर लगा कि शायद यह नाटक दुखद स्मृतियों का स्मारक बनाया जाएगा. लेकिन यह अंदाजा गलत निकला. उस सनसनीखेज दृश्य को ठहराया नहीं गया. जल्दी से मुख्य कथा को रफ्तार दे दिया गया. आगे यह कथा सामुदायिक द्वेष को उभारने के लालच में कहीं भी फंसती नजर नहीं आई.

इस नाटक का प्रमुख पात्र दो परिवार हैं. इनमें से एक दिल्ली का और दूसरा जम्मू कश्मीर के श्रीनगर का है.
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पूरी कथा में करीब-करीब सभी रसों का उत्पादन था. खासतौर पर करुणा और शांत रस का ज्यादा. लेखक और निर्देशक ने भयानक, घृणा, क्रोध जैसे सर्वसुलभ रसों के उत्पादन को ज्यादा महत्व नहीं दिया. कुछ संवादों में कश्मीर की व्यथा का संकेत भी था. मसलन एक दृश्य में शॉल व्यापारी याद दिलाता है कि लोग क्या लेने कश्मीर आते हैं और क्या देकर जाते हैं.
सनसनी की जरूरत क्यों नहीं पड़ी
यह नाटक नए रंगकर्मियों के लिए एक सबक बन सकता है कि दर्शकों को बांधे रखने के लिए ताबड़तोड़ सनसनी पैदा करना जरूरी नहीं है. नाट्यशास्त्र में जो नौ रसों की व्यवस्था है, उनमें करुण, श्रृंगार, शांत और हास्य जैसे रस उत्पादन से भी दर्शक को बांधे रखा जा सकता है. यहां गौर करना जरूरी है कि 'पश्मीना' को क्रोध, घृणा, भयानक जैसे लोकप्रिय बनाए जा रहे रसों से बचाकर रखा गया. मिसाल के तौर पर इस मंचन में सुरुचिपूर्ण सामूहिक नृत्य भरपूर शृंगार रस देने में समर्थ रहा.थोड़ी देर के लिए एक युवा दंपति ने शालीन हास्य रस दिया. सामंजस्य और सद्भाव के लक्ष्य के लिए करुण रस का बुद्धिमत्तापूर्ण प्रयोग दिखा.
लेखक मृणाल माथुर 'पश्मीना' पर इस सवाल का जबाब देने में संकोच दिखाते हैं कि रंग निर्देशकों को उनकी यह कथा इतनी पसंद क्यों आती है. फिर भी वे इस बात पर गौर जरूर कराते हैं कि इस कथा में मानवीय संबंधों की बारीकियां उजागर करने की कला प्रबंध है. उनसे बातचीत का एक आशय है कि सामाजिक और मानव के पारस्परिक द्वंद्व और सनसनीखेज संघर्षों को सनसनी बनाकर पेश करना एक बात है और उनके बीच प्रेम और सद्भाव को आकर्षक बनाकर पेश करना दूसरी बात है.'पश्मीना' में इस दूसरी बात पर ज्यादा गौर है.

नाटक 'पश्मीना'में कश्मीर की त्रासदी को बहुत ही संवेदना के साथ दिखाया गया है.
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कैसा रहा कलाकारों का अभिनय
साजिदा साजी मंच पर विभा की भूमिका में थीं. अपने अभिनय से उन्होंने अपने किरदार और खुद के बीच का फर्क मिटा दिया. विभा के जीवन की त्रासदी के अनुभव में जो विलाप के भावुक दृश्य उन्होंने बनाए उस दौरान दर्शक भी उनके साथ रो लिए. विभा के पति अमर सक्सेना की भूमिका मणिपुर रंगमंच के मशहूर निर्देशक जॉय माइस्नाम ने निभाई. सक्सेना दंपति का किरदार निभाने वाले जॉय और साजिदा के बीच वास्तविक जीवन में भी यही रिश्ता है. दोनों एनसीडी से प्रशिक्षित हैं. 'पश्मीना' शॉल के दुकानदार यानी आदिल के अब्बा के किरदार में मोहन जोशी ने दर्शकों को अपना कायल बना लिया. जिन दर्शकों में नाटक को लेकर नया-नया कलानुराग आया है, उन्हें यह पता नहीं होगा कि मोहन जोशी बहुत अनुभवी और रंगकर्म के प्रति बेहद समर्पित कलाकार हैं.'पश्मीना' में एक कश्मीरी दुकानदार की भूमिका उन्होंने ऐसी निभाई कि लगा कि जैसे वे वास्ताविक जीवन में भी पुश्तैनी कश्मीरी दुकानदार हों.
(डिस्क्लेमर:लेखक ने इंडियन एक्सप्रेस समूह के हिंदी अखबार 'जनसत्ता' के संपादकीय विभाग में 27 साल तक काम किया है. वो एनडीटीवी समेत कई दूसरी साइटों और पत्र-पत्रिकाओं के लिए लेख लिखते रहते हैं.इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)