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पुरुष प्रधान समाज की परतें उधेड़ता 'सखाराम बाइंडर'

सुधीर जैन
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    जून 16, 2026 13:47 pm IST
    • Published On जून 16, 2026 13:47 pm IST
    • Last Updated On जून 16, 2026 13:47 pm IST
पुरुष प्रधान समाज की परतें उधेड़ता 'सखाराम बाइंडर'

कोई नाटक अगर 54 साल बाद आज भी उतनी ही शिद्दत से खेला और देखा जा रहा हो तो वाकई बड़ी बात है. यह बहुचर्चित नाटक है विजय तेंदुलकर का लिखा 'सखाराम बाइंडर'.इसे बीते रविवार दिल्ली स्थित नेशनल स्कूल आफ ड्रामा (एनएसडी) के परिसर में अपनी क्षमता से ज्यादा भरी रंगशाला में मंचित किया गया.

इस नाटक को तेंदुलकर ने 1972 में लिखा था. इस नाटक के इतिहास में यह भी दर्ज है कि इसे 1974 में  अपने ऊपर सरकारी पाबंदी भी झेलनी पड़ी थी. हालांकि अदालती बहस-मुबाहिसे के बाद इस साहित्यिक रचना को जिंदा रहने की इजाजत मिल गई थी. पाबंदी के पीछे नुक्ता यह था कि इसके नाट्यालेख में जरूरत  से ज्यादा हिंसा और अश्लीलता है. लेकिन अदालती बहस के बाद तय पाया गया कि एक बड़े सामाजिक खोट को उजागर करने के लिए समाज में मौजूद क्रूरता शोषण और पुरुष प्रभुत्व के वीभत्स रूप का मंचन इसी तरह का सनसनीखेज होना वाजिब है.

सखाराम बाइंडर की अय्याशियां 

नाटक की कथा के मुताबिक इसका मुख्य किरदार सखाराम जिल्दसाज (बुक बाइंडर) है. वह कुव्यवहारी है. अपनी चाहरदीवारी में वह हद दर्जे का असभ्य है. उसकी अपनी सोच शादी के खिलाफ है. इसकी बजाए वह ऐसी औरतों को अपने घर लाकर रखता है जिन्हें उनके पतियों ने छोड़  या भगा दिया है. वह पहले भी छह महिलाओं को अपने घर ला और उन्हें बाहर कर चुका है. सातवीं महिला लक्ष्मी हैं, जो  धर्म उपासना में लिप्त रहते हुए सखाराम के जुल्मों को पूरे एक साल सहती है. धर्मकर्म में रमी लक्ष्मी को बाद में सखाराम की गाली-गलौच और व्यवहार सामान्य लगने लगता है. लेकिन सखाराम उससे भी ऊब जाता है. एक दिन नोकझोंक के बाद वह उसे घर से बाहर निकाल देता है. लक्ष्मी अपने भतीजे के पास चली जाती है. उसके बाद सखाराम आठवीं महिला चंपा को ले आता है. चंपा तेजतर्रार है और सखाराम के टक्कर की शौकीन है. अभद्रता में वह सखाराम से कम नहीं बल्कि इक्कीस बैठती है. सखाराम जल्द ही उस पर आसक्त भी हो जाता है. लेकिन एक दिन अचानक लक्ष्मी अपने भतीजे के पास से वापस सखाराम के घर आ जाती है. सखाराम उसे अपने घर पलभर भी नहीं ठहरने देना चाहता. वह लक्ष्मी को जबरन घर से बाहर धकेलने लगता है. इस बीच लक्ष्मी अपना चतुर रूप दिखाते हुए सखाराम को एक रहस्य बताती है. वह अपने भगवान की कसम खाकर सखाराम को यकीन दिला देती है कि चंपा अभी भी बदचलन है और अकेले में सखाराम के ही एक दोस्त के पास जाती है. यह सुनकर सखाराम की आसक्ति का मोह भंग हो जाता है. वह अचानक इतना बेकाबू हो जाता है कि चंपा को जान से मार डालता है. लेकिन फौरन ही सखाराम डर भी जाता है. यहां लक्ष्मी अपना रूप बदलकर सखाराम को हौसला देती है. वह उसे सलाह देती है कि लाश को घर में ही दफना दिया जाए. उसके बाद डरे और टूटे हुए सखाराम को लक्ष्मी की गोद में पनाह लेते हुए दिखाया गया है.

विजय तेंदुलकर के इस नाटक पर हिंसा और अश्लीलता परोसन के आरोप में सरकार ने 1974 में पाबंदी लगा दी थी.
Photo Credit: NSD, New Delhi

पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं पर अत्याचार

हालांकि इस नाटक का आखिरी दृश्य रूपांतरित संस्करण की उपज है. मंचसुलभ प्रकाश व्यवस्था के बीच इस दृश्यवैचित्र्य  में  दिवंगत चंपा उठती हुई दिखाई जाती है. वह धीरे धीरे चलकर उस कुर्सी के बगल वाली कुर्सी पर बैठ जाती है, जहां लक्ष्मी की गोद में सिर रखे सखाराम जमीन पर बैठा है. पटाक्षेप के ठीक पहले के इस दृश्य में लक्ष्मी और चंपा दर्शकों की तरफ देखते हुए विजेतानंद की मुद्रा में अट्टहास कर रही हैं. यह दृश्य देख खचाखच भरी रंगशाला दर्शकों की तालियों से गूंजती रही.   

पिछले छह दशक में इस नाटकथा की कार्य उपयोगिता पर तरह-तरह से विश्लेषण हुए हैं. नाटक में मुख्य किरदार सखाराम को लगता है कि वह बेसहारा और दुखियारी स्त्रियों पर उपकार करता है.पुरुष प्रभुत्व प्रदत्त समाज में सखाराम की धारणा है कि वह अपनी कथित उदारता के एवज में अपने घर लाई गईं स्त्रियों से खुलेआम दबंगई कर सकता है, उनसे अपने सारे काम करवा सकता है यहां तक कि दैहिक शोषण भी कर सकता है. इस पात्र की विशेषता यह है कि वह अपने कुव्यवहार और क्रूरता को बिल्कुल भी नहीं छुपाता. वह अपने व्यवहार को नैतिक ही समझता है. यानी ऐसा करने को वह वैसी अनैतिकता नहीं मानता कि उसे खुलेआम करने या कहने में कोई संकोच हो. इस तरह नाटक अपने दर्शकों के सामने सवाल खड़ा कर देता है कि बेसहारा औरतों को खाने,ओढ़ने, बिछाने का सहारा देने के ऐवज में क्या उन पर क्रूरता और उनका दैहिक शोषण वाजिब है. इस बात पर एक दार्शनिक विमर्श भी किया जा सकता है कि क्या किसी आदर्श या नैतिक उददेश्य की आड़ में की जा रही अनैतिकता को क्षम्य बनाया जा सकता है.

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सखाराम बाइंडर भारतीय समाज की सच्चाइयों की परतें उधेड़ता है.
Photo Credit: NSD, New Delhi

भारतीय समाज का विद्रूप चेहरा

नाटक के प्रमुख सात तत्वों में एक प्रमुख तत्व है किसी नाटक का उपयोग यानी उसका उद्देश्य है. इस नुक्ते को लेकर अगर कथा को परखा जाए तो विजय तेंदुलकर ने अपने समाज के कुरूप या विद्रूप को उजागर करते हुए नैतिक और अनैतिक के द्वंद्व और दुविधा को बार-बार रेखांकित किया है. मसलन मूल नाटक का एक प्रसंग है कि सखाराम अपने साथ लाई गई महिलाओं के साथ एक अनुबंध की घोषणा करता है कि अगर किसी महिला को उसके साथ रहना पसंद न आए तो वह किसी भी क्षण छोडकर जाने के लिए स्वतंत्र है. उसने उदार व्यवस्था कर रखी है कि वह उसे छोडकर जाने वाली महिला को एक साड़ी और 50 रुपए देगा और वह जहां भी जाना चाहे वहां तक का किराया भी देगा. नाटक के कथानक में ऐसा प्रसंग सखाराम की सनसनीखेज बुराइयों पर पर्दा डालकर एक पेचीदा भ्रम पैदा कर देता है. ऐसे में यह अंदेशा स्वाभाविक है कि सखाराम के व्यवहार को कुल-मिलाकर नैतिक मान लिया जाए यानी नैतिकता की आड़ में अनैतिकता की यह स्थिति दर्शकों के जेहन में कम से कम ऐसी छद्म अच्छाई को लेकर प्रश्नवाचक भ्रम तो पैदा कर ही देती है. किसी जटिलता पर विमर्श के लिए सवाल उठाना अच्छी साहत्यिक रचना का एक बड़ा मकसद माना जाता है.

किसी नाटक की एक निर्विवाद न्यूनतम योग्यता है कि वह दर्शकों को आखिर तक बांधे रखे. इस नाटक में दसियों दृश्य हैं जो सनसनीखेज हिंसा और समाज में अशिक्षित और असभ्य तबके की खुरदरी भाषा से सजाए या रचे गए हैं. वैसे भी साहित्य को रसपूर्ण बनाने की व्यवस्था में जुगुप्सा, घृणा और रौद्र जैसे रसों की स्वीकार्यता है.

मूल नाटक के विस्तार को संपादित करना बड़ा चुनौतीपूर्ण काम माना जाता है. लेकिन नाटक के निर्देशक मशहूर रंगकर्मी शांतनु बसु ने यह काम पेशेवर अंदाज में कर दिखाया. सखाराम के किरदार में पवन सिंघल ने अपनी रंगमंचीय समझ और इस कला के प्रति अपने समर्पण का पूरा आभास दिया. लक्ष्मी की भूमिका में इरा गलोथ ने इस नाटक के जरिए मुख्यधारा के  रंगकर्म में बड़े विश्वास के साथ दस्तक दी है. नाटक में एक सनसनी चंपा का किरदार चुनौतीपूर्ण था, लेकिन अनुभवी ज्योति नागपाल ने उस चुनौती को सहजता से आसान बना दिया.

(डिस्क्लेमर:लेखक मध्य प्रदेश के सागर विश्वविद्यालय में क्रिमिनोलॉजी एंड फॉरेंसिक साइंस के असिस्टेंट प्रोफेसर रहे हैं. उन्होंने सजायाफ्ता कैदियों पर शोध किया. विश्वविद्यालय से निकलकर उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस समूह के हिंदी अखबार 'जनसत्ता' के संपादकीय विभाग में 27 साल तक सेवाएं दीं. वो एनडीटीवी समेत कई दूसरी साइटों और पत्र-पत्रिकाओं के लिए लेख लिखते रहते हैं.इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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