‘ड्रामेटरर्जी' समाजशास्त्री इरविंग गौफमैन की एक अवधारणा है, जिसमें वे कहते हैं कि सामाजिक जीवन में सभी व्यक्ति अभिनय कर रहा होता है और यह एक सजग क्रिया है. ऐसा करके वह सामाजिक दुनिया में अपने अस्तित्व को सुरक्षित और मजबूत करने का प्रयास करता है. उनके अनुसार व्यक्ति का ‘स्व' (सेल्फ) भी एक सामाजिक-उत्पाद ही है. इस तरह से देखें तो हर इंसान एक शानदार अभिनेता है, अंतर बस औपचारिक और अनौपचारिक प्रस्तुति का है.
जब हम फिल्म, थियेटर आदि के माध्यम से अभिनय करते हैं तो यह एक औपचारिक अभिनय है, दूसरी तरफ जब हम दैनिक सामाजिक जीवन में जो कुछ करते हैं उसे अनौपचारिक अभिनय कह सकते हैं. इसलिए अभिनय करना जितना अभिनय है, अभिनय न करना भी उतना ही अभिनय है- अंतर बस मंच के होने या न होने का है. दोनों ही स्थितियां अभिनय की ही हैं.अभिनय हमारे चारों तरफ चल रहा होता है.

भारतीय सिनेमा में अनेक ऐसे कलाकार हुए हैं जिन्होंने अभिनय न करके अभिनय किया है, मतलब उनका मंचीय अभिनय मानवीय स्वभावों की सहज और गैर-नाटकीय अभिव्यक्ति जैसी रही है- मोतीलाल, इरफान खान, विजय सेतुपति, मोहनलाल जैसे अभिनेताओं को हम इस श्रेणी में रख सकते हैं.
वहीं दूसरी तरफ अभिनय का जिन्होंने अभिनय किया उनमें जिन लोगों का नाम आता है उसमें नाना पाटेकर का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है.
आज वे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका अभिनय हमेशा हमारे 'सेल्फ' को प्रभावित करता रहेगा. हमारा 'सेल्फ' जो आज कई कारणों से मृत होता जा रहा है, उसके लिए नाना के अभिनय और संवाद युद्ध-मैदान में किसी रणभेरी की तरह है, जिसे उनकी कल्ट फिल्म क्रांतिवीर में देखा जा सकता है.
उनकी डायलॉग डिलीवरी की प्रभावशीलता को बताने के लिए हम यहां दिनकर की कविता को ले सकते हैं- 'मर्त्य मानव के विजय का तूर्य हूं मैं, उर्वशी अपने समय का सूर्य हूं मैं.'
सच में नाना तूर्य यानि रणभेरी ही थे जो मरे हुए मानव में प्राण फूंकने की कला जानते थे. वे जब बोलते थे तब खामोशी छा जाती थी और जब चुप रहते थे तो कोलाहल मच जाता था.

नाना कलाकार थे, 'स्टार' नहीं. 'स्टार' होना कला की हत्या कर देना है. 'स्टार' होना एक ‘उद्धमी-प्रघटना' (Entrepreneur-phenomena) है जो पूंजी और बाजार के सह-संबंधों और उसकी मांगों के अनुरूप बनता है; जबकि कलाकार होना सर्जक (Creator) होना है, जो देश और समाज के मूल्यों और सरोकारों के साथ बनता-बढ़ता है.
‘स्टार' होने के लिए सरोकार की संभावना अनिवार्य शर्त नहीं है, लेकिन कलाकार का अनिवार्य तौर पर एक सरोकार होगा तभी वह कलाकार हो सकता है. वह जुड़ा होगा अपने आप से, अपने पास से. वह जुड़ा होगा लोगों से, समाज से, देश और दुनिया से. उनके सुख से उनके दुःख से.
नाना का जुड़ाव भी बहुत गहरा और व्यापक था, इसलिए वे एक महान कलाकार थे. ऐसा नहीं है, उनके जीवन में विवाद नहीं थे. उन्होंने भी विवादों के बीच जीवन जीया. सब गलतियां करते हैं. उनसे भी हुई होंगी. लेकिन, इससे उनकी कला और व्यक्तित्व पर सवाल नहीं खड़े किये जा सकते.
नाना के अभिनय का संसार बहुत बड़ा था जिसमें प्रवेश कर पाना 'स्टारों' के लिए आसान नहीं. संचार के सिद्धांत, संचार को परिभाषित करते हुए कहते हैं कि 'संचार का मतलब है जो समझा जाए न कि जो कहा जाए' और इस अर्थ में नाना की डायलॉग डिलीवरी इतनी सशक्त थी कि जो वे कहना चाहते थे वे दर्शकों तक आसानी से उसी तरह से पहुंचा देते थे.
स्पष्टता इतनी कि हर वर्ग और आयु के बीच उनकी फिल्मों और डायलॉग का असर था. डायलॉग के दौरान केवल शब्द ही नहीं, बल्कि उनकी आंखें, उनका शरीर सबकुछ डायलॉग डिलीवरी के अलग-अलग औजार की तरह काम करता है.
हास्य, व्यंग्य, आक्रोश, प्रेम, विरह, वैराग्य सबकुछ था उनके अभिनय में. यूं कहे तो उनका अभिनय तमाम मानवीय अभिव्यक्तियों की अभिव्यक्ति थी.

फिल्मी नाटकीयता के बीच भी वे यथार्थ को अनदेखा नहीं कर सके थे, शायद इसलिए कि जीवन के झंझावात उनके भीतर महान हलचल पैदा कर रहे थे और जिसकी गुथ्थियां वे अपने किरदारों में अक्सर सुलझाने का प्रयास करते दिखे.
उनके अभिनय में एक महान बेचैनी देखी जा सकती है. शायद उतनी बेचनी अबतक किसी हिंदी अभिनेता में न देखी गई हो. कलाकार शायद बेचैनी से ही बनता है और उसी में वह फलता-फूलता है. वो कहते हैं न किप्यास जो अगर बुझ गई जिन्दगी फिर जिन्दगी न रही.'
उनके अभिनय में 'स्टारों' वाली मखमली बातें नहीं थी, बल्कि उनका अभिनय उबड़-खाबड़ और जोखिम से भरा सफर था. उनके प्रेम में भी कांटे थे.
नाना के अभिनय में यथार्थवाद इस तरह का था कि फिल्मी रोमांस उसी यथार्थवाद के इर्द-गिर्द घूमता नजर आता है. रोमांस में भी उन्होंने प्रेम के दुनियावी चुनौतियों और संघर्षों का चित्रण किया.
क्रांतिवीर में उनका कलमवाली बाई से रोमांस का खुरदूरापन बहुत आसानी से समझा जा सकता है. प्रेमिका से संवाद भी सामाजिक परिवर्तन के मसले को लेकर ही था न कि घर बसाने और हनीमून मनाने को लेकर.
नाना स्वभाव से प्रतिरोध के अभिनेता थे. उनके अभिनय में सामाजिक और राजनीतिक मसलों को लेकर आक्रोश था. मजहब, सत्ता, समाज सब पर उन्होंने आक्रमण किया. उनकी बेरुखी से भरे संवाद तमाम दुनियावी पाखंडों पर एक हमला की तरह है.
कवि केदारनाथ अग्रवाल के शब्दों में कहें तो, 'मैंने उसको जब-जब देखा लोहा देखा, लोहे जैसे गलते देखा-ढलते देखा, मैंने उसको गोली जैसे चलते देखा.'
(डिस्क्लेमर: लेखक इलाहाबाद विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र पढ़ाते हैं.इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)