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शादी के बाद महिला की 'ना' को क्यों नहीं सुन पाती हैं अदालतें 

सीमा जोशी
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    मार्च 29, 2026 13:22 pm IST
    • Published On मार्च 29, 2026 13:21 pm IST
    • Last Updated On मार्च 29, 2026 13:22 pm IST
शादी के बाद महिला की 'ना' को क्यों नहीं सुन पाती हैं अदालतें 

भारतीय समाज में विवाह को केवल एक सामाजिक अनुबंध नहीं, बल्कि एक पवित्र और अटूट बंधन के रूप में देखा जाता है. लेकिन जब यही बंधन कानून के दायरे में आता है, तो एक असहज प्रश्न सिर उठाता है, क्या विवाह के भीतर 'सहमति' का कोई अर्थ रह जाता है?

क्या है मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का फैसला

हाल ही में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के ग्वालियर बेंच के एक फैसले ने इस प्रश्न को और गहरा कर दिया है. अदालत ने यह स्पष्ट किया कि वैध विवाह के भीतर पति-पत्नी के बीच यौन संबंधों में 'सहमति' का प्रश्न कानूनी रूप से अप्रासंगिक है. यह निष्कर्ष किसी नैतिक स्वीकृति का नहीं, बल्कि कानून की वर्तमान संरचना का परिणाम है, एक ऐसी संरचना, जो स्त्री की इच्छा और असहमति को विवाह के भीतर सीमित कर देती है.

यह इस फैसले की कानूनी बारीकियों को सामने लाती है. अदालत ने भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 375 में निहित वैवाहिक अपवाद का हवाला देते हुए कहा कि पति द्वारा पत्नी के साथ यौन संबंध चाहे वह उसकी इच्छा के विरुद्ध ही क्यों न हो बलात्कार की श्रेणी में नहीं आता. इसी तर्क के आधार पर धारा 377 के तहत 'अप्राकृतिक कृत्य' का आरोप भी असंगत ठहराया गया.

यहां कानून एक अजीब स्थिति में खड़ा दिखता है, वह कृत्य को गलत मान सकता है, पर उसे अपराध नहीं मानता. ऐसे में सवाल उठता है कि जब एक महिला की 'ना' विवाह के बाहर पूर्ण कानूनी महत्व रखती है, तो विवाह के भीतर वही 'ना' क्यों मौन हो जाती है? यह केवल कानून की तकनीकी व्याख्या नहीं, बल्कि समाज की गहरी संरचनात्मक असमानता का प्रतिबिंब है.

आईपीसी से बीएनएस तक का सफर

पुरानी भारतीय दंड संहिता (IPC) से लेकर नई भारतीय न्याय संहिता (BNS) तक की यात्रा इस प्रश्न का उत्तर खोजने का अवसर थी. परंतु यह यात्रा अधूरी रह गई.बीएनएस ने न केवल आईपीसी की मूल संरचना को बनाए रखा, बल्कि वैवाहिक अपवाद को भी जस का तस स्वीकार कर लिया. अंतर केवल इतना है कि आईपीसी की धारा 377—जो कभी-कभी एक वैकल्पिक रास्ता प्रदान करती थी, अब हटा दी गई है. परिणामस्वरूप, विवाह के भीतर यौन हिंसा के विरुद्ध आपराधिक कानून और भी सीमित हो गया है.

यह स्थिति एक गहरे विरोधाभास को जन्म देती है, वही कृत्य, जो विवाह के बाहर अपराध है, विवाह के भीतर वैध हो जाता है.
यह केवल कानूनी अंतर नहीं, बल्कि न्याय की दोहरी परिभाषा है. इस पूरे विमर्श का सबसे चिंताजनक पहलू 'सहमति' का क्षरण है. सहमति केवल एक शब्द नहीं, बल्कि व्यक्ति की स्वतंत्रता और गरिमा का आधार है. जब कानून विवाह के भीतर इसे अप्रासंगिक घोषित करता है, तो वह अनजाने में यह संदेश देता है कि विवाह, स्त्री की स्वायत्तता पर वरीयता रखता है.
यह प्रश्न तब और गंभीर हो जाता है, जब हम इसे संविधान के संदर्भ में देखते हैं. भारत का संविधान हर नागरिक को गरिमा, स्वतंत्रता और शारीरिक स्वायत्तता का अधिकार देता है. यदि ये अधिकार सार्वभौमिक हैं, तो विवाह के भीतर उनका क्षरण कैसे स्वीकार्य हो सकता है?

क्या कानून का नाम बदल देने से उसकी आत्मा बदल जाती है

अदालतें अक्सर यह कहकर अपनी सीमाएं रेखांकित करती हैं कि यह विषय विधायिका के दायरे में आता है. किंतु विधायिका ने भी, बीएनएस के माध्यम से, इस मौन को बनाए रखा है. इस प्रकार, न्यायपालिका और विधायिका दोनों के बीच 'सहमति' का प्रश्न एक अनुत्तरित पहेली बना हुआ है.

इस बीच,समाज में एक और मौन पनपता है, पीड़िताओं का मौन. जब कानून यह संकेत देता है कि उनकी असहमति का कोई महत्व नहीं, तो न्याय की आशा भी धीरे-धीरे क्षीण होने लगती है. अंततः, यह प्रश्न केवल कानून का नहीं, बल्कि हमारे सामाजिक विवेक का है, क्या विवाह एक साझेदारी है या एक ऐसा अनुबंध जहां 'ना' का कोई अस्तित्व नहीं?

आईपीसी से बीएनएस तक का सफर हमें यह सिखाता है कि कानून बदलना आसान है, पर उसकी आत्मा को बदलना कहीं अधिक कठिन. जब तक विवाह के भीतर भी सहमति को वही सम्मान नहीं मिलेगा, जो विवाह के बाहर है, तब तक न्याय अधूरा ही रहेगा. और तब तक, स्त्री की 'ना' कानून की किताबों में नहीं, केवल उसके भीतर गूंजती रहेगी.

डिस्क्लेमर: लेखक, सदस्य, आंतरिक समिति राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण और इंडियन नेशनल साइंस एकेडमी की सदस्य हैं. वो कार्यस्थल पर महिलाओं के उत्पीड़न के विषय पर 'Breaking the silence a hand book on PoSH act'नामक किताब की लेखक हैं.इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है. 

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