टिहरी में 18 वर्षीय केतन लाल की हत्या ने पूरे उत्तराखंड को झकझोर दिया है. पुलिस जांच के अनुसार केतन की दोस्ती एक नाबालिग लड़की से थी, जिसका परिवार इस रिश्ते का विरोध कर रहा था. आरोप है कि 7 जून की रात उसे बुलाकर बेरहमी से पीटा गया, जिससे उसकी मौत हो गई.
मामले की जांच जारी है, लेकिन इस घटना ने जातिगत भेदभाव, अंतरजातीय रिश्तों के प्रति समाज के रवैये, हॉरर किलिंग और मौजूदा कानूनी व्यवस्था को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.
उत्तराखंड में बदलते सामाजिक माहौल का संकेत यह घटना
उत्तराखंड को अक्सर अपेक्षाकृत शांत, सहिष्णु और प्रगतिशील समाज के रूप में देखा जाता है. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि अंतरजातीय रिश्तों को लेकर इतनी हिंसक प्रतिक्रिया क्यों देखने को मिल रही है और क्या यह किसी गहरे सामाजिक बदलाव का संकेत है?
देहरादून के सामाजिक कार्यकर्ता इंद्रेश मैखुरी के अनुसार केतन लाल हत्याकांड केवल एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि समाज में मौजूद जातिगत पूर्वाग्रहों की एक गंभीर अभिव्यक्ति है. उनके मुताबिक सामान्य परिस्थितियों में उत्तराखंड में अक्सर यह दावा किया जाता है कि यहां जातिगत भेदभाव अपेक्षाकृत कम है, लेकिन अंतरजातीय प्रेम, मित्रता या विवाह जैसे मामलों में समाज का एक कठोर चेहरा सामने आ जाता है.
मैखुरी का मानना है कि जातिगत श्रेष्ठता का भाव लोगों को इस हद तक हिंसक बना सकता है कि वे प्रेम और मित्रता को भी अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा पर हमला समझने लगते हैं. उनके अनुसार केतन की हत्या इसी मानसिकता की एक भयावह मिसाल है, जहां एक दलित युवक और सवर्ण परिवार की लड़की के बीच मित्रता को स्वीकार करने के बजाय हिंसा का रास्ता चुना गया. वे इस घटना को वर्ष 2022 में अल्मोड़ा में दलित राजनीतिक कार्यकर्ता जगदीश चंद्र की हत्या जैसी घटनाओं की कड़ी में देखते हैं और मानते हैं कि सामाजिक बदलाव के दावों के बावजूद जाति का प्रश्न अब भी समाज के भीतर मौजूद है.
उत्तराखंड एकजुट होकर क्यों खड़ा नहीं दिखाई देता?
वहीं उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार बद्रीदत्त कसनियाल इस घटना को राज्य के सामाजिक चरित्र और सामूहिक संवेदनशीलता से जोड़कर देखते हैं. उनके अनुसार सबसे बड़ा सवाल यह है कि इतनी बर्बर घटना के बावजूद पूरा उत्तराखंड एकजुट होकर क्यों खड़ा नहीं दिखाई देता. उनका मानना है कि उत्तराखंड लंबे समय से अपेक्षाकृत सहिष्णु और सामाजिक रूप से संवेदनशील समाज के रूप में पहचाना जाता रहा है. ऐसे में यह समझना जरूरी है कि आखिर समाज के भीतर ऐसी क्रूरता और असहिष्णुता क्यों बढ़ रही है और वे कौन से कारक हैं जो लोगों को इतनी जघन्य हिंसा के प्रति भी उदासीन बना रहे हैं.
कसनियाल के मुताबिक इस घटना को केवल एक अपराध के रूप में नहीं, बल्कि उत्तराखंड के बदलते सामाजिक चरित्र के संदर्भ में भी देखने की जरूरत है. उनका मानना है कि राज्य की पहचान लंबे समय तक सह-अस्तित्व, सामाजिक संतुलन और सहिष्णुता से जुड़ी रही है, लेकिन अब उस छवि पर दबाव दिखाई दे रहा है. उनके अनुसार उत्तराखंडी समाज को अपनी पारंपरिक सहिष्णुता और सामाजिक सौहार्द को फिर से अपनी पहचान का हिस्सा बनाना होगा.
इसी सवाल पर हिंदी लेखक दीपक तिरुआ इस घटना को भारतीय समाज में चल रहे एक बड़े वैचारिक संघर्ष के संदर्भ में देखते हैं. उनके अनुसार पिछले 76 वर्षों में भारतीय संविधान ने समानता, स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय के मूल्यों के आधार पर समाज को आगे बढ़ाने का प्रयास किया है, लेकिन प्रतिगामी और जातिवादी सोच लगातार उस प्रक्रिया को पीछे धकेलने का काम कर रही है.
तिरुआ का मानना है कि केतन लाल हत्याकांड जैसी घटनाएं केवल कानून-व्यवस्था की विफलता नहीं हैं, बल्कि वे इस बात का संकेत भी हैं कि समाज के भीतर अब भी ऐसी मानसिकताएं मौजूद हैं जो संवैधानिक मूल्यों को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं. उनके अनुसार अंतरजातीय रिश्तों या सामाजिक बराबरी को हिंसा के जरिए दबाने की कोशिशें लोकतांत्रिक और संवैधानिक व्यवस्था की भावना के खिलाफ हैं.
वे मानते हैं कि ऐसी प्रवृत्तियों पर काबू पाना समाज और राज्य दोनों की प्राथमिकता होनी चाहिए. उनके मुताबिक भारत ने लंबे संघर्ष के बाद समानता और सामाजिक न्याय की दिशा में जो प्रगति हासिल की है, उसे जातिगत घृणा और हिंसा के जरिए कमजोर नहीं होने दिया जा सकता. तिरुआ के अनुसार समाज के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह संविधान के मूल्यों और बर्बर सामाजिक प्रवृत्तियों के बीच किस पक्ष को चुनता है.
क्या मौजूदा कानून पर्याप्त हैं?
केतन लाल हत्याकांड ने कानून और न्याय व्यवस्था से जुड़े कई गंभीर सवाल भी खड़े किए हैं. यदि जांच में यह साबित होता है कि हत्या अंतरजातीय रिश्ते के विरोध और जातिगत पहचान की वजह से हुई, तो क्या मौजूदा कानून ऐसे अपराधों को रोकने और पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने के लिए पर्याप्त हैं या फिर किसी नए कानूनी ढांचे की जरूरत है?
'समाज और कानून दोनों के लिए गंभीर चेतावनी'
इस सवाल पर उत्तराखंड हाईकोर्ट के अधिवक्ता अभिजय नेगी का मानना है कि टिहरी में जो हुआ वह केवल एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि समाज और कानून दोनों के लिए गंभीर चेतावनी है. उनके अनुसार एक युवा दलित लड़के की हत्या, केवल इसलिए कि उसकी दोस्ती एक उच्च जाति के परिवार की लड़की से थी, हॉरर किलिंग और जातिगत अत्याचार के व्यापक प्रश्नों को सामने लाती है.
नेगी के मुताबिक वर्तमान मामले में भारतीय न्याय संहिता और एससी-एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत कार्रवाई के पर्याप्त कानूनी आधार मौजूद हैं. हत्या के लिए भारतीय न्याय संहिता की प्रासंगिक धाराएं लागू होती हैं, जबकि यह एक सामूहिक कृत्य होने के कारण साझा आपराधिक मंशा से जुड़े प्रावधान भी लागू किए जा सकते हैं. इसके अलावा यदि यह साबित होता है कि अपराध पीड़ित की जातिगत पहचान के कारण किया गया, तो एससी-एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धाराएं भी लागू होंगी.
नेगी के अनुसार पुलिस ने एससी-एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 3(2)(v) भी लगाई है, जो किसी गैर-अनुसूचित जाति/जनजाति व्यक्ति द्वारा अनुसूचित जाति या जनजाति के सदस्य के खिलाफ उसकी जातिगत पहचान के आधार पर गंभीर अपराध किए जाने पर लागू होती है.
उनके अनुसार अधिनियम की धारा 15A पीड़ित परिवार, गवाहों और अन्य प्रभावित व्यक्तियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी राज्य पर डालती है. साथ ही भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता, अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता तथा अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता के उन्मूलन की गारंटी देता है. ऐसे में जाति के आधार पर किसी व्यक्ति के खिलाफ हिंसा केवल आपराधिक कृत्य नहीं बल्कि संवैधानिक मूल्यों पर भी सीधा आघात है.
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हालांकि नेगी का मानना है कि यह मामला एक महत्वपूर्ण कानूनी कमी की ओर भी ध्यान दिलाता है. भारत में हॉरर किलिंग को अलग और विशिष्ट अपराध के रूप में परिभाषित करने वाला कोई विशेष कानून नहीं है. उनके अनुसार भारतीय विधि आयोग ने अपनी 242वीं रिपोर्ट में सम्मान और परंपरा के नाम पर होने वाले अपराधों को रोकने के लिए विशेष कानून का सुझाव दिया था, लेकिन अब तक ऐसा कानून नहीं बन पाया है.
नेगी के मुताबिक बदलते सामाजिक हालात को देखते हुए हॉरर किलिंग के खिलाफ विशेष कानून और अंतरजातीय संबंधों से जुड़ी हिंसा को लेकर कानूनी प्रावधानों को और मजबूत करने पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए. उनके अनुसार केतन लाल का मामला केवल एक मुकदमा नहीं, बल्कि विधायिका और नीति निर्माताओं के लिए भी एक चेतावनी है कि ऐसे अपराधों की रोकथाम और पीड़ितों की सुरक्षा के लिए कानूनों को समय के अनुरूप और अधिक प्रभावी बनाया जाए.
(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)