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ट्रंप के आगे क्यों झुक नहीं रहा है ईरान, कहां से आती है इतनी ताकत

अज़ीज़ुर रहमान आज़मी
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    अप्रैल 21, 2026 13:23 pm IST
    • Published On अप्रैल 21, 2026 13:23 pm IST
    • Last Updated On अप्रैल 21, 2026 13:23 pm IST
ट्रंप के आगे क्यों झुक नहीं रहा है ईरान, कहां से आती है इतनी ताकत

28 फरवरी 2026 को अमरीका और इजरायल ने ईरान पर हमला किया था. यह हमला तब हुआ, जब ईरान और अमेरिका वार्ता की मेज पर थे. अमेरिका का दावा है कि उसने ईरान के 13 हजार से अधिक ठिकानों पर बमबारी की है. इसके जवाब में ईरान ने खाड़ी के देशों में स्थित अमरीकी सैन्य और सामरिक ठिकानों को निशाना बनाया. उसके हमलों की जद में इजरायल भी आया. इसमें दोनों देशों को काफी नुकसान उठाना पड़ा है. तीन देशों के इस युद्ध का ताप पूरी दुनिया में महसूस किया जा रहा है. इसमें वो देश भी पिस रहे हैं, जिनका इस लड़ाई से कोई लेना-देना नहीं है. अंतरराष्ट्रीय मीडिया इस युद्ध को हवाई हमलों, मिसाइल क्षमताओं, परमाणु कार्यक्रम और सामरिक गठबंधन के संदर्भ में पेश कर रहा है. इस पूरे घटनाक्रम को केवल सैन्य रणनीति और शक्ति संतुलन के रूप में देखना एक सीमित दृष्टिकोण है. यह हमें केवल संघर्ष का बाहरी रूप दिखाता है, जबकि इसके पीछे एक गहरी वैचारिक, ऐतिहासिक और सामाजिक संरचना काम कर रही है. ईरान को समझने के लिए हमें एक बुनियादी सवाल पूछना होगा- क्या ईरान केवल एक राष्ट्र-राज्य है या एक वैचारिक परियोजना? इस प्रश्न का उत्तर हमें प्रतिरोध (Resistance) की अवधारणा तक ले जाता है. यह ईरान की राजनीतिक पहचान का केंद्रीय तत्व है. इस प्रतिरोध की कथा की जड़ें ईरान के आधुनिक इतिहास में निहित हैं, विशेष रूप से 20वीं शताब्दी के दौरान विदेशी हस्तक्षेप और राजनीतिक उथल-पुथल के अनुभवों में. 

1953: ईरान को बदलने वाला साल 

ईरान की आधुनिक राजनीतिक चेतना की शुरुआत 1953 की घटना से होती है, जब प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसादेघ को सत्ता से हटा दिया गया था. उन्होंने ईरान के तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण किया था, जो पश्चिमी शक्तियों खासकर अमेरिकी हितों के खिलाफ था. यह घटना ईरान के लिए केवल एक राजनीतिक बदलाव नहीं थी, बल्कि प्रतीकात्मक भी बन गई कि कैसे बाहरी शक्तियां किसी देश की संप्रभुता को प्रभावित कर सकती हैं. मोसादेघ को सत्ता से हटाकर पश्चिमी शक्तियां और अमेरिका शाह मोहम्मद रजा पहलवी के नेतृत्व में ईरान में फिर से राजतंत्र स्थापित कर दिया था. पहलवी पश्चिमी शक्तियों के इशारे पर काम कर रहे थे. यहां तक कि उन्होंने ईरानी संस्कृति को जबरदस्ती पश्चिमी रंग देना शुरू कर दिया. ईरान की राजनीतिक और आर्थिक स्वतंत्रता समझौते की स्थिति में पहुंच गई. पश्चिमी और यूरोपीय शक्तियों का तेल संसाधनों पर पूरा नियंत्रण होने के कारण ईरान को आर्थिक मंदी का सामना करना पड़ा. इस आर्थिक संकट में लोगों ने समझा कि उनकी बदहाली की वजह अमेरिकन औपनिवेशवाद है. इसमें पहलवी एक मोहरा हैं.

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इन्हीं परिस्थितियों में 1979 के क्रांतिकारी आंदोलन में ईरानी जनता ने अयातुल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी के नेतृत्व में गति प्राप्त की. इस क्रांति ने केवल राजतंत्र को समाप्त किया, बल्कि स्वतंत्रता, सांस्कृतिक अस्मिता और बाहरी प्रभुत्व के विरुद्ध प्रतिरोध पर आधारित एक सशक्त वैचारिक दृष्टि भी पेश किया. क्रांतिकारी विमर्श में इस संघर्ष को केवल सत्ता परिवर्तन के रूप में नहीं बल्कि विदेशी प्रभाव से राष्ट्रीय गरिमा और संप्रभुता को फिर से हासिल करने के व्यापक प्रयास के रूप में पेश किया गया.

1979 की इस्लामिक क्रांति से क्या बदला

1979 की इस्लामी क्रांति, जिसका नेतृत्व अयातुल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी ने किया, एक ऐतिहासिक मोड़ था. यह केवल एक शासन परिवर्तन नहीं था, बल्कि एक वैचारिक पुनर्निर्माण था. इस्लामिक क्रांति ने ईरान को एक ऐसे राज्य में बदल दिया जो खुद को वैश्विक शक्ति-संरचना के खिलाफ खड़ा मानता है.'प्रतिरोध' अब केवल एक नारा नहीं था, बल्कि राज्य की वैचारिक नींव बन गया. क्रांति से पहले के दशकों में उभरी बौद्धिक धाराओं ने भी इस विचारधारा के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. इन विचारकों में अली शरियती का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है. शरियती ने इस्लामी परंपराओं की पुनर्व्याख्या उपनिवेशवाद विरोधी और सामाजिक न्याय के आंदोलनों के संदर्भ में की. उनका तर्क था कि इस्लाम एक क्रांतिकारी शक्ति के रूप में काम कर सकता है, जो समाज को उत्पीड़न और साम्राज्यवादी प्रभुत्व के विरुद्ध संगठित कर सकता है. इसी समय लेखक जलाल आल-ए-अहमद ने 'ग़रबज़दगी' (Gharbzadegi) की अवधारणा पेश की, जिसे प्रायः 'वेस्टॉक्सिफिकेशन' या पश्चिमी प्रभाव के अतिरेक के रूप में अनूदित किया जाता है. उन्होंने यह दिखाने का प्रयास किया कि ईरानी समाज सांस्कृतिक और आर्थिक रूप से पश्चिमी विकास मॉडल पर अत्यधिक निर्भर हो गया है. इन बौद्धिक विचारों ने मिलकर धार्मिक पहचान और साम्राज्यवाद-विरोधी राजनीतिक चिंतन के बीच एक महत्वपूर्ण समन्वय स्थापित किया.

ईरान में शिया मुसलमानों की ताकत

इस समाजशास्त्रीय ढांचे के निर्माण में धर्म एक केंद्रीय भूमिका निभाता है. ईरान की 90–95 फीसदी आबादी इस्लाम की शिया शाखा मानने वाली है. इससे यह दुनिया का सबसे बड़ा शिया बहुल देश बन जाता है. शिया ऐतिहासिक परंपराएं अन्याय और अत्याचार के खिलाफ प्रतिरोध की भावना पर विशेष जोर देती हैं. इसका सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण सातवीं शताब्दी में करबला के युद्ध में इमाम हुसैन इब्न अली की शहादत की कथा है. ईरान के इस्लामी गणराज्य के राजनीतिक विमर्श में इस ऐतिहासिक स्मृति को अत्याचार के खिलाफ खड़ा होने और न्याय की रक्षा करने की नैतिक शिक्षा के रूप में पुनर्व्याख्यायित किया गया है, भले ही शक्ति संतुलन प्रतिकूल ही क्यों न हो.

समय के साथ प्रतिरोध की यह विचारधारा ईरानी राज्य की राजनीतिक संरचना में संस्थागत रूप ले चुकी है. सरकारी संस्थान, सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था और राजनीतिक बयानों में अक्सर स्वतंत्रता, संप्रभुता और साम्राज्यवाद के खिलाफ प्रतिरोध जैसे विषयों पर जोर दिया जाता है. राज्य की राजनीतिक कथा वैश्विक राजनीति को प्रभुत्व और प्रतिरोध के बीच संघर्ष के रूप में पेश करती है. इसमें ईरान स्वयं को राष्ट्रीय संप्रभुता और क्षेत्रीय स्वतंत्रता का रक्षक बताता है.

होमुर्ज स्ट्रेट पर ईरानी दावे को लेकर राजधानी तेहरान में लगा एक पोस्टर.

होमुर्ज स्ट्रेट पर ईरानी दावे को लेकर राजधानी तेहरान में लगा एक पोस्टर.
Photo Credit: PTI

यह वैचारिक दृष्टिकोण ईरान की क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय नीतियों को भी प्रभावित करता है. ईरानी नेता अक्सर अपनी विदेश नीति को पश्चिम एशिया में कथित प्रभुत्ववादी प्रभाव के विरुद्ध 'प्रतिरोध की धुरी' (Axis of Resistance) का हिस्सा बताते हैं. इस दृष्टिकोण के समर्थकों का तर्क है कि यह विदेशी हस्तक्षेप और कब्जे के विरोध में आंदोलनों के साथ एकजुटता को दर्शाता है. वहीं आलोचकों का मानना है कि ऐसी नीतियां क्षेत्रीय तनाव को बढ़ाती हैं और अन्य देशों के साथ भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को और गहरा करती हैं.

ईरान में हस्तक्षेप, क्रांति और धार्मिक पहचान

सामाजिक दृष्टि से देखें तो प्रतिरोध की इस कथा की निरंतरता यह दर्शाती है कि ऐतिहासिक स्मृति और सामूहिक पहचान राजनीतिक व्यवहार को किस प्रकार प्रभावित करती हैं. ईरान में राजनीतिक वैधता अक्सर इस बात से जुड़ी होती है कि नेता स्वयं को राष्ट्रीय स्वतंत्रता और क्रांतिकारी आदर्शों के रक्षक के रूप में पेश कर पाते हैं या नहीं. इसलिए बाहरी दबाव या संघर्ष कई बार उसी प्रतिरोध की भावना को और मजबूत कर देता है, जो राजनीतिक व्यवस्था को वैधता प्रदान करती है और बाहरी खतरे की धारणा के सामने राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करती है. समकालीन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में ईरान की भूमिका को समझने के लिए प्रतिरोध के इस समाजशास्त्र को समझना अत्यंत आवश्यक है. ईरान की नीतियां केवल रणनीतिक गणनाओं से संचालित नहीं होतीं, बल्कि वैचारिक और ऐतिहासिक ढांचों से भी प्रभावित होती हैं, जिनके माध्यम से राजनीतिक नेतृत्व और समाज वैश्विक घटनाओं की व्याख्या करते हैं. हस्तक्षेप, क्रांति और धार्मिक पहचान के अनुभवों में निहित ये कथाएं आज भी देश की राजनीतिक दिशा को प्रभावित करती हैं.

कोई ईरान के प्रतिरोध के विमर्श को संप्रभुता की वैध अभिव्यक्ति के रूप में देखें या भू-राजनीतिक तनाव का स्रोत माने, यह देश की राजनीतिक पहचान का एक केंद्रीय तत्व बना हुआ है. इस कथा के सामाजिक आधारों को समझना यह स्पष्ट करता है कि बाहरी शक्तियों के साथ टकराव ईरान की राजनीतिक कल्पना में इतना महत्वपूर्ण स्थान क्यों रखता है.

डिस्क्लेमर:अज़ीज़ुर रहमान आज़मी अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के वेस्ट एशिया एंड नार्थ अफ़्रीकन स्टडीज विभाग में पढ़ाते हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना ज़रूरी नहीं है.

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