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अपना सीएम बना कर भी त्रिवेणी संघ की राजनीति में फँसी भाजपा

डॉ राजन झा एवं संजीव कुमार
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    अप्रैल 14, 2026 22:33 pm IST
    • Published On अप्रैल 14, 2026 22:03 pm IST
    • Last Updated On अप्रैल 14, 2026 22:33 pm IST
अपना सीएम बना कर भी त्रिवेणी संघ की राजनीति में फँसी भाजपा

अंततः त्रिवेणी संघ सम्पूर्ण हुआ. 1930 के दशक में इसी बिहार में प्रारम्भ हुआ त्रिवेणी संघ कुर्मी-कुशवाहा और यादव को एक साथ एकजुट करके सवर्ण राजनीति के समानांतर पिछड़ों की एक आवाज खड़ा करने की राजनीति थी. पिछले 36 वर्षों के दौरान इस बिहार ने यादव, कुर्मी और अब कुशवाहा मुख्यमंत्री दे दिया है. बिहार के अति-पिछड़ों को और इंतजार करना पड़ेगा सत्ता के गलियारों में अपनी हनक स्थापित करने के लिए. पिछले 35 वर्षों के दौरान बिहार की राजनीति में कम से कम आधा दर्जन राजनीतिक दल बने जिसके नेता त्रिवेणी संघ से थे: लालू यादव की राष्ट्रीय जनता दल, नीतीश कुमार की समता पार्टी, नीतीश कुमार और शरद यादव की जनता दल यूनाइटेड, उपेन्द्र कुशवाहा की लोक समता पार्टी, लोक मोर्चा पार्टी आदि. लेकिन पिछले 35 वर्षों के दौरान बिहार में पिछले वर्ष बनी इंडीयन इंक्लूसिव पार्टी को छोड़ दें तो एक भी अति-पिछड़ों का राजनीतिक दल नहीं बना है. और वो इंडियन इंक्लूसिव पार्टी के नेता आईपी गुप्ता खुद को अति-पिछड़ा नहीं बल्कि अपने पान समाज को दलित की सूची में स्थापित करने के नाम पर राजनीति शुरू किए हैं. यही कहानी मुकेश सहनी और उनके VIP का है. 

बिहार में लव-कुश की राजनीति

अति-पिछड़ों की राजनीति में इसी रिक्त स्थान को भाजपा भरना चाहती थी, बिहार को एक अति-पिछड़ा मुख्यमंत्री देकर लेकिन नीतीश कुमार और JDU ने इसकी किसी भी सम्भावना से इंकार कर दिया जबकि भाजपा बिना त्रिवेणी संघ के सहयोग के, बिना कुर्मी-कुशवाहा के सहयोग के सिर्फ अति-पिछड़ा आधारित राजनीति करने की हिम्मत नहीं जुटा पायी. कहने वाले तो दावा कर रहे हैं कि यह नीतीश कुमार की हार है, ये JDU की हार है, ये उस राजनीति की हार है जिसका जन्म 1994 की कुर्मी चेतना रैली से शुरू हुई थी लेकिन JDU इस हार में भी उसे बिहार का मुख्यमंत्री बना रहा है जिसके पिता शकुनी चौधरी नीतीश कुमार के समता पार्टी के संस्थापक सदस्य थे. 

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1995 के चुनाव के दौरान हुए एक अपराध में जब शकुनी चौधरी के साथ उनके पुत्र सम्राट चौधरी (राकेश कुमार) का नाम आया उसके बाद शकुनी चौधरी और सम्राट चौधरी समता पार्टी छोड़कर वर्ष 1999 में RJD में चले गए थे. शकुनी चौधरी ने जीवन में कभी भाजपा या संघ की राजनीति नहीं किया था. 1895 में पहली बार वो निर्दलीय विधायक बने उसके बाद 1990 में कांग्रेस के टिकट पर और फिर 1995 में समता पार्टी के टिकट पर. 2010 में शकुनी चौधरी और पुत्र सम्राट चौधरी फिर से वापस नीतीश कुमार के साथ JDU में आ गए. उसके बाद 2014 में जब जीतन राम मांझी जी ने अपनी अलग पार्टी बनाई तो पिता पुत्र दोनों HAM के संस्थापक सदस्य बने लेकिन 2015 में सम्राट चौधरी भाजपा में चले गए और उसके बाद आज तक भाजपा में ही हैं. 

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भाजपा में रहते हुए सम्राट चौधरी ने प्रदेश अध्यक्ष से लेकर अब मुख्यमंत्री तक का रास्ता तय किया है. लेकिन सवाल उठता है कि जिस सम्राट चौधरी के परिवार ने निर्दलीय से राजनीति शुरू कर कांग्रेस, RJD, समता पार्टी, JDU, HAM होते हुए भाजपा तक का सफर तय किया, उस परिवार पर भाजपा कितना भरोसा कर सकता है? क्या भाजपा सम्राट चौधरी के ऊपर भरोसा कर सकती है कि सम्राट चौधरी लव-कुश की उस विरासत को छोड़कर भाजपा के साथ, भाजपा-संघ वाली राजनीति करेंगे जिसकी नींव नीतीश कुमार के साथ उनके पिता शकुनी चौधरी ने 1994 में रखी थी? ये वही लव-कुश की राजनीति है जिसने नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाया और आज ये वही लव-कुश की राजनीति है जो आज सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बना रहा है. 

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राजनीतिक गलियारों में तो यह भी हल्ला है कि निशांत कुमार को राजनीति में लॉन्च करने में सम्राट चौधरी ने अहम भूमिका निभाई है. लव-कुश की मजबूती होती इस राजनीति से न सिर्फ भाजपा परेशान है बल्कि RJD भी उतना ही परेशान है क्योंकि RJD को सत्ता से बेदखल करने में इस लव-कुश की राजनीति ने अहम भूमिका निभाई थी. खबर तो यह भी आ रही है कि सम्राट चौधरी के साथ JDU के दो उप-मुख्यमंत्री एक भूमिहार विजय कुमार चौधरी और दूसरे यादव समाज से बिजेंद्र यादव हो सकते हैं. 1990 की राजनीति में लव-कुश की राजनीति में कोई बड़ा यादव नाम नहीं था लेकिन अगर 2026 में बिजेंद्र यादव का ये प्रयोग सफल होता है तो न सिर्फ लव-कुश की राजनीति मजबूत होती बल्कि त्रिवेणी संघ की राजनीति लव-कुश की राजनीति के पक्ष में अधिक झुक जाएगा. 

त्रिवेणी संघ और भाजपा

बिजेंद्र यादव का JDU के भीतर महत्वपूर्ण स्थान देना भविष्य में RJD और JDU के मिलन के दरवाजे को भी खोलकर रखता है. त्रिवेणी संघ की एकजुटता का ये दरवाजा सबसे अधिक खतरनाक हो सकता है भाजपा के लिए जो लव-कुश की राजनीति को तोड़कर और अति-पिछड़ा को लव-कुश की राजनीति से अलग करके बिहार की राजनीति में अपनी जड़ें जमाना चाहता था और सम्भवतः इसी सहारे JDU को नियंत्रित करना चाहता था. 

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लेकिन इस उभरती राजनीति का भाजपा के पास कोई विकल्प भी नहीं है क्योंकि भाजपा ने नीतीश कुमार का कभी कोई विकल्प तैयार करने का प्रयास भी नहीं किया. भाजपा कल भी नीतीश कुमार की बैसाखी पर थी और आज भी नीतीश कुमार की बैसाखी पर है और जैसे जैसे निशांत कुमार व सम्राट चौधरी की लव-कुश की राजनीति मजबूत होगी वैसे वैसे आने वाली राजनीति में भी भाजपा बिहार में बिना बैसाखी के चल नहीं पाएगी. 

जब तक नीतीश कुमार की राजनीति से अति-पिछड़ों और दलितों का एक छोटा सा अंश भाजपा ने छिनने का सफल प्रयास किया तब तक नीतीश कुमार ने प्रदेश की महिलाओं को एक स्वतंत्र वोट बैंक तैयार कर दिया जो उनके प्रति ईमानदार है, एहसानमंद है, भरोसेमंद है, एकत्रित है और एकजुट है. इस महिला वोट बैंक का भाजपा के पास कोई विकल्प नहीं है इसलिए भाजपा के पास सत्ता से बाहर हो चुके नीतीश कुमार का भी कोई विकल्प नहीं है. तभी तो मुख्यमंत्री बन रहा है भाजपा का लेकिन भाजपा बार बार घोषणा कर रही है कि बिहार में चाहे कोई भी मुख्यमंत्री हो बिहार की सरकार चलेगी नीतीश मॉडल से है.

(डिस्क्लेमर: राजन झा बिहार के दरभंगा के एचपीएस कॉलेज, मधेपुर में राजनीति विज्ञान पढ़ाते हैं. संजीव कुमार स्वतंत्र पत्रकार और'जातिगत जनगणना : सब है राज़ी,फिर क्यूं बयानबाज़ी'नाम की किताब के लेखक हैं. इस लेख में व्यक्त विचार लेखकों के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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