अमेरिका और इजरायल ने 28 फरवरी 2026 को ईरान पर हमला किया. इस हमले ने एक ऐसा संघर्ष शुरू किया, जिसने होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद कर दिया. इसने कच्चे तेल की कीमत को 119 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचा दिया, भारतीय शेयर बाजार में सालों की सबसे बड़ी साप्ताहिक गिरावट दर्ज कराई और रुपये को ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुंचा दिया. भारत इस युद्ध में कोई पक्ष नहीं है. इस युद्ध में शामिल किसी भी पक्ष के साथ भारत का कोई सैन्य गठबंधन नहीं है. भारत की इस संघर्ष के राजनीतिक परिणाम में भी कोई हिस्सेदारी नहीं है. भारत के पास यह तय करने का भी अधिकार नहीं है कि लड़ाई कब और कैसे खत्म होगी. इसके बाद भी इस लड़ाई के आर्थिक प्रभाव इतनी तेजी से सामने आ रहे हैं कि भारत के हर गंभीर नीति-निर्माता को चिंतित होना चाहिए. सात मार्च को सरकार ने घरेलू एलपीजी सिलेंडर की कीमत में 60 रुपये का इजाफा कर दिया. इस सरकारी अधिसूचना का संदेश बहुत साफ था- जिस युद्ध की शुरुआत भारत ने नहीं की, उसका बिल अब उसे चुकाना पड़ रहा है.
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा एलपीजी आयातक है. वह सालाना 31.3 मिलियन मीट्रिक टन एलपीजी का उपभोग करता है, जबकि घरेलू उत्पादन इसका मात्र 41 फीसदी ही है, बाकी का 59 फीसद आयात किया जाता है. इसमें से 90 फीसदी की आपूर्ति होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर आती है. ईरान और ओमान के बीच स्थित इस 33 किलोमीटर चौड़े समुद्री रास्ते को तेहरान ने बंद कर दिया है. हालांकि एलपीजी संकट तो केवल एक बड़े आर्थिक संकट की शुरुआत भर है.
तेल की कीमतें बढ़ने का अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ेगा
वित्त वर्ष 2025 में भारत ने कच्चे तेल के आयात पर 137 अरब डॉलर खर्च किए. युद्ध से पहले ब्रेंट क्रूड की औसत कीमत करीब 66 डॉलर प्रति बैरल थी. नौ मार्च को यह बढ़कर 119 डॉलर तक पहुंच गई. बाद में यह करीब 103 डॉलर के आसपास स्थिर हुई. आईसीआरए के अर्थशास्त्रियों के मुताबिक कच्चे तेल की औसत कीमत में हर 10 डॉलर की बढ़ोतरी भारत के वार्षिक आयात बिल में 14-16 अरब डॉलर जोड़ देती है. यदि तेल की कीमत वित्त वर्ष 2027 तक 110-115 डॉलर प्रति बैरल के बीच बनी रहती है, तो तेल व्यापार घाटा 220 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है और चालू खाता घाटा जीडीपी के 3.1 फीसदी से ऊपर जा सकता है. यह गंभीर बाहरी असंतुलन का संकेत है.यह एक साथ मौद्रिक नीति, राजकोषीय खर्च और विनिमय दर प्रबंधन पर कठिन फैसले थोपता है.

इस युद्ध से होने वाला नुकसान केवल कच्चे तेल तक सीमित नहीं है. ईंधन की बढ़ी हुई कीमतें तुरंत परिवहन लागत को बढ़ाती हैं. इससे पूरे देश में खाद्य पदार्थों, सीमेंट, दवाइयों और विनिर्मित वस्तुओं की कीमतें बढ़ जाती हैं. आईसीआरए का अनुमान है कि कच्चे तेल की कीमत में हर 10 डॉलर प्रति बैरल की वृद्धि WPI मुद्रास्फीति को 80 से 100 बेसिस पॉइंट और CPI को 40 से 60 बेसिस पॉइंट तक बढ़ा देती है. जनवरी 2026 में CPI मात्र 2.75 फीसद था, जो एक दुर्लभ स्थिरता का संकेत था. लेकिन अब यह स्थिति गंभीर खतरे में है.
रुपया, बाजार और 1991 का सबक
इस दबाव का असर मुद्रा बाजार पर भी तेजी से पड़ा है. युद्ध शुरू होने के बाद रुपया डॉलर के मुकाबले गिरकर 93.32 के ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुंच गया. इसका तंत्र स्पष्ट है: तेल महंगा होने से आयात के लिए डॉलर की मांग बढ़ती है, इससे रुपया कमजोर होता है, और कमजोर रुपया तेल को और महंगा बना देता है. इस तरह आयात बिल और बढ़ता जाता है. भारतीय रिजर्व बैंक ने विनिमय दर को स्थिर करने के लिए अपने 716 अरब डॉलर के विदेशी मुद्रा भंडार से डॉलर बेचकर हस्तक्षेप किया है. यह भंडार भारत की सबसे बड़ी सुरक्षा है और 1991 के संकट से बड़ा अंतर भी. उस समय कुवैत पर इराक के आक्रमण के बाद तेल की कीमतें बढ़ीं, रेमिटेंस मनी कम हुआ और विदेशी मुद्रा का संकट पैदा हो गया, इससे भारत के पास केवल दो हफ्ते का आयात कवर बचा था. भारत की दो सरकारों को मिलकर 67 टन सोना गिरवी रखना पड़ा था. आज भारत कहीं अधिक मजबूत है, लेकिन दबाव की दिशा वही है और भंडार तेजी से उपयोग में लाए जा रहे हैं.
पूंजी बाजार भी यही संकेत दे रहे हैं. मार्च के पहले आठ सत्रों में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की निकासी 45 हजार करोड़ रुपये से अधिक रही, यह जनवरी 2025 के बाद सबसे खराब मासिक स्थिति है. निफ्टी 50 में 6-7 फीसद की गिरावट आई है और बीएसई का कुल बाजार पूंजीकरण करीब 10 लाख करोड़ रुपये घट गया है. यह घबराहट नहीं, बल्कि वैश्विक निवेशकों द्वारा जोखिम का तार्किक पुनर्मूल्यांकन है.
खाड़ी में 90 लाख भारतीय और 50 अरब डॉलर
भारत की निर्भरता केवल ऊर्जा और वित्तीय बाजारों तक सीमित नहीं है. करीब 91 लाख भारतीय छह खाड़ी देशों- यूएई, सऊदी अरब, कतर, कुवैत, ओमान और बहरीन में काम करते हैं. ये भारतीय हर साल करीब 50 अरब डॉलर भारत भेजते हैं. यह रकम केवल आंकड़े भर नहीं हैं, यह केरल में स्कूल फीस भरती है, उत्तर प्रदेश में घर बनवाती है, तमिलनाडु में कर्ज चुकाती है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सहारा देती है.
अगर खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्थाएं कमजोर होती हैं, तो वहां से रेमिटेंस मनी के रूप में आने वाला डॉलर कम हो सकता है. विशेषज्ञों के मुताबिक यदि 10-15 अरब डॉलर की भी कमी आती है, तो इसका सीधा असर ग्रामीण और अर्ध-शहरी भारत की खपत पर पड़ेगा.
क्या खाड़ी के देशों से घट जाएगा व्यापार
वित्त वर्ष 2025 में भारत और खाड़ी के देशों के बीच व्यापार 178.56 अरब डॉलर का रहा. इसमें रत्न और आभूषण क्षेत्र सबसे अधिक संवेदनशील है, जो कि भारत के कुल निर्यात का 10-12 फीसद है. यह क्षेत्र 50 लाख से अधिक लोगों को रोजगार देता है. यूएई अकेले 7.75 अरब डॉलर का आयात करता है. यदि दुबई को होने वाला निर्यात प्रभावित होता है या खाड़ी देशों में मांग घटती है, तो इसका सीधा असर सूरत और जयपुर के कारीगरों पर पड़ेगा.
रसायन और पेट्रोकेमिकल क्षेत्र में भी दोहरी मार पड़ सकती है, निर्यात घटेगा और आयात महंगा होगा. उर्वरक क्षेत्र और भी संवेदनशील है. यदि खरीफ सीजन से पहले आपूर्ति बाधित होती है, तो खाद्य मुद्रास्फीति बढ़ सकती है.
सरकार के सामने चुनौती क्या है
भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें सिद्धांततः बाजार आधारित हैं, लेकिन व्यवहार में राजनीतिक दबाव बना रहता है. साल 2022 में भी सरकारी तेल कंपनियों ने चुनाव के दौरान कीमतें स्थिर रखीं और नुकसान उठाया. अब फिर वही स्थिति बन रही है. यदि कंपनियां लागत उपभोक्ताओं पर नहीं डालतीं, तो उनका वित्तीय स्वास्थ्य बिगड़ता है और अंततः सरकार को हस्तक्षेप करना पड़ता है.भारतीय रिजर्व बैंक भी दुविधा में है, ब्याज दरें घटाकर विकास को बढ़ावा दे या मुद्रास्फीति को नियंत्रित करे. दोनों रास्तों में जोखिम है.
इस युद्ध ने जिन कमजोरियों को उजागर किया है, वे नई नहीं हैं, लेकिन अब उन्हें टालना महंगा पड़ रहा है. रसोई गैस की कीमत में 60 रुपये की बढ़ोतरी इस संकट की शुरुआत भर है. 1991 का संकट अंततः आर्थिक सुधारों का कारण बना था. अब सवाल यह है कि क्या भारत समय रहते सबक लेगा या अगले बड़े संकट का इंतजार करेगा. फिलहाल, यह निर्णय भारत के हाथ में है.
(डिस्क्लेमर: लेखक अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के पश्चिम एशिया और उत्तर अफ्रीका अध्ययन विभाग में पढ़ाते हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)