भारत का जनतंत्र अपने नागरिकों को निराश नहीं करता है. जैसे ही उसके कर्णधारों को लगता है कि देश और जनतंत्र में संबंध कमजोर हो रहा है, कुछ ऐसा है जो उसे कमजोर कर रहा है, वैसे ही जनता उसे पुनर्जीवित कर देती है. पिछले 50 men यानी 1975 के आपातकाल के बाद के भारत का इतिहास तो यही बताता है कि जनता, जनतंत्र और सरकार आपस में एक सहमति से चलते रहते हैं. कभी उसकी गति सम पर रहती है तो कभी ढर्रे से उतरती दिखाई पड़ती है. और ज्यों ही चुनावों के माध्यम से चुनी हुई सरकारें बेलगाम होने लगती हैं तो जनता उसका प्रत्युत्तर देती है. जनता सरकार को ढर्रे पर ले आती है- कभी आंदोलनों के माध्यम से तो कभी चुनाव के माध्यम से. इस प्रक्रिया में, सरकारें अपने को सुधारती हैं अथवा ऐसा प्रकट करने का प्रयास करती हैं कि वे सुधर गई हैं.
भारत के लोकतंत्र को कौन मजबूत करता है
वास्तव में भारत के संविधान की प्रस्तावना में जिसे 'हम भारत के लोग' कहा गया है, वही भारत के लोग सरकारों को जनतांत्रिक बनाए रखते हैं. चुनी हुई सरकारों की लगाम का एक हिस्सा जनता के हाथ में भी होना चाहिए- कम से कम भारत की आज़ादी की लड़ाई और उसकी लिखित विरासत के रूप में भारत का संविधान तो यही कहता है. और, भारत की जनता कोई समरूप समूह नहीं है बल्कि आप उसे मजदूर, किसान, स्त्री, विद्यार्थी, अल्पसंख्यक (या बहुसंख्यक) कुछ भी कह सकते हैं. पिछले 14-15 बरसों में जो भी आंदोलन हुए हैं, उसमें यह सभी समूह शामिल रहे हैं. उन्होंने सरकारों को घुटने टेकने अथवा अपना हठी रवैया छोड़ने पर मजबूर किया है. यह भारतीय जनतंत्र की ताकत और खासियत है. जिस दिन यह ताकत या खासियत खत्म हो जाएगी, उस दिन भारत का लोकतंत्र जड़ होकर किसी पुरातन तानाशाही में बदल जाएगा जिसके हाथ में तकनीक और पूंजी का बेतहाशा समर्थन होगा.
यह भी बात याद रखने लायक है कि भारत सहित दुनिया के हर हिस्से में, सभी जगह जनता सदैव सफल नहीं हो जाया करती है बल्कि बहुत सारी जगहों पर सरकार अपने आपको दुरुस्त दिखाने के लिए, मजबूत दिखाने के लिए पीछे हटने से मना कर देती है. यह काम जन आंदोलन भी करते हैं. लहरों के रूप में आगे बढ़ते हैं, थोड़ा ठिठक जाते हैं और फिर आगे बढ़ते हैं. इस रणनीति को गांधीवादी आंदोलनों में देखा जा सकता है. इस प्रकार एक सरकार और जनता के बीच एक, जनतांत्रिक समझौते के भीतर, रस्साकशी चलती रहती है.
जंतर-मंतर और रांझी में छात्रों का आंदोलन क्या दिखाता है
इस रस्साकशी को दिल्ली और झारखंड में हुए विद्यार्थियों और नौजवानों के विरोध प्रदर्शनों में देखा जा सकता है. ये प्रदर्शन धीरे-धीरे आंदोलनों में बदल जाएंगे. इन्हें भारत के युवा नागरिकों के द्वारा अंजाम दिया गया है. यह वे युवा नागरिक हैं जिन्होंने भारत को नवउदारवाद और सूचना क्रांति के आगोश में देखा और पाया है. उनके लिए वैश्वीकृत दुनिया नए ढंग के कपड़े, भाषा और अवसर लेकर आई है. लेकिन उसने यह भी देखा है कि उसके लिए अवसर एक लोककल्याणकारी राज्य में ज्यादा बेहतर हैं और वहां पर वे ज्यादा महफूज़ हैं. पूंजीवादी निजी व्यवस्था किसी युवा प्रतिभा को एक समय मुंह मांगा पैसा दे सकती है तो दूसरे ही दिन उसे तीस दिन की नोटिस पर बाहर का रास्ता दिखा सकती है. सरकारी नौकरी उन्हें एक बेहतर जिंदगी और प्रतिष्ठा दे सकती है. उसका पूरा ढांचा इसी जनतंत्र के भीतर सुरक्षित है. यहां मैं एक बात और रेखांकित करना चाहूंगा कि भारत के लोकतंत्र को सरकारी नौकरियां कहीं बेहतर तरीके से सुरक्षित रखती हैं और उसे एक लोक कल्याणकारी राज्य के रूप में बने रखने में मदद पहुंचाती हैं. शिक्षा, स्वास्थ्य और आवश्यक जन सुविधाएं जब निजी क्षेत्र में जाती हैं तो राज्य का लोक कल्याणकारी रूप सिकुड़ जाता है. वह गरीबों, अशक्तों और पीछे छूट गए लोगों को बाहर कर देता है. वे केवल वोट देने वाले मतदाता बनकर रह जाते हैं. लेकिन जब राज्य उनकी मदद करता है तो भारत जैसे आर्थिक रूप से असमान देश में, वे लोकतंत्र को आर्थिक न्याय के साधन के रूप में देखते हैं.
यही कारण है कि तेजी से सिकुड़ रहे सरकारी क्षेत्र में लोग न केवल जाना चाहते हैं बल्कि उसके विस्तार की भी मांग कर रहे हैं. सरकारी नौकरी को केवल वेतन के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए बल्कि राज्य की भूमिका के विस्तार के रूप में भी देखा जाना चाहिए. इसलिए आज के युवा बहुत कम उम्र से ही सरकारी नौकरियों की तलाश में रहते हैं. वे न केवल सरकारी नौकरी चाहते हैं बल्कि वे चाहते हैं कि देश के निर्माण में उनकी भूमिका हो.
सबको साथ लेकर चलने वाला लोकतंत्र
निजी क्षेत्र उनसे यह भूमिका छीन लेता है और उन्हें अपने मुनाफ़े की मशीन का एक पुर्जा बना देता है. इसलिए आजकल के युवा सरकारी नौकरी देने वाली उच्च शिक्षा, रोजगार की गारंटी और एक जनतांत्रिक तथा पारदर्शी प्रतियोगी वातावरण की मांग कर रहे हैं. पहली नज़र में दोनों जगहों के प्रदर्शनों में युवाओं का गुस्सा साफ झलकता है, जो सरकारी नौकरियों और निष्पक्ष परीक्षा प्रणाली की मांग को लेकर सड़कों पर उतरे लेकिन इसी के साथ यह बात भी उतनी ही सच है कि उन्हें आशा थी कि उनकी बात सुनी जाएगी. उन्होंने अपनी बात सुनाने के लिए तरह-तरह के ढंग निकाले.
इसको मैं एक अनुभवमूलक तरीके से कहना चाहूंगा. मैं कानपुर के एक कॉलेज में इतिहास का पढ़ाता हूं- सहायक प्राध्यापक के रूप में. वहां मुझे पढ़ाने के साथ कई अन्य काम करने होते हैं जो मेरी जॉब-प्रोफाइल का हिस्सा हैं. तो जब नीट की परीक्षा पहली बार हो रही थी तो मैंने उन युवाओं को देखा जो डॉक्टर बनाने वाली परीक्षा देने आए थे. उनकी उम्र 18 से 24 साल के आसपास रही होगी. यह सब विवरण उनके प्रवेश पत्रों पर अंकित थे. वे सभी उत्साहित थे. जिस कक्ष में इनविजलेटर के रूप में मेरी ड्यूटी लगी थी, उसमें एक दिव्यांग परीक्षार्थी भी था. जब सबकी आंशर शीट जमा हो गई तो उस परीक्षार्थी को अतिरिक्त समय दिया गया. यह बात परीक्षा के नियमों में स्पष्ट रूप से इंगित की गई थी कि किसी भी दिव्यांग परीक्षार्थी को अतिरिक्त समय दिया जाएगा. यह एक किस्म का सकारात्मक भेदभाव है और दिव्यांग जनों में विश्वास बहाली का काम करता है कि उन्हें अकेला नहीं छोड़ दिया गया है. एक नरम निगाह वाले जनतंत्र से यही उम्मीद भी की जाती है कि वह सबको साथ लेकर चले. इसी प्रकार देश में कमजोर वर्गों और ऐतिहासिक रूप से पिछड़ गए समूहों के लिए आरक्षण की व्यवस्था भारत के संविधान में की गई है.
जब नीट की परीक्षा का पेपर लीक हुआ तो मुझे उस विद्यार्थी की याद आई, जिसे विशेष सुविधा दी गई थी. यह उस विद्यार्थी या उसके जैसे बहुत विद्यार्थियों के लिए किसी सदमे से कम बात नहीं थी. इसी बीच नीट की परीक्षा दुबारा होने के बावजूद, भारत के सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की एक टिप्पणी ने युवाओं को व्यग्र कर दिया और वे सभी कॉकरोच जनता पार्टी के नेतृत्व में दिल्ली में इकट्ठा हुए. इसमें सिविल सोसाइटी और विभिन्न राजनीतिक दलों के लोग भी जुटे और उन्होंने देश के केंद्रीय शिक्षा मंत्री का इस्तीफा ले लिया. इसे विपक्ष ने न केवल छात्रों की बल्कि अपनी भी जीत बनाकर पेश किया. इसी प्रकार जुलाई 2026 के अंत में रांची में जेपीएससी-जेएसएससी परीक्षाओं की धांधली के खिलाफ छात्र आंदोलन चला. इसकी निम्नलिखित मांगें थीं- परीक्षाएं रद्द हों, सीबीआई जांच हो और भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता हो. रांची में विधानसभा मार्च में पुलिस कार्रवाई भी हुई.
पक्ष और विपक्ष की बदलती भूमिकाएं
यह दोनों घटनाएं अलग-अलग तरीके से व्याख्यायित की जा सकती हैं. एक तो विद्यार्थी आंदोलन के उभार के रूप में, जैसा 1974-75 में हुआ था और दूसरे विपक्षी दलों की ताकत के रूप में. ध्यातव्य है कि केंद्र सरकार में कांग्रेस विपक्ष में हैं जबकि झारखंड में मिली-जुली सरकार में वह प्रदेश सरकार में शामिल है. एक जगह वह सरकार से सवाल कर रही है तो दूसरी जगह खुद विपक्ष की तरफ़ से आने वाले सवालों का जवाब दे रही है. इस परिघटना को चुनावी गुणा-गणित से आगे जाकर देखें तो यह जनतंत्र ही है जो बीजेपी को उतनी ही ताकत देता है जितनी ताकत कांग्रेस को. कांग्रेस अथवा बीजेपी यह नहीं कह सकती कि उसे अपनी बात कहने या विरोध करने का मौका नहीं मिला. हां, एक व्यक्तिगत नागरिक के तौर पर कोई इस बात को स्पष्ट और तेज आवाज़ में कह सकता/सकती है कि उसे इस जनतंत्र की भीतर अपनी आवाज़ सुनाने का मौका नहीं मिल रहा है. लेकिन वही व्यक्तिगत आवाज़ जब किसी समूह में आकर मिल जाती है तो उसे अपनी आवाज़ के अनसुनी रह जाने का खतरा नहीं रहता है. दिल्ली के जंतर-मंतर पर ऐसे बहुत से लोग देखे गए जिनका नीट परीक्षा से सीधा लेना-देना नहीं था. लेकिन यह बात उतनी सरल भी नहीं है. उनका इस देश, देश की जनता और जनतंत्र से तो लेना-देना था. यही बात उनके वहां होने या किसी अन्य जगह होने के औचित्य को प्रतिपादित करती है.
आज जब हम देश का स्वतंत्रता दिवस मना रहे हैं तो हम इस बात पर खुश हो सकते हैं कि देश की जनता, उसके विभिन्न वर्ग हमेशा स्वतंत्रता के अर्थ का विस्तार करते रहते हैं. यह एक जीवंत जनतंत्र की निशानी है.
(डिस्क्लेमर: लेखक कानपुर के क्राइस्ट चर्च कॉलेज में इतिहास पढ़ाते हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)