जवाहरलाल नेहरू और मोहम्मद अली जिन्ना. दोनों एक ही दौर के बैरिस्टर, एक ही तरह के अंग्रेजीदां तौर-तरीकों में ढले, लेकिन मिजाज और विचार एक दूसरे से बिल्कुल अलग. नेहरू और जिन्ना दोनों बैरिस्टर थे, दोनों ने इंग्लैंड में पढ़ाई की थी और दोनों शुरुआत में धर्मनिरपेक्ष राजनीति के पैरोकार थे. इसके बावजूद दोनों की शख्सियत में जमीन-आसमान का फर्क था.
इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने अपनी किताब 'इंडिया आफ्टर गांधी' में लिखा है नेहरू भावुक, विचारशील और भीड़ से जुड़ने वाले नेता थे. रैलियों में लोगों के बीच पहुंचना, बच्चों से बात करना, घंटों दर्शन पर बोलना उनकी फितरत में था. जिन्ना इसके ठीक उलट थे. सख़्त, अनुशासित, अपनी निजी जिंदगी में बेहद रिज़र्व. वो कभी किसी भीड़ से जज्बाती तौर पर नहीं जुड़े, राजनीति भी एक वकील की तरह की.
स्टैनली वॉलपर्ट अपनी किताब 'जिन्ना ऑफ पाकिस्तान' में लिखते हैं कि शुरुआती दिनों में जिन्ना हिंदू-मुस्लिम एकता के सबसे बड़े पैरोकारों में से एक थे, लेकिन 1930 के दशक के बाद उनके मिजाज में बदलाव आ गया.

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जिन्ना नेहरू के बारे में क्या सोचते थे?
जिन्ना, नेहरू की बौद्धिक क्षमता को ज़्यादा तवज्जो नहीं देते थे. वो उन्हें एक ऐसा आदर्शवादी मानते थे जो जमीनी हकीकत से दूर हवा में बातें करता है.
जिन्ना ने एक बार कहा था, "नेहरू एक ऐसे नेता हैं जो कुछ सीखते नहीं हैं और कुछ भी भूलते नहीं हैं."
नेहरू का जवाब उतना ही तीखा था. अपनी आत्मकथा में उन्होंने लिखा, "जिन्ना की राजनीति का कोई आर्थिक या सामाजिक आधार नहीं है. वो सिर्फ भय और संकीर्णता के दम पर राजनीति कर रहे हैं."
नेहरू को लगता था कि जिन्ना हर समझौता सिर्फ़ इसलिए ठुकराते हैं ताकि अपनी बात मनवा सकें.
कब बढ़ गईं दूरियां?
दोनों के बीच दूरियां रातों-रात नहीं बढ़ीं. 1937 के प्रांतीय चुनावों के बाद संयुक्त प्रांत में मुस्लिम लीग चाहती थी कि कांग्रेस उसके साथ मिलकर सरकार बनाए. कांग्रेस को भारी बहुमत मिला था और नेहरू ने शर्त रख दी कि लीग के सदस्य पहले कांग्रेस में शामिल हों.
इतिहासकार आयशा जलाल अपनी किताब 'द सोल स्पोक्समैन: जिन्ना, द मुस्लिम लीग एंड द डिमांड फॉर पाकिस्तान' में लिखती हैं कि यह घटना जिन्ना के दिल में चुभ गई थी. उन्हें लगा कि कांग्रेस मुसलमानों को कभी बराबरी का हक नहीं देगी. यहीं से जिन्ना ने द्वि-राष्ट्र सिद्धांत को अपनी राजनीति का मुख्य हथियार बना लिया.

इतिहासकार आयशा जलाल की किताब 'द सोल स्पोक्समैन: जिन्ना, द मुस्लिम लीग एंड द डिमांड फॉर पाकिस्तान'
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आखिरी बार कब मिले नेहरू और जिन्ना?
2 जून 1947 की सुबह 10 बजे वायसराय हाउस के अपने स्टडी रूम में लॉर्ड माउंटबेटन ने सात भारतीय नेताओं को बुलाया. कांग्रेस की तरफ से नेहरू, पटेल और कृपलानी थे. वहीं मुस्लिम लीग की तरफ से जिन्ना, लियाकत अली खान और सरदार अब्दुर रब निश्तर और सिखों की तरफ से बलदेव सिंह थे.
स्टैनली वॉलपर्ट अपनी किताब 'जिन्ना ऑफ पाकिस्तान' में लिखते हैं कि यही वो आखिरी मौका था जब नेहरू और जिन्ना उपमहाद्वीप की तकदीर तय करने के लिए एक ही कमरे में बैठे.

2 जून 1947 को वायसराय हाउस में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के नेता.
माउंटबेटन ने उस दिन बंटवारे की योजना दोनों पक्षों के सामने रखी. नेहरू ने भारी मन से बंटवारे की अनिवार्यता स्वीकार कर ली, जबकि जिन्ना ने चुपचाप सिर हिलाकर सहमति जताई. इस आख़िरी मुलाकात के कुछ ही घंटों बाद जिन्ना कराची रवाना हो गए.
हालांकि कुछ अन्य विवरणों में इसका जिक्र मिलता है कि नेहरू और जिन्ना की आखिरी बार मुलाकात 29 अगस्त 1947 को लाहौर में हुई थी. दोनों नेताओं ने शरणार्थी संकट पर बात करने के लिए बैठक की थी.
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