मार्च के पहले सप्ताह में दुनिया एक गहरी चिंता के माहौल में थी. अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच जारी युद्ध ने तीसरे विश्व युद्ध की आशंकाओं को जन्म दे दिया था. इजरायल, खाड़ी देशों और अन्य वैश्विक शक्तियों की संभावित भागीदारी ने इस संकट को और भी गंभीर बना दिया था.ऐसा लग रहा था कि यह टकराव किसी भी समय एक व्यापक वैश्विक युद्ध का रूप ले सकता है. भारत जैसे देशों के लिए यह स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक थी. एक बड़े ऊर्जा आयातक और मध्य-पूर्व में व्यापक रणनीतिक और प्रवासी हितों वाले देश के रूप में भारत पर इसके सीधे प्रभाव पड़ सकते थे. लेकिन कुछ ही हफ्तों में यह परिदृश्य बदलने लगा. अब चिंता विश्व युद्ध की नहीं, बल्कि एक लंबे, जटिल और अंतहीन संघर्ष की है, एक ऐसा युद्ध जिसका कोई स्पष्ट अंत नजर नहीं आता.
स्थिति में निर्णायक मोड़ तब आया जब अमेरिका ने परोक्ष समर्थन से आगे बढ़कर सीधे सैन्य हस्तक्षेप शुरू किया. हवाई हमले, सैनिक तैनाती और सैन्य अभियानों के विस्तार ने इस संघर्ष को एक नए रूप में बदल दिया. अब यह संघर्ष स्पष्ट रूप से अमेरिका और ईरान के बीच प्रत्यक्ष टकराव बन गया है. जहां पहले अनिश्चितता के कारण विश्व युद्ध की आशंका थी, वहीं अब स्पष्टता बढ़ी है. लेकिन इस स्पष्टता के साथ एक नई चिंता भी सामने आई है, यह युद्ध लंबा खिंच सकता है.
भारत के लिए यह स्थिति मिश्रित है. एक ओर वैश्विक युद्ध का खतरा कम हुआ है, वहीं दूसरी ओर लंबे संघर्ष की संभावना बढ़ गई है.
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युद्ध से वैश्विक बाजारों में हलचल
इस संघर्ष का एक महत्वपूर्ण क्षण तब आया जब पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को 48 घंटे का अल्टीमेटम दिया. यह चेतावनी विशेष रूप से होमुर्ज जलडमरूमध्य से संबंधित थी, जो वैश्विक तेल आपूर्ति का एक प्रमुख मार्ग है. इस अल्टीमेटम ने वैश्विक बाजारों में हड़कंप मचा दिया. तेल की कीमतों में तेजी आई और आपूर्ति बाधित होने की आशंका बढ़ गई.भारत के लिए यह सीधा आर्थिक संकेत था. भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है. होमुर्ज जलडमरूमध्य से होकर गुजरने वाली आपूर्ति में किसी भी प्रकार की बाधा का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ता है.हालांकि, कुछ ही दिनों में डोनाल्ड ट्रंप का रुख नरम पड़ा और उन्होंने बातचीत की संभावना जताई. इस अचानक बदलाव ने अमेरिकी रणनीति की स्पष्टता पर सवाल खड़े कर दिए.
बातचीत की चर्चा, लेकिन भरोसे की कमी
हालांकि बातचीत की खबरें सामने आईं, लेकिन ईरान ने सीधे वार्ता की संभावना को खारिज कर दिया. अमेरिका और ईरान के बीच भरोसे की भारी कमी के कारण कोई ठोस प्रगति नहीं हो पाई है.पर्दे के पीछे कुछ प्रस्तावों का आदान-प्रदान जरूर हो रहा है, लेकिन औपचारिक और प्रभावी वार्ता का अभाव बना हुआ है. इस बीच, जमीनी स्तर पर सैन्य गतिविधियां लगातार जारी हैं हवाई हमले, मिसाइल हमले और क्षेत्रीय तनाव. यह स्थिति दर्शाती है कि कूटनीति और वास्तविकता के बीच गहरी खाई बनी हुई है.
पाकिस्तान की मध्यस्थता
इस गतिरोध के बीच पाकिस्तान ने मध्यस्थ की भूमिका निभाने की कोशिश की है. इस्लामाबाद ने अमेरिका और ईरान के बीच संवाद स्थापित करने का प्रयास किया है. हालांकि, इन प्रयासों को अभी तक कोई ठोस सफलता नहीं मिली है. भारत के लिए पाकिस्तान की यह भूमिका रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है. यदि पाकिस्तान इस क्षेत्र में कूटनीतिक प्रभाव बढ़ाने में सफल होता है, तो इसका असर दक्षिण एशिया की शक्ति संतुलन पर पड़ सकता है. हालांकि, अभी तक उसकी सीमित सफलता यह भी दर्शाती है कि यह संघर्ष कितना जटिल और गहराई से जकड़ा हुआ है.
यह युद्ध अब एक 'वार ऑफ एंड्यूरेंस' यानी सहनशीलता की लड़ाई बन चुका है. जहां अमेरिका के पास सैन्य शक्ति है, वहीं ईरान असममित युद्ध, प्रॉक्सी नेटवर्क, मिसाइल और ड्रोन क्षमताओं के जरिए मुकाबला कर रहा है. इससे त्वरित जीत की संभावना लगभग खत्म हो जाती है.
विडंबना यह है कि अब सबसे बड़ा खतरा युद्ध का विस्तार नहीं, बल्कि उसका ठहराव है.एक लंबा खिंचने वाला युद्ध वैश्विक अर्थव्यवस्था को धीरे-धीरे प्रभावित करता है. होमुर्ज जलडमरूमध्य में किसी भी प्रकार की अस्थिरता का असर सीधे तेल की कीमतों पर पड़ता है. भारत में इसका असर महंगाई, परिवहन लागत और आम लोगों के दैनिक जीवन पर दिखाई देता है.लंबे समय तक चलने वाला संघर्ष धीरे-धीरे अन्य देशों को भी इसमें खींच सकता है.इससे स्थिति और जटिल हो सकती है. इस पूरे संकट का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इसका कोई स्पष्ट समाधान नजर नहीं आता. न तो सैन्य जीत संभव दिखती है और न ही कूटनीतिक समाधान निकट है. ऐसी स्थिति 'फॉरएवर वॉर' यानी अंतहीन युद्ध की ओर संकेत करती है, एक ऐसा संघर्ष जो इसलिए चलता रहता है क्योंकि उसे खत्म करना आसान नहीं होता.इस युद्ध को उसके आरंभ से ज्यादा उसकी अवधि के लिए याद किया जाएगा.और यही इसे सबसे खतरनाक बनाता है.
डिस्क्लेमर: लेखक काशी हिंदू विश्वविद्यालय के सामाजिक विज्ञान संकाय के राजनीति विज्ञान विभाग में पोस्ट डॉक्टोरल फेलो हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.