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तमिलनाडु: एक्टर विजय बिना किसी सहारे के कैसे अपने पैर पर खड़े हो गए, कितनी बड़ी हैं जेन जी की उम्मीदें

डॉ. नीरज कुमार
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    मई 04, 2026 23:20 pm IST
    • Published On मई 04, 2026 20:21 pm IST
    • Last Updated On मई 04, 2026 23:20 pm IST
तमिलनाडु: एक्टर विजय बिना किसी सहारे के कैसे अपने पैर पर खड़े हो गए, कितनी बड़ी हैं जेन जी की उम्मीदें

दक्षिण भारत के विधानसभा चुनाव के परिणाम में पहली बार जेन जी का प्रभाव देखने को मिला है. केरल के नतीजे पारंपरिक ही रहे क्योंकि वहां पांच साल के बाद सत्ता बदल जाती है. हालांकि पिछले बार लेफ्ट फ्रंट ने फिर से सत्ता हासिल की थी. लेकिन इस बार यूनाइटेड फ्रंट को सफलता मिली है. पुडुचेरी में एनडीए गठबंधन ने फिर से सत्ता पर अपना कब्जा बरकरार रखा. लेकिन, तमिलनाडु की राजनीति लंबे समय से फिल्मी सितारों और द्रविड़ पार्टियों के इर्द-गिर्द घूमती रही है. एमजी रामचंद्रन (एमजीआर), जयललिता और हाल के वर्षों में अन्य अभिनेताओं की सफलता इसका प्रमाण है. लेकिन थलपति विजय (जोसेफ विजय) की कहानी इन सबसे अलग और आधुनिक है. एक सुपरस्टार से पूर्णकालिक राजनेता बनकर उन्होंने महज दो साल में अपनी पार्टी तमिलगा वेट्री कड़गम (टीवीके) को तमिलनाडु की राजनीति का एक प्रमुख खिलाड़ी बना दिया. वोटों की गिनती में टीवीके के 105-110 सीटों पर आगे चलने की खबरें उनकी अपार लोकप्रियता और रणनीतिक सफलता को रेखांकित करती है.

तमिलनाडु की राजनीति का नया सुपरस्टार

इस प्रकार देखा जाए तो तमिलनाडु की सियासत में नया सुपरस्टार मिल गया है. आठ साल से सुपर हीरो की जो जगह खाली पड़ी थी, उसे थलापति विजय भरते हुए दिख रहे हैं. फिल्म स्टार से राज्य की सत्ता तक पहुंचीं जयललिता के  2016 में और 2018 में करुणनिधि के निधन के बाद से ये जगह खाली थी. पिछले 49 साल से राज्य  सियासत में चल रहा द्रविड़ राजनीति का दबदबा खत्म होता दिख रहा है. बीते 49 साल से सिनेमा के सुपरस्टार ही यहां राजनीति के भी 'नायक' हुआ करते थे. फिर चाहे बात एम करुणानिधि की हो या सुपरस्टार एमजी रामचंद्रन यानी एमजीआर और जे जयललिता की. इन सभी नामों के अलावा तमिलनाडु की राजनीति में और भी कई ऐसे नाम रहे हैं, जिन्होंने लंबे समय तक इस दक्षिण भारत के राज्य में मजबूत राजनीतिक मौजूदगी दर्ज की है.

एमके स्टालिन और उनके बेटे उदयनिधि स्टालिन भले ही तमिल सिनेमा से वास्ता रखते हैं, लेकिन उन्हें भी कॉलीवुड में पहले के अभिनेताओं जैसी लोकप्रियता नहीं मिली. हालांकि, विजय की बात करें तो उनमें वह सब खूबियां रही हैं, जो उन्हें तमिल सिनेमा का सुपरस्टार बनाती हैं. इसीलिए तमिलनाडु में उन्हें उनके पूरे नाम विजय जोसेफ की जगह 'थलापति' विजय के नाम से भी जाना जाता है. थलापति यानी 'दल का नेतृत्व' करने वाला सेनापति. तमिलनाडु चुनाव के शुरुआती रुझानों को देखा जाए तो सामने आता है कि टीवीके ने राज्य में एकतरफा तौर पर दोनों स्थापित द्रविड़ पार्टियों द्रविड़ मुनेत्र कझगम (द्रमुक) और अन्नाद्रमुक (एआईएडीएमके) के लिए कड़ी चुनौती पेश की है. आलम यह है कि विजय की सीटें इन दोनों पार्टियों से ही ज्यादा हैं. ऐसे में अगर विजय तमिल की राजनीति के अगले 'मास्टर' (विजय की एक फिल्म का शीर्षक) साबित हों तो इसमें कोई चौंकने वाली बात नहीं होनी चाहिए.

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सिनेमा से राजनीति तक का सफर

विजय की यात्रा 1992 में बाल कलाकार के रूप में शुरू हुई और 1990 के दशक के अंत से वे तमिल सिनेमा के सबसे बड़े सितारों में शुमार हो गए. घिल्ली, पोक्किरी, सर्कार, मास्टर, बीस्ट और GOAT ने जैसी फिल्मों ने उन्हें बॉक्स ऑफिस का बादशाह बना दिया. उनकी सफलता का राज केवल एक्शन और डांस नहीं, बल्कि आम आदमी के नायक के रूप में उनकी छवि थी.

वे 'बॉय नेक्स्ट डोर' हीरो थे, न कोई ग्रीक गॉड लुक, न ही पारंपरिक हीरोइज्म, बल्कि संघर्ष, न्याय और युवा आकांक्षाओं का प्रतीक. उनके फैन क्लब (Vijay Makkal Iyakkam) न केवल फिल्म रिलीज पर कटआउट, दूध अभिषेक और रैलियां आयोजित करते थे, बल्कि ब्लड डोनेशन, राहत कार्य और स्थानीय चुनावों में भागीदारी जैसे सामाजिक कार्य भी करते थे. यही फैन बेस बाद में उनकी राजनीतिक ताकत बना.

विजय ने 2024 में दो फरवरी को औपचारिक रूप से तमिलगा वेट्री कड़गम (टीवीके) की स्थापना की. उन्होंने फिल्मों से संन्यास लेने का ऐलान किया और पूर्णकालिक राजनीति में कूद पड़े. पार्टी का फोकस युवाओं,  भ्रष्टाचार-मुक्त शासन, नशा-मुक्त तमिलनाडु, युवाओं के लिए रोजगार, एजुकेशन लोन (बिना गारंटी) और महिलाओं के लिए कल्याणकारी योजनाओं पर था. उन्होंने कोई गठबंधन नहीं किया और 234 सीटों पर अकेले लड़ने का फैसला किया. उनका यह फैसला जोखिम भरा लेकिन आत्मविश्वास से भरा कदम था. उनके फैन क्लब पहले से ही ग्रासरूट नेटवर्क में बदल चुके थे. साल 2021 के स्थानीय निकाय चुनाव में उनके समर्थकों ने अच्छा प्रदर्शन किया था, जो राजनीतिक संभावना का संकेत था.

तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में मिली शानदार जीत के बाद जश्न मनाते टीवीके के समर्थक.

तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में मिली शानदार जीत के बाद जश्न मनाते टीवीके के समर्थक.

विजय की सफलता के प्रमुख कारण क्या हैं 

विजय के फैंस मुख्य रूप से 10-30 साल के युवा हैं, जो द्रविड़ पार्टियों (DMK-AIADMK) की पारंपरिक राजनीति से ऊब चुके थे. जेन जी उन्हें अपना प्रतिनिधि मानती है. फैन क्लबों ने पार्टी संगठन का काम संभाला, क्यूआर कोड से सदस्यता, सोशल मीडिया कैंपेन और विशाल रैलियां. अनुमानों के मुताबिक टीवीके के 10 लाख से ज्यादा सक्रिय सदस्य हैं. तमिलनाडु में फिल्म और राजनीति का गहरा संबंध है. विजय ने अपनी फिल्मों में सामाजिक-राजनीतिक मुद्दे उठाए (जैसे थमिझन, सर्कार). लोगों ने उन्हें 'थलपति' (सेनापति) नहीं, बल्कि नेता के रूप में देखा. उनकी ईसाई पृष्ठभूमि ने उन्हें जाति-आधारित राजनीति से ऊपर रखा.इससे व्यापक अपील बनी. इसके अलावा फिल्मों से पूर्ण संन्यास और जन नायक (Jana Nayagan) को अंतिम फिल्म बनाना. बिना गठबंधन के चुनाव लड़ना, 'अपने पैरों पर खड़ा होना' का संदेश था. विश्वसनीय लोगों को टिकट (जैसे पुराने ड्राइवर के बेटे को). 

युवाओं के लिए विजय का मुद्दा क्या था 

नशा मुक्ति, रोजगार, शिक्षा जैसे निर्णय ने युवाओं को आकर्षित किया. डीएमके और एआईएडीएमके की द्रविड़ राजनीति लंबे समय से चली आ रही है, लेकिन युवा नई उम्मीद चाहते थे. विजय ने इसे "Good vs Evil" या बदलाव बनाम पुरानी व्यवस्था के रूप में पेश किया.

तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में मिली शानदार जीत के बाद जश्न मनाते थलपति विजय के परिजन.

तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में मिली शानदार जीत के बाद जश्न मनाते थलपति विजय के परिजन.

अंत में यह कहा जा सकता है कि तमिलनाडु में विजय की सफलता केवल एक अभिनेता की लोकप्रियता नहीं, बल्कि भावनाओं, संगठन, समय की मांग और युवा ऊर्जा का मेल है. उन्होंने दिखाया है कि सिनेमा का जादू अगर सही दिशा में लगाया जाए तो राजनीति में भी 'वेट्री' (जीत) संभव है. चाहे वे मुख्यमंत्री बनें या मजबूत विपक्ष, थलपति विजय की यात्रा तमिलनाडु के युवाओं के लिए नई आशा का प्रतीक बन चुकी है. वेट्री निश्चयम्!— उनकी यह तमन्ना अब वास्तविकता की राह पर है. तमिलनाडु की राजनीति अब पहले जैसी नहीं रहेगी. यह विजय युग की शुरुआत हो सकती है.

(डिस्क्लेमर: डॉ नीरज कुमार बिहार के वैशाली स्थित सीवी रमन विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान पढ़ाते हैं. लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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