भारत जैसे विविधता भरे समाज में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, आस्था और असहमति-ये तीनों ही लोकतांत्रिक जीवन के महत्वपूर्ण स्तंभ हैं. लेकिन, बीते कुछ सालों में ऐसे कई घटनाक्रम सामने आए हैं, जिन्होंने दर्शाया है कि धार्मिक भावनाओं के नाम पर हिंसा का सहारा लेने की प्रवृत्ति बढ़ रही है. ऐसा ही मामला यूट्यूबर सलीम वास्तिक पर हुए हमले का भी है, जिसने इस बहस को फिर से जीवित कर दिया है कि क्या हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं, जहां विचारों का जवाब तर्क से नहीं, बल्कि तलवार से दिया जाएगा?
असहमति को स्वीकार करने की क्षमता
सलीम वास्तिक का मामला भी इसी व्यापक संदर्भ का नवीनतम उदाहरण है. वे खुद को सुधारवादी दृष्टिकोण रखने वाला बताते रहे हैं. वो कई सार्वजनिक बहसों में शामिल हुए हैं. उन पर हमला होना इस बात की ओर संकेत करता है कि कैसे समाज में असहमति को स्वीकार करने की क्षमता कमजोर हो रही है. विचारों का टकराव तो कि किसी भी सभ्य सामाज में स्वाभाविक है, मगर यह अब उस हिंसा का रूप ले रहा है जहां सार्वजनिक मंचों से खुलेआम धमकियां दी जा रही हैं और विचारों से इत्तेफाक न रखने वाले को खामोश कराने के लिए ऐसे बर्बर कृत्यों का सहारा लिया जा रहा है.
हालांकि, यह स्थापित तथ्य है कि पूरे समुदाय या धर्म को इन घटनाओं के आधार पर दोषी न ठहराया जाए. किसी भी धर्म के अधिकांश अनुयायी शांति और सह-अस्तित्व में विश्वास रखते हैं. कुछ व्यक्तियों या समूहों के कृत्यों के आधार पर पूरे समुदाय को दोष देना न केवल गलत है, बल्कि इससे समाज में और अधिक विभाजन पैदा होता है. मगर, यह भी सच है कि इस्लामिक कट्टरपंथियों की कार्यप्रणाली के कारण इस्लाम को लगातार सवालों के कटघरे में खड़ा किया जा रहा है.
स्ट्रैटेजिक टूल बनी भावनाएं
यह समझना जरूरी है कि किसी भी समाज में कट्टरता केवल कम पढ़े-लिखे या हाशिए पर खड़े लोगों तक सीमित नहीं रहती. कई बार शिक्षित, सामाजिक रूप से स्थापित और जागरूक लोग भी भावनात्मक उकसावे, पहचान की राजनीति या समूह दबाव के कारण चरमपंथी सोच की ओर झुक जाते हैं. यही इस समस्या का सबसे खतरनाक पहलू है-कट्टरता अब केवल अज्ञान का परिणाम नहीं, बल्कि विचारधारात्मक प्रभाव, सूचना के गलत इस्तेमाल और संगठित प्रचार का परिणाम भी बन चुकी है. इस्लाम भी इसी समस्या से जूझ रहा है और ऐसे देश-प्रदेश व दुनिया में ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जहां कट्टरपंथियों ने इसे स्ट्रैटेजिक टूल के तौर पर इस्तेमाल किया है.
साफ है कि पिछले सालों में कुछ घटनाएं ऐसी रही हैं, जिनमें धार्मिक भावनाओं के आहत होने के आरोप में लोगों को निशाना बनाया गया. इन घटनाओं ने समाज में भय और असुरक्षा का माहौल पैदा किया है. हालांकि, हर मामले की अपनी अलग कानूनी और सामाजिक परिस्थितियां होती हैं, लेकिन एक सामान्य पैटर्न यह दिखता है कि सोशल मीडिया या सार्वजनिक मंचों पर व्यक्त विचारों के कारण कुछ लोगों को हिंसा का सामना करना पड़ा. वैसे तो, यह स्थिति केवल एक समुदाय या एक विचारधारा तक सीमित नहीं है बल्कि दुनिया भर में विभिन्न धर्मों और समूहों में कट्टरता के उदाहरण मिलते हैं. मगर, इस्लामिक कट्टरपंथियों की धर्मांधता ने पूरी दुनिया में कई खतरनाक हमलों को अंजाम देने की पटकथाएं लिखी हैं, जिसके उदारहण भारत ही नहीं अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन से लेकर ऑस्ट्रेलिया समेत दुनिया के सैकड़ों देशों में देखने को मिलते हैं.
इस मानसिकता के पीछे का कारण कौन से हैं
यहां एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है कि आखिर लोग इस तरह की चरमपंथी मानसिकता तक पहुंचते कैसे हैं? इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं. पहला कारण है भावनात्मक उकसावा जिनके लिए धर्म आस्था का विषय है, और जब किसी को यह महसूस कराया जाता है कि उसकी आस्था खतरे में है, तो वह तर्कसंगत सोच खो सकता है. दूसरा कारण है समूह पहचान और दबाव, जहां जब व्यक्ति समूह के विचारों को अपनाने के लिए दबाव महसूस कर सकता है. इससे व्यक्तिगत सोच कमजोर हो जाती है. वहीं, तीसरा कारण गलत सूचना और प्रचार है, जहां कई बार आधी-अधूरी या भ्रामक जानकारी लोगों को भड़काने का काम करती है. जबकि चौथा कारण कट्टर विचारधाराओं का प्रभाव है. किसी भी धर्म या विचारधारा में कुछ ऐसे तत्व हो सकते हैं जो उसे कठोर और असहिष्णु दिशा में ले जाएं. जब इनकी व्याख्या चरम रूप में की जाती है, तो हिंसा करने और उसे सही ठहराने की कोशिश की जाती है.
किसी भी परिस्थिति में यह याद रखना बहुत जरूरी है कि हिंसा किसी भी समस्या का समाधान नहीं है. चाहे विचार कितना भी असहमतिपूर्ण क्यों न हो, उसका जवाब कानून और तर्क के दायरे में ही दिया जाना चाहिए. अगर समाज में यह प्रवृत्ति बढ़ती है कि असहमति का जवाब हिंसा से दिया जाए, तो यह लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा बन सकता है. सलीम वास्तिक पर हुआ हमला केवल एक व्यक्ति पर हमला नहीं है, बल्कि उस विचार पर हमला है जो असहमति और बहस की जगह को बनाए रखना चाहता है. इस घटना को एक चेतावनी के रूप में देखना चाहिए कि यदि हम समय रहते कट्टरता के खिलाफ खड़े नहीं हुए, तो यह जहर समाज के हर हिस्से को प्रभावित कर सकता है.
इसलिए, जरूरी है कि हम एक समाज के तौर पर हर प्रकार की धार्मिक या वैचारिक कट्टरता के खिलाफ एकजुट होकर खड़े हों, और यह सुनिश्चित करें कि हमारे समाज में तर्क, संवाद और कानून का शासन सर्वोपरि रहे.
(डिस्क्लेमर: लेखक दिल्ली विश्वविद्याल में असोसिएट प्रोफेसर हैं. राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर लेखन करते हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)