नई दिल्ली में भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता के दौरान हुई तीन महत्वपूर्ण बैठकों के पीछे एक बड़ी कहानी छिपी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान और चीन के राष्ट्रपति शी चिनपिंग के साथ बातचीत केवल द्विपक्षीय मुलाकातें नहीं हैं. इन्हें एक साथ देखने पर यह स्पष्ट होता है कि भारत तेजी से बदलती वैश्विक व्यवस्था को किस नजरिए से देख रहा है और उसमें अपनी भूमिका कैसे तय करना चाहता है.
ब्रिक्स (BRICS) ने 2006 में ब्राजील, रूस, भारत और चीन के बीच एक अनौपचारिक आर्थिक संवाद के रूप में शुरुआत की थी. बाद में इसके विस्तार के साथ यह 11 सदस्य देशों का समूह बन गया, जो दुनिया की बड़ी आबादी और PPP के आधार पर वैश्विक जीडीपी के लगभग 37 प्रतिशत हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है. इस पैमाने पर इसका आर्थिक वजन अब जी-7 देशों से भी अधिक है.
न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) की स्थापना, स्थानीय मुद्राओं में कारोबार और वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों पर बढ़ते प्रयोगों ने ब्रिक्स को वह संस्थागत और आर्थिक मजबूती दी है, जो दो दशक पहले उसके पास नहीं थी. हालांकि, इसकी एक विशेषता यह भी है कि इसके सदस्य देशों की दुनिया के भविष्य को लेकर एक जैसी सोच नहीं है.
फिर भी यह कमजोरी नहीं है. आज कई देश ब्रिक्स को किसी एक भू-राजनीतिक या वित्तीय केंद्र पर अत्यधिक निर्भरता से बचने, अपनी सौदेबाज़ी की क्षमता मजबूत करने और ग्लोबल साउथ की आवाज़ को अधिक प्रभावी बनाने के मंच के रूप में देखते हैं. यह एक राजनीतिक गुट से अधिक रणनीतिक लचीलेपन का साधन बन चुका है. नई दिल्ली में भारत की तीनों बैठकें इसी वास्तविकता को दर्शाती हैं.

रूस के साथ: संबंधों को और गहरा करना
मोदी-पुतिन बैठक भारत के तीनों संबंधों में सबसे पुरानी और स्थापित साझेदारी का प्रतिनिधित्व करती है. रक्षा और ऊर्जा अब भी इसके प्रमुख स्तंभ हैं, लेकिन संबंध अब विनिर्माण, प्रौद्योगिकी, परमाणु ऊर्जा, अंतरिक्ष, महत्वपूर्ण खनिजों और दीर्घकालिक आर्थिक सहयोग के अन्य क्षेत्रों तक फैल चुके हैं. इस रिश्ते का महत्व इसकी व्यापकता में है. भारत भले ही अपने रक्षा खरीद स्रोतों में विविधता ला रहा हो और अमेरिका तथा यूरोप के साथ आर्थिक रिश्ते मजबूत कर रहा हो, लेकिन इसका मतलब रूस को छोड़ देना नहीं है. रूस भारत की ऊर्जा सुरक्षा, रक्षा क्षमताओं और रणनीतिक आपूर्ति श्रृंखलाओं के लिए अब भी महत्वपूर्ण है.
इस संबंध का एक कूटनीतिक पहलू भी है. भारत प्रमुख वैश्विक संघर्षों के समाधान के लिए संवाद और कूटनीति का समर्थन करता है, जिससे वह मॉस्को के साथ संपर्क बनाए रख सकता है, बिना रूस की हर नीति से स्वयं को जोड़ने के. इसलिए रूस के साथ भारत का लक्ष्य संबंधों को और गहरा करने के साथ-साथ उन्हें अधिक विविध बनाना है.
ईरान के साथ: रणनीतिक विकल्पों को सुरक्षित रखना
राष्ट्रपति पेजेश्कियान के साथ बातचीत का तर्क अलग है. ईरान भारत के लिए केवल व्यापार या ऊर्जा का साझेदार नहीं, बल्कि भूगोल के लिहाज़ से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है. चाबहार बंदरगाह भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच उपलब्ध कराता है. फारस की खाड़ी और होर्मुज जलडमरूमध्य भारत की ऊर्जा और समुद्री सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण हैं. इसके अलावा, ईरान अब व्यापक ब्रिक्स ढांचे में भी एक महत्वपूर्ण भागीदार बन रहा है.
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच भारत का संवाद, कूटनीति, नौवहन की स्वतंत्रता और नाविकों की सुरक्षा पर ज़ोर देना सिद्धांत और व्यावहारिकता दोनों के अनुरूप है. भारत को तेहरान और अपने इज़राइल, खाड़ी देशों या अमेरिका के साथ संबंधों में से किसी एक को चुनने की आवश्यकता नहीं है. उसका हित सभी पक्षों के साथ संवाद बनाए रखने में है. इसलिए ईरान के साथ भारत का उद्देश्य अपने लिए रणनीतिक गुंजाइश (Strategic Space) बनाए रखना है.
चीन के साथ: स्थिरता की तलाश
शी चिनपिंग की यात्रा भारत के लिए सबसे जटिल समीकरण पेश करती है. भारत और चीन अभी भी रणनीतिक प्रतिस्पर्धी हैं. सीमा विवाद का समाधान नहीं हुआ है, चीन-पाकिस्तान संबंध नई दिल्ली की चिंताओं का विषय बने हुए हैं और दोनों देशों के बीच बड़ा व्यापार घाटा भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. इसके बावजूद दोनों देशों के आर्थिक संबंध इतने व्यापक हो चुके हैं कि कोई भी पक्ष इन्हें हल्के में नहीं ले सकता. ऐसे में लक्ष्य न तो पूर्ण अलगाव (Decoupling) होना चाहिए और न ही अत्यधिक निर्भरता, बल्कि "प्रबंधित परस्पर निर्भरता" (Managed Interdependence) होना चाहिए.
भारत को चीनी बाजार तक बेहतर पहुंच और मशीनरी, उपकरणों तथा औद्योगिक इनपुट्स की विश्वसनीय आपूर्ति चाहिए. वहीं चीन के लिए दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक भारत के साथ स्थिर संबंध बनाए रखना महत्वपूर्ण है. असल परीक्षा यह होगी कि क्या राजनीतिक संबंधों में आई गर्माहट सीमा, व्यापार, निवेश, वीजा और संपर्क के क्षेत्रों में अधिक स्थिरता और पूर्वानुमेयता में बदल पाती है. इसलिए चीन के साथ भारत का उद्देश्य संबंधों को स्थिर करना है, बिना यह दिखावा किए कि दोनों देशों के रणनीतिक मतभेद समाप्त हो गए हैं.

यदि इन तीनों बैठकों को एक साथ देखा जाए तो वे भारत की कूटनीतिक जरूरतें समझ में आती है.
- रूस के साथ: संबंधों को गहरा करना.
- ईरान के साथ: रणनीतिक गुंजाइश बनाए रखना.
- चीन के साथ: प्रतिस्पर्धा के बीच स्थिरता लाना.
और इनमें से कोई भी कदम भारत को अमेरिका, यूरोप, जापान, ऑस्ट्रेलिया और खाड़ी देशों के साथ अपने संबंधों का विस्तार करने से नहीं रोकता. यही कारण है कि ब्रिक्स का विकास महत्वपूर्ण है. इसकी बढ़ती आर्थिक शक्ति इसे प्रभावशाली बनाती है, जबकि संस्थागत विकास इसे स्थायित्व प्रदान करता है. लेकिन इसकी आंतरिक विविधता इसे पारंपरिक सैन्य या राजनीतिक गठबंधन बनने से रोकती है.
रूस और चीन शायद एक वैकल्पिक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की ओर बढ़ना चाहते हों, लेकिन भारत की दिलचस्पी एक गुट को दूसरे गुट से बदलने में नहीं है. कई अन्य सदस्य भी ब्रिक्स को वैचारिक परियोजना के बजाय अपने विकल्प बढ़ाने के साधन के रूप में देखते हैं. भारत की चुनौती और अवसर दोनों यही हैं कि वह इस विविधता को रचनात्मक दिशा दे.
भारत की संभावित भूमिका
ब्रिक्स को पश्चिम विरोधी मंच में बदले बिना न्यू डेवलपमेंट बैंक, स्थानीय मुद्राओं का अधिक उपयोग, भुगतान संपर्क, प्रौद्योगिकी, ऊर्जा, विकास और मजबूत आपूर्ति श्रृंखलाओं में सहयोग इस संगठन को अधिक व्यावहारिक बना सकते हैं. वास्तव में, ब्रिक्स तब सबसे अधिक प्रभावी हो सकता है जब उसकी पहचान पश्चिम के विरोध से नहीं, बल्कि विकास और सहयोग से तय हो.
भारत अपनी ब्रिक्स अध्यक्षता का उपयोग "नई विश्व व्यवस्था" जैसी वैचारिक बहसों से ध्यान हटाकर ग्लोबल साउथ की वास्तविक चुनौतियों पर केंद्रित करने के लिए कर सकता है, जैसे:
- विकास वित्त
- व्यापार
- प्रौद्योगिकी
- खाद्य एवं ऊर्जा सुरक्षा
- जलवायु लचीलापन
- संपर्क और कनेक्टिविटी
- वैश्विक संस्थानों में सुधार
रूस यह दिखाता है कि भारत पश्चिम से दूर हो चुके देश के साथ भी गहरे रणनीतिक संबंध बनाए रख सकता है. ईरान यह दर्शाता है कि किसी क्षेत्रीय तनाव के केंद्र में मौजूद देश के साथ भी संवाद संभव है. चीन यह साबित करता है कि गंभीर रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के बावजूद बातचीत के रास्ते बंद नहीं होते.
यह पुरानी शैली का गुटनिरपेक्षता आंदोलन नहीं है और न ही केवल रणनीतिक स्वायत्तता का नया संस्करण. यह वास्तव में "मल्टी-अलाइनमेंट" है, यानी अलग-अलग मुद्दों पर विभिन्न शक्तियों के साथ अपनी राष्ट्रीय हितों के अनुसार सहयोग करने की स्वतंत्रता.
विडंबना यह है कि ब्रिक्स शायद इसलिए अधिक महत्वपूर्ण बन रहा है क्योंकि उसके सदस्य हर मुद्दे पर एकमत नहीं हैं. उसकी यही विविधता उस नई दुनिया को रिफ्लेक्ट करती है जो बहुध्रुवीय, प्रतिस्पर्धी और किसी एक शक्ति-केन्द्र को स्वीकार करने के लिए कम इच्छुक होती जा रही है.
भारत का दृष्टिकोण स्पष्ट है: जहां हित मिलते हैं वहां संबंधों को गहरा करो, जहां रणनीतिक गुंजाइश मिलती है वहां रिश्तों को बनाए रखो, और जहां टकराव की कीमत बहुत अधिक हो वहां प्रतिद्वंद्विता को स्थिर करो. संभवतः यही उभरती हुई ब्रिक्स कहानी में भारत का सबसे महत्वपूर्ण योगदान है और नई वैश्विक व्यवस्था में उसकी भूमिका की सबसे स्पष्ट अभिव्यक्ति भी.
शिशिर प्रियदर्शी चिंतन रिसर्च फाउंडेशन (CRF) के प्रेसिडेंट हैं.
डिस्क्लेमर- लेख में व्यक्त विचार लेखकों के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)