प्रकृति का सानिध्य और कोरोना काल

प्रकृति के साथ मेरा लगाव बचपन से ही रहा है, ग्रामीण परिवेश में पला-बढ़ा और और बचपन का अधिकांश समय नदी, नाले,खेत-खलिहानों के बीच ही गुजरा और प्रकृति के करीब रहकर मुझे बहुत कुछ जानने और सीखने को भी मिला.

प्रकृति का सानिध्य और कोरोना काल

प्रकृति का सानिध्य और कोरोना काल...

नई दिल्ली:

सुनामी रूपी कोरोना काल की इस दूसरी लहर में, मैंने अपने मानसिक दबाब को प्रकृति के नजदीक रखकर कैसे दूर किया? सरकार द्वारा जब पूर्ण लॉकडाउन की तिथि की घोषणा हुई, तो उस समय चारों तरफ बहुत ही भयाभय और पीड़ादायक स्थिति निर्मित हो रही थी, क्योंकि हम सक्षम होकर भी अपने लोगों की मदद नहीं कर पा रहे थे. यह सब देखकर मेरा मन भी काफी विचलित हुआ, जिसके कारण धीरे-धीरे मानसिक तनाव की स्थिति निर्मित हुई और यह हर किसी के साथ स्वाभाविक है क्योंकि इन्सान एक प्राणी है, जो मानवीय संवेदनाओं को भलीभांति महसूस कर सकता है. घर की चार-दीवारी में कैद होकर इन्सान मन ही मन कुंठित होता रहता है और परिणाम मानसिक तनाव की स्थिति निर्मित होती है.

इस लेख के माध्यम से कोरोना काल में प्रकृति के सानिध्य में बिताये मेरे कुछ सुखद अनुभव मैं आपके साथ साझा कर रहा हूं, क्योंकि में स्वयं कोरोना विपदा से निकलकर और ठीक होकर यह लेख लिख रहा हूं और साथ ही यह बताना भी चाहूंगा की जब मेरी कोरोना रिपोर्ट पॉजिटिव आयी तो उस समय मेरी मानसिक स्थिति भी तनाव में थी, लेकिन प्रकृति के नजदीक रहकर मेरा यह कठिन समय सुखद तरीके से कैसे निकल गया और मुझे पता भी नहीं चल पाया.

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प्रकृति के साथ मेरा लगाव बचपन से ही रहा है, ग्रामीण परिवेश में पला-बढ़ा और और बचपन का अधिकांश समय नदी, नाले,खेत-खलिहानों के बीच ही गुजरा और प्रकृति के करीब रहकर मुझे बहुत कुछ जानने और सीखने को भी मिला.

कोरोना काल की इस विपदा की घड़ी में, मेरा अधिकतर समय प्रकृति के समीप ही रहकर गुजरा. अपने घर के छोटे से बगीचे में नित्य पेड़-पौधों को निहारना, रोज नए-नए रंग-बिरंगे फूलों का खिलना, भंवरों की गूंज, रंग बिरंगी तितलियों का फूलों पर बैठना और आसमान में उड़ते हुए पक्षियों का कलरव और करतव मेरे मानसिक तनाव को भुला देते थे.

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 मैंने इस समय को एक यादगार और सकरात्मक समय के रूप में जाना और समझा. इस समय में प्रकृति में जो बदलाव और शांति चारों तरफ देखने को मिली सुंदर सा वातावरण और असमान में स्वछंद उड़ते पक्षीयो को देखकर मानसिक तनाव सचमुच गायब हो जाता था और बहुत प्रसन्नता भी मिलती थी.

 मुझे फिर एक बार एहसास हुआ की प्रकृति का सानिध्य इन्सान को कितना सुकून देता है और हम धीरे-धीरे इस भाग दौड़ की जिन्दगी में इससे दूरियां बनाते जा रहे है. मैंने यह महसूस किया और जाना भी कि हमारे मानसिक तनाव और दबाव का असल कारण क्या है और मानसिक शांति और सुकून का सही मायना मुझे इस विषम और विपदा की कठिन परस्थिति में जानने और महसूस करने का अवसर मिला है. इस समय को में सकारात्मक ही कहूंगा क्योंकि आपदा अथवा विपदा में ही हमें अवसर मिलते हैं और अहसास,अनुभव और सीख भी.

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प्रकृति एक खुली किताब है, जिसमे सभी कुछ है, बस हमें देखने और महसूस करने की जरुरत है क्योंकि प्रकृति में ही जीवन के इंद्रधनुषी रंग और आत्मिक और मानसिक सुख भी हमें मिलेंगे. मेरे लिए कोरोना काल का यह सुखद अनुभव जीवन के अच्छे और यादगार लम्हों में सुमार हो गया, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता .

यह श्रंखला 'नेचर कन्ज़र्वेशन फाउंडेशन' द्वारा चालित 'नेचर कम्युनिकेशन्स' कार्यक्रम की एक पहल है. इस का उद्देश्य भारतीय भाषाओं में प्रकृति से सम्बंधित लेखन को प्रोत्साहित करना है


आनंद पटेल 15 वर्षों से पर्यावरण और जैवविविधता संरक्षण में संलग्न हैं.  वर्तमान में वह अंडर दी मैंगो ट्री सोसाइटी, मध्यप्रदेश में कार्यरत हैं.

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