विज्ञापन
This Article is From Jun 24, 2020

नीतीश कुमार लालू यादव की राष्ट्रीय जनता दल के विधायकों को क्यों तोड़ रहे हैं?

राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा शुरू हो गई कि आखिर नीतीश कुमार ने घर में बैठे-बैठे ये राजनीतिक तोड़फोड़ का खेल क्यों शुरू किया है. जनता दल यूनाइटेड के उनके क़रीबी नेताओं का कहना है कि यह खेल ख़ुद RJD ने शुरू किया है.

नीतीश कुमार लालू यादव की राष्ट्रीय जनता दल के विधायकों को क्यों तोड़ रहे हैं?
जानकार बता रहे हैं कि आरजेडी के कई विधायक नीतीश कुमार के संपर्क में है. (फाइल फोटो)
पटना:

बिहार में राष्ट्रीय जनता दल के पांच विधान पार्षद मंगलवार को जनता दल युनाइटेड में शामिल हो गए. इसके बाद यह राजनीतिक अटकलें भी शुरू हो गई कि जल्द राष्ट्रीय जनता दल विधायक दल में भी ऐसी ही फूट होगी, बस जनता दल यूनाइटेड के राष्ट्रीय अध्यक्ष और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को भारतीय जनता पार्टी के साथ सीटों के समझौते का इंतज़ार है. एक बार सीटों की संख्या और नामों पर अंतिम निर्णय हो जाए उसके तुरंत बाद जो विधायक राष्ट्रीय जनता दल से नीतीश कुमार के साथ संपर्क में हैं उनकी विधिवत शामिल होने की प्रक्रिया भी पूरी कर ली जाएगी. इस बात का संकेत ख़ुद मंगलवार को लोकसभा में संसदीय दल के नेता ललन सिंह ने मीडिया वालों को दिया.

इसके जवाब में राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव ने कहा, 'यह कौन सी नई बात है हर बार चुनाव के समय कुछ लोग इधर से उधर जाते हैं और उधर से इधर आते हैं. जिन्हें ले जाना हो वो जल्द से जल्द ले जाएं और साथ ही साथ नीतीश कुमार से सवाल पूछा कि क्या इससे बिहार में श्रमिकों का पलायन बेरोज़गारी की समस्या या गिरती विधि व्यवस्था जैसी समस्या का समाधान हों जायेगा.'

लेकिन राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा शुरू हो गई कि आखिर नीतीश कुमार ने घर में बैठे-बैठे ये राजनीतिक तोड़फोड़ का खेल क्यों शुरू किया है. जनता दल यूनाइटेड के उनके क़रीबी नेताओं का कहना है कि यह खेल ख़ुद RJD ने शुरू किया है. क्योंकि कुछ दिनों पहले उन्होंने जनता दल यूनाइटेड के पूर्व विधान पार्षद जावेद इक़बाल अंसारी को राजद में शामिल कराया था तो एक राजनीतिक दल के रूप में उनका जवाब देना लाज़िमी है और इस बात के साथ उसका एहसास भी कराना ज़रूरी है कि नीतीश कुमार के साथ अगर आप छेड़-छाड़ करेंगे तो आप उस रूप से ही परिणाम झेलना होगा.

हालांकि कुछ नेताओं का कहना है कि इस तोड़फोड़ के खेल में नीतीश कुमार की छवि बहुत अच्छी नहीं बनती है, क्योंकि राधा चरण सेठ जैसे विवादास्पद छवि के लोगों को अगर नीतीश कुमार को अपनी पार्टी में शामिल कराना पड़ रहा है तो 15 वर्षों के शासनकाल के बाद यह उनके लिए उपलब्धि नहीं बल्कि उनके लिए एक बड़ा समझौता है. जब तक वो राजद में थे ख़ुद उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी ने हर तरह के माफ़िया की उपाधि उन्हें दी थी. कई नेताओं का कहना है कि अगर नीतीश कुमार ने राजद के ही विधान परिषद सदस्यों को शामिल कराना था तो उनके वरिष्ठ नेता जैसे रामचंद्र पूर्वे को शामिल कराया होता तो शायद उससे उनका राजनीतिक क़द बढ़ता. लेकिन सेठ जैसे विवादास्पद नेताओं को शामिल करा कर उन्होंने अपनी ही राजनीतिक पूंजी जो उनकी छवि है उसपर ख़ुद से छींटा लगाने की मौन सहमति दी हैं.

वहीं इस प्रकरण पर राष्ट्रीय जनता दल के मुख्य प्रवक्ता मनोज झा का कहना हैं, 'माननीय नीतीश जी ने भाजपा के सानिध्य में कुछ सीखा हो या नहीं लेकिन साम, दाम, दंड भेद कर विपक्ष के विधायकों को अपने पालने में लाने की कला ज़रूर सीखी हैं. लेकिन उनको ये नहीं भूलना चाहिए कि आज से 20 वर्ष बाद की राजनीति में सक्रिय लोग उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में याद करेंगे, जिसने उन्होंने मुसीबत में साथ देने वाले सहयोगी और तिलक लगा के गद्दी पर बैठाने वाले व्यक्ति लालू यादव के साथ कैसा ओछा व्यक्तिगत और राजनीतिक व्यवहार किया.'

हालांकि जनता दल यूनाइटेड के नेताओं का कहना हैं कि झा जैसे नेता भूल जाते हैं कि विधान पार्षद हो या विधायक सब उनके नेता तेजस्वी यादव की कार्यशैली से तंग आकर नीतीश कुमार के शरण में आ रहे हैं. जितना मनोज झा दूसरों को ज्ञान दे रहे हैं, उतना वो तेजस्वी को समझाते तो रघुवंश प्रसाद सिंह जैसे वरिष्ठ नेताओं को अपने पद से इस्तीफ़ा नहीं देना पड़ता.

जानकार मानते हैं कि नीतीश कुमार जब बिहार के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर 2005 में बैठे तो बिहार में उन्होंने लालू यादव और बाहर भाजपा के साथ सरकार चलाते हुए वर्तमान प्रधानमंत्री और उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के चैलेंजर के रूप में अपनी पहचान बनाई. एक बार बिहार की जनता ने बीजेपी के सहयोग से 2010 में उन्हें लालू यादव से जब चुनौती मिली तो विजयी बनाया. दूसरी बार वो लालू यादव की मदद से 2015 में नरेंद्र मोदी की चुनौती को पराजित करने में क़ामयाब हुए. लेकिन बाद में उन्हें इस बात का अहसास हुआ कि लालू यादव के साथ रहे तो सब कुछ ख़त्म हो जायेगा. तो फिर नरेंद्र मोदी के शरण में गये . लेकिन नरेंद्र मोदी ने तीन वर्षों में जितना सम्मान नहीं दिया उससे ज़्यादा राजनीतिक रूप से बेज़्ज़त भी किया. जैसे पटना विश्वविद्यालय के शताब्दी वर्ष के कार्यक्रम में बार बार नीतीश कुमार के आग्रह के बावजूद कि पटना विश्वविद्यालय को केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा दिया जाए, नरेंद्र मोदी ने भरी सभा में इस मांग को ख़ारिज कर दिया.

दूसरी बार लोकसभा चुनाव के तुरंत बाद जब मंत्रिमंडल गठन की बात आई तो नीतीश कुमार ने आनुपातिक आधार पर हिस्सेदारी की मांग की जिसे भी ख़ारिज कर दिया गया. विकास के कामों में भी पिछले 3 वर्षों के दौरान ऐसा कभी नहीं लगा कि केंद्र सरकार बिहार पर मेहरबान है. लेकिन नीतीश कुमार को शायद अभी अब अपनी राजनीतिक औक़ात का अंदाज़ा है इसलिए वो BJP से फ़िलहाल कोई बैर मोल लेना नहीं चाहते क्योंकि उन्हें मालूम है कि बिहार के बाहर राजनीति में अब उनकी कोई पूछ नहीं और उन्हें अपना बाक़ी का राजनीतिक जीवन बिहार के अंदर ही जनता का आशीर्वाद जब तक हैं मुख्यमंत्री की कुर्सी पर गुज़ारना है. इसलिए वह अपनी सारी ऊर्जा राजद को कमज़ोर करने में लगा रहे हैं.

Video:बिहार में RJD को बड़ा झटका, 5 विधान पार्षद JDU में शामिल

पूरी स्टोरी पढ़ें

NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं

फॉलो करे:
Bihar Assembly Election 2020, Nitish Kumar, JDU, RJD, बिहार विधानसभा चुनाव
Listen to the latest songs, only on JioSaavn.com