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This Article is From Feb 25, 2019

शिवानंद ने सुशील मोदी से पूछा, युवा किसका अनुसरण करें...

शिवानंद तिवारी के अनुसार संयोग से देश को एक ऐसा प्रधानमंत्री मिला है जिनकी सज धज सात सितारा है. दुनिया के किसी भी मुल्क का प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति ऐसा सजने-संवरने वाला नहीं होगा.

शिवानंद ने सुशील मोदी से पूछा, युवा किसका अनुसरण करें...
शिवानंद तिवारी ने सुशील मोदी पर किया हमला
पटना:

बिहार की राजनीति में बयानबाज़ी में जहां उप मुख्यमंत्री के निशाने पर राजद अध्यक्ष लालू यादव और विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव होते हैं वहीं उनके बचाव में मोदी का जवाब राजद के उपाध्यक्ष शिवानंद तिवारी देते हैं. पिछले दिनों सरकारी बंगले के बाहर जहां उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी ने तेजस्वी यादव पर हमला तेज किया और कई सवाल पूछ डाले वहीं अब उनके जवाब में राजद के उपाध्यक्ष और राष्ट्रीय प्रवक्ता शिवानंद तिवारी ने सुशील मोदी से पूछा है कि आज के युवा किनसे प्रेरित हों! किनका अनुकरण करें? सुशील मोदी जी का को इसका जवाब देना चाहिए. शिवानंद के अनुसार संयोग से देश को एक ऐसा प्रधानमंत्री मिला है जिनकी सज धज सात सितारा है. दुनिया के किसी भी मुल्क का प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति ऐसा सजने-संवरने वाला नहीं होगा. उनका ठाट-बाट एक भोगी व्यक्ति की तस्वीर पेश करता है.

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दूसरी ओर शिवानंद तिवारी ने कहा कि हमारे मुख्यमंत्री जी हैं. कुछ दिन पहले तक एक साथ दो-दो कोठियां उन्होंने अपने कब्जे में रखी थीं. एक तो मुख्यमंत्री की कोठी जिस पर उनका वैधानिक अधिकार है. इसके साथ उन्होंने भूतपूर्व मुख्यमंत्री की कोठी भी अपने कब्जे में रखी थी. उस पर उनका वैधानिक अधिकार नहीं था. पटना उच्च न्यायालय द्वारा रद्द किए जाने के पूर्व भूतपूर्व मुख्मंत्री को आजीवन सरकारी कोठी का प्रावधान नीतीश जी ने करवा लिया था. इसलिए यह मानकर कि अब आजीवन उसी में रहना है, उस कोठी में करोड़ों की सरकारी राशि नीतीश जी ने खर्च कराई. कितना खर्च हुआ है इसके विषय में तरह तरह की चर्चा होती रही है. कोई बता रहा था कि पीडब्ल्यूडी के भवन निर्माण विभाग की वेबसाइट पर उक्त कोठी पर 12 करोड़ रुपए खर्च की सूचना दर्ज है.

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अपने बयान में शिवानंद ने कहा कि तेजस्वी की कोठी को लेकर पटना हाई कोर्ट में जब सुनवाई हो रही थी तब पीडब्ल्यूडी भवन निर्माण विभाग ने पटना हाई कोर्ट को बताया था कि मुख्यमंत्री की अवैध कब्जे वाली कोठी में करीब पौने दो करोड़ रुपए तो एक हॉल के निर्माण में खर्च हुए हैं. इसको सुशील मोदी अच्छी तरह जानते हैं. यही लोग हैं जिनका समाज और विशेष रूप से युवा अनुकरण कर सकता है. हमारे प्रधानमंत्री जी ने अपनी जिंदगी की शुरुआत में चाय बेची है. वे स्वयं बताते हैं कि उन्होंने गरीबी भोगी है. हमारे मुख्यमंत्री जी अपने वैद्य पिता की दुकान पर आयुर्वेदचूर्ण की पुड़िया बांधते थे. खुद बताते हैं उनकी बांधी पुड़िया जल्दी खुलती नहीं है. यानी उनकी भी पृष्ठभूमि सामान्य है. हमारे सुशील जी की आंखों में प्रधानमंत्री जी की सज धज कभी गड़ी नहीं होगी. न ही उन्होंने कभी नीतीश जी को सरकारी धन के अपव्‍यय पर टोका होगा. तेजस्वी की उस कोठी में जिसमें सुशील जी स्वयं विराजमान हैं जब पत्रकारों को घुमा रहे थे तो एक वरिय की अपने कनिष्ठ के रहन सहन के विषय में चिंता नहीं थी. बल्कि उसमें ईर्ष्या या जलन का प्रदर्शन हो रहा था. मेरे सामने का जन्मा लड़का हमसे इतना आगे कैसे निकल गया. मुख्यमंत्री बनने की मेरी अभिलाषा सूखने लगी है और यह नौजवान देखते देखते उसका सशक्त दावेदार बन गया है. जिन पत्रकारों को सुशील कोठी में घूमा रहे थे उनको भी उनके मन की कुंठा दिखाई दे रही थी.

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 देश जब आजादी की लड़ाई लड़ रहा था तो उस समय महात्मा गांधी ने रहन सहन और आचार विचार की एक नजीर पेश की थी. मितव्ययिता और सादगी को उन्होंने राजनीति का हिस्सा बना दिया था. माना जाता था कि गरीब मुल्क में मितव्ययिता भी आर्थिक नीति का हिस्सा होना चाहिए. इसके बगैर मुल्क गरीबी से नहीं निकलेगा. उसका नतीजा था आजादी के बाद जिन लोगों के हाथ में सत्ता आई उन लोगों ने रहन सहन की उस परंपरा को कायम रखा. हमको याद है उस समय के नेताओं या मंत्रियों का रहन सहन और आम राजनीतिक कार्यकर्ता के रहन सहन में बहुत कम फर्क हुआ करता था. इस तरह देखा जाए तो जनता और नेता के बीच फासला कम होता था. धीरे-धीरे परिस्थिति बदल गई और इसी के साथ जीवन की वह शैली भी बदलने लगी. 1991 में देश में उदारीकरण की आर्थिक नीति की शुरुआत हुई. उसके बाद उपभोक्तावाद तेजी से बढ़ा. सामाजिक मूल्य बदल गया. इंसान की हैसियत की पहचान उसके घर में उपभोग की आधुनिक सामग्रियों के भंडार से होने लगी.

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नई उम्र के नौजवान रहन सहन में किसका अनुकरण करें? उनके सामने तो विज्ञापनों के मॉडलों के साथ सज धज में प्रतियोगिता करता हुआ प्रधानमंत्री है. दूसरी नजीर बिहार का मुख्यमंत्री है जो दिन भर गांधी का नाम जपता है. ऐसा महंगा और भ्रष्टाचार की गंगोत्री बहाने वाला मुख्यमंत्री बिहार को कभी नहीं मिला. युवा किससे प्रेरणा लें? ऐसी हालत में तो यही कहा जाएगा कि सुशील मोदी मीडिया के सामने तेजस्वी की कोठी नहीं बल्कि अपनी कुंठा और ईर्ष्या की नुमाइश कर रहे थे.

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