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This Article is From Jan 15, 2026

सड़कों से सत्ता तक, ज़मीन पर क्या पड़ा असर? नीतीश कुमार की यात्राओं का जान लीजिए इतिहास

नीतीश कुमार ने महिलाओं को केंद्र में रखकर अलग-अलग संवाद कार्यक्रम और यात्राएं कीं. मकसद था महिला सशक्तिकरण, स्वयं सहायता समूहों को बढ़ावा और साइकिल और पोशाक योजना का प्रचार करना. जनता पे इसका सीधा असर पड़ा. लड़कियों की स्कूल में उपस्थिति बढ़ी, महिला वोट बैंक नीतीश के साथ जुड़ी और बिहार की राजनीति में महिला मुद्दे मजबूत हुए.

सड़कों से सत्ता तक, ज़मीन पर क्या पड़ा असर? नीतीश कुमार की यात्राओं का जान लीजिए इतिहास
पटना:

बिहार की राजनीति में अगर यात्रा शब्द को किसी एक नेता से जोड़ा जाता है, तो वह नाम है नीतीश कुमार. पिछले लगभग दो दशकों में नीतीश कुमार ने कई बड़ी और छोटी यात्राएं कीं. इन यात्राओं का मकसद कभी विकास का संदेश देना रहा, कभी प्रशासन की समीक्षा, तो कभी जनता से सीधे संवाद. सवाल यह है कि इन यात्राओं का राजनीतिक और ज़मीनी असर क्या रहा? क्या ये यात्राएं सिर्फ प्रतीक बनीं या सच में बिहार की दिशा बदली? नीतीश कुमार जब 2005 में सत्ता में आए, तब बिहार की छवि अपराध, बदहाली और अव्यवस्था से जुड़ी थी. उन्होंने शुरुआत से ही यह समझ लिया था कि कुर्सी पर बैठकर शासन करने से ज़्यादा असरदार है ज़मीन पर जाकर देखना. यहीं से उनकी यात्रा राजनीति की नींव पड़ी.

विकास यात्रा (2006–2008)

नीतीश कुमार की पहली बड़ी और चर्चित यात्रा थी विकास यात्रा. इस यात्रा का मकसद था, बिहार में चल रही विकास योजनाओं का प्रचार, अधिकारियों पर दबाव और जनता को भरोसा दिलाना कि सरकार काम कर रही है . इस यात्रा के दौरान कई जिलों में सड़कों का काम तेज़ हुआ, स्कूल और स्वास्थ्य केंद्रों की समीक्षा हुई और अधिकारियों में सक्रियता बढ़ी. विकास यात्रा ने नीतीश कुमार को “काम करने वाले मुख्यमंत्री” की छवि दी. इसका सीधा फायदा 2010 के विधानसभा चुनाव में दिखा, जब उन्हें भारी बहुमत मिला.
 

इसके बाद नीतीश सरकार ने महिला संवाद जैसे कार्यक्रमों के ज़रिये समाज के खास वर्गों से सीधा संपर्क बनाया. स्वयं सहायता समूहों, साइकिल और पोशाक योजना जैसी योजनाओं को यात्राओं के दौरान प्रमुखता से रखा गया. इससे महिलाओं में राजनीतिक जागरूकता बढ़ी, नीतीश कुमार को महिला वोटरों का बड़ा समर्थन मिला और सामाजिक बदलाव की राजनीति को बल मिला. नीतीश कुमार से उसके बाद अधिकार यात्रा और समय समय पर विशेष अभियान चला कर शराबबंदी, बाल विवाह रोकथाम और दहेज प्रथा के खिलाफ जैसे मुद्दों पर भी यात्राओं और अभियानों को आगे बढ़ाया.. इन यात्राओं से कानून बने, संदेश गया, लेकिन ज़मीनी स्तर पर असर मिश्रित रहा. शराबबंदी लागू हुई, पर अवैध शराब और तस्करी की चुनौतियां भी सामने आईं.


 महिला संवाद / महिला विकास यात्राएं (2007–2010)

इस दौर में नीतीश कुमार ने महिलाओं को केंद्र में रखकर अलग-अलग संवाद कार्यक्रम और यात्राएं कीं. मकसद था महिला सशक्तिकरण, स्वयं सहायता समूहों को बढ़ावा और साइकिल और पोशाक योजना का प्रचार करना. जनता पे इसका सीधा असर पड़ा. लड़कियों की स्कूल में उपस्थिति बढ़ी, महिला वोट बैंक नीतीश के साथ जुड़ी और बिहार की राजनीति में महिला मुद्दे मजबूत हुए.उसके बाद नीतीश कुमार ने अधिकार यात्रा (2011–2012) की.  यह यात्रा सामाजिक न्याय और अधिकारों के मुद्दों पर केंद्रित थी. इस यात्रा का उद्देश महादलित, पिछड़े और गरीब वर्गों से संवाद था  और  सरकारी योजनाओं की पहुंच को दिखाना. इस यात्रा से सामाजिक समूहों में सरकार की स्वीकार्यता बढ़ी और राजनीतिक तौर पर नीतीश की “समावेशी नेता” की छवि मजबूत हुई.

नशामुक्ति और समाज सुधार अभियान यात्रा (2015–2017)

शराबबंदी लागू होने के बाद नीतीश कुमार ने नशामुक्ति और समाज सुधार को लेकर कई यात्राएं और सभाएं कीं. वो शराबबंदी के समर्थन में माहौल बनाना चाहते थे और साथ ही दहेज और बाल विवाह के खिलाफ जागरूकता पैदा करना. इस यात्रा का असर ये हुआ की शराबबंदी ज़मीन पर मजबूती से लागू हुई और पूरे तौर पे इसे महिलाओं का समर्थन मिला . हालांकि बाद में सरकार को  अवैध शराब और तस्करी की समस्या से जूझना पड़ा और इसके ज़मीनी क्रियान्वयन में कठिनाइयां  का आमना करना पड़ा.

समीक्षा यात्रा  (2018)

इस चरण में यात्राएं ज़्यादा प्रशासनिक रहीं. इसका उद्येश जिलों की योजनाओं की समीक्षा और अफसरों की जवाबदेही तय करना था. इस यात्रा के चलते अफसरशाही पर दबाव बढ़ा और सरकारी योजनाओं में सुधार हुआ लेकिन जनता में उत्साह सीमित ही रहा.

जल-जीवन-हरियाली यात्रा (2019–2020)

यह यात्रा बिहार की राजनीति में एक अलग तरह का प्रयोग थी. मकसद था जल संरक्षण, पर्यावरण और हरियाली को बढ़ावा देना और जलवायु परिवर्तन पर चर्चा को नया आयाम देना. इसका सीधा असर तालाबों का जीर्णोद्धार और सरकारी योजनाओं में पर्यावरण को जगह    के तौर पे देखा गया.  प्रशासनिक तौर पे इसकी सराहना तो हुई लेकिन चुनावी उत्साह कम दिखा.

समाज सुधार अभियान यात्रा (2021–2022)

इसमें सामाजिक मुद्दों पर ज़ोर रहा. इसमें नशामुक्ति, महिला सुरक्षा और सामाजिक चेतना जैसे मुद्दे उठाए गए. समाधान यात्रा (2023–2024) यह सबसे ज़्यादा चर्चित हालिया यात्रा थी.यह यात्रा सीधे जन-शिकायतों पर केंद्रित रही. नीतीश कुमार ने कोसिश की जनता की समस्याएं सीधी सूनी जाए , अधिकारियों को मौके पर निर्देश दिया जाये और सरकार की सक्रियता दिखे.  इस यात्रा से कई शिकायतों का तत्काल निपटारा हुआ और डीएम-एसपी पर सीधा दबाव पड़ा. अगर इन यात्राओं के राजनीतिक असर की बात करे तो उसका असर समय के साथ बदलता रहा. 2005–2010 में इसका जबरदस्त राजनीतिक लाभ मिला, “सुशासन बाबू” की छवि मजबूत हुई और विकास और कानून-व्यवस्था पर लोगो का भरोसा बढ़ा.नीतीश कुमार के पूरे कार्यकाल में यात्राओं ने बिहार की राजनीति में विकास को मुख्य मुद्दा बनाया, जाति की राजनीति से हटकर प्रशासनिक सवाल खड़े किए और मुख्यमंत्री को ज़मीनी नेता के रूप में स्थापित किया. लेकिन अगर इसे आज के संदर्भ में देखें तो इन यात्राओं का क्या मतलब है. क्यों वो एक बार खरमास खत्म होते ही यात्रा पर निकल गए है. इसका मतलब सिर्फ जनता से मिलना नहीं है बल्कि यह एक संदेश भी देना है की सरकार सक्रिय है, प्रशासन पर नियंत्रण है और राजनीति अभी भी ज़मीन से जुड़ी है. बिहार में यात्रा की राजनीति को संस्थागत रूप देने का श्रेय अगर किसी को जाता है, तो वह नीतीश कुमार हैं. 

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