भारत-नेपाल शांति व मैत्री संधि ,1950 दोनों पड़ोसी देशों के बीच पारिवारिक और सांस्कृतिक सम्बन्ध का आधार है. लिहाज़ा कहा जाता है कि दोनों देशों के बीच रोटी-बेटी का सम्बंध है, जो काफी हद तक सच भी है. लेकिन, नेपाल में सत्ता की बागडोर बालेन शाह के हाथों में आने के बाद जो राजनीतिक फैसले नेपाल में लिए जा रहे हैं, उससे 'रोटी' के सम्बंध पर आशंका के बादल मंडराने लगे हैं. नेपाल सरकार ने भारत-नेपाल सीमा पर नए भंसार (सीमा कर/भंसार ड्यूटी) नियम को लागू कर दिया है, जिससे दोनों देश की सीमा पर स्थित दुकानदारों के सामने आर्थिक-संकट खड़ा हो गया है और इसका विरोध भी हो रहा है. दूसरी ओर अब तक 'बेटी' का सम्बंध यथावत है.
नेपाल की 'बेटी' को सम्मान देने की कवायद
अहम बात यह है कि ठीक इसी दौर में पूर्णिया के जिलाधिकारी ने एक पत्र जारी कर कहा है कि भारत में विवाह कर आने वाली नेपाली मूल की महिलाओं को प्रखण्ड मुख्यालयों में कैम्प लगाकर सुलभ तरीके से भारतीय नागरिकता दी जाएगी, जिसके लिए एक कमिटी का गठन किया गया है. दरअसल, नागरिकता प्राप्त करने की प्रक्रिया थोड़ी जटिल होती है और इस कवायद का उद्देश्य प्रक्रिया को आसान बनाना है. इस प्रकार, नेपाल से ब्याह कर आई बहुओं के रिश्ते को अब आसान तरीके से कानूनी वरमाला पहनाई जाएगी.
भारत नेपाल के बीच हुई संधि में कुल 10 अनुच्छेद हैं, जो रोटी-बेटी के रिश्ते की स्पष्ट व्याख्या करता है.
- अनुच्छेद 1-4 -दोनों देश एक दूसरे की शांति, मैत्री और संप्रभुता का सम्मान करेंगे और कोई सैन्य हमला नही होगा।
- अनुच्छेद 5- खुली सीमा पर बस्तुओं और यात्रियों की मुक्त आबाजही सुनिचित होगी.
- अनुच्छेद 6-7 -दोनों देश के नागरिकों को निवास, संपत्ति खरीदने और व्यापार तथा रोजगार के समान अधिकार मिलेंगे.
भारत-नेपाल की खुली सीमा और भौगौलिक स्थिति रोटी-बेटी के सम्बंध को पुख्ता करती रही है. दोनों देश को महज 12 फीट चौड़ा नो मेंस लैंड विभाजित करता है, जहां पिलर गड़ा हुआ है. हालांकि, नेपाल के कुछ राजनीतिक दलों द्वारा समय-समय पर इस संधि को रद्द करने की मांग भी होती रही है. वर्ष 2014 में जब भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नेपाल के दौरे पर गए थे तो संधि के समीक्षा को लेकर भी चर्चा हुई थी.
नेपाली महिलाओं को कैसे मिलती है नागरिकता
नेपाल की महिलाएं, जिन्होंने भारतीय पुरुष से विवाह किया है, उन्हें भारतीय नागरिकता अधिनियम 1955 के तहत पंजीकरण के माध्यम से नागरिकता प्रदान की जाती है. इसमें शर्त यह है कि शादी वैध रूप से भारतीय नागरिक से होना चाहिए. इसके अलावा उक्त महिला को शादी के बाद भारत में न्यूनतम 07 वर्षों तक निवास करना होगा. इसके अलावा कुछ अन्य कागजात की जरूरत होती है. इन अहर्ताओं को पूरा करने पर डीएम/एसडीएम के स्तर पर जांच-पड़ताल और पुलिस वेरिफिकेशन के बाद नागरिकता प्रदान कर दी जाती है.
बताया जाता है कि नागरिकता प्राप्त करने की प्रक्रिया थोड़ी दुरूह और दस्तावेजों की कमी की वजह से कुछ लोग इस प्रकिया को पूरी नहीं करते हैं और नागरिकता से वंचित रह जाते हैं. नागरिकता के अभाव में वे मतदान के अधिकार से वंचित तो होते ही हैं. सरकारी नौकरी और अन्य कल्याणकारी सुविधाओं से भी महरूम हो जाते हैं. इसी समस्या को दूर करने के लिए पूर्णियां के जिलाधिकारी ने नागरिकता से जुड़ी एक उच्चस्तरीय कमिटी अपर समाहर्ता की अध्यक्षता में गठित किया है, जिसके सदस्य अपर पुलिस अधीक्षक, उपनिर्वाचन पदाधिकारी, सभी निबंधन पदाधिकारी और सभी बीडीओ बनाए गए हैं. कमिटी के अध्यक्ष अपर समाहर्ता राजकुमार चौधरी कहते हैं कि यह कमिटी सभी प्रखंडों में कैम्प का आयोजन कर नेपाल से ब्याह कर आई महिलाओं को नागरिकता प्राप्त करने के लिए आवश्यक कागजात उपलब्ध कराने में मदद करेगी. इसका उद्देश्य नागरिकता सम्बन्धी आवेदन की प्रक्रिया को सुगमता प्रदान करना है.
नेपाली सरकार के भंसार ने बिगाड़ा खेल
भारत-नेपाल सीमा पर नो मेंस लैंड के दोनों तरफ हजारों की संख्या में दुकानें हैं, जहां दोनों देश के लोग बेरोकटोक खरीदारी करते हैं. जो मैत्री संधि का हिस्सा भी है. इसके माध्यम से दोनों देश के लाखों लोगों की रोजी-रोटी चलती है, लेकिन 15 अप्रैल को नेपाल की सरकार ने भंसार (कस्टम ड्यूटी) का नया नियम लागू कर दिया है, जिसके तहत भारतीय मूल्य के 100 रु से अधिक के समान पर अब कस्टम ड्यूटी लगेगी जो पूर्व में नही लगती थी. यह नियम दोनों देशों में होने वाली खरीददारी पर लागू होगा. मिली जानकारी अनुसार, इस तरह की खरीदारी पर यह टैक्स 5%से लेकर 80 %तक बताया जाता है. जाहिर है दोनों देश में बाहरी लोगों के लिए खरीदारी अत्यधिक महंगी होगी.
नेपाल का तर्क है कि इससे नेपाल के घरेलू उत्पाद को बढ़ावा मिलेगा और कर-चोरी पर अंकुश के साथ-साथ सीमा पर अनियमित व्यापार पर रोक लग सकेगी. जबकि, नो मेंस लैंड के दोनों तरफ के लाखों छोटे दुकानदारों का 80 फीसदी व्यापार एक दूसरे पर निर्भर है. इसका असर भी दिखने लगा है. खासकर भारत के सीमावर्ती बाजारों में वीरानगी दिखने लगी है. रोटी के इस संकट का असर आने वाले दिनों में बेटी के रिश्ते पर दिखने लगे तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए. सामाजिक कार्यकता विकास आनंद कहते हैं, "नेपाल का यह भंसार नियम भारत-नेपाल संधि 1950 की मूल भावना के खिलाफ है. भारत के सीमावर्ती कारोबारियों की आर्थिक कमर टूटना तय है. ऐसे में भारत सरकार को इस मामले में हस्तक्षेप कर कोई बीच का हल निकालना चाहिए."
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