- समस्तीपुर के कारोबारी प्रदीप सेठ के बेटे आलोक की शादी में पारंपरिक बैलगाड़ियों पर सवार होकर बारात निकली
- बारात में करीब 22 सजाई गई बैलगाड़ियां दो किलोमीटर का सफर तय कर मथुरापुर गजराज पैलेस पहुचीं.
- शादी में न तो लग्जरी कारें थीं और न डीजे, बल्कि लोकगीतों के साथ प्रदूषण-मुक्त माहौल बनाया गया था
आजकल के जमाने में शादियां इतनी राजसी ठाठ-बाट से होती हैं कि जीवनभर की कमाई एक पल में खत्म हो जाए. बारात में भी बहुत शोबाजी देखने को मिलती है. तेज गानों पर नाच-गाना और शोर शराबा ही अब बारातों की पहचान बन गया है. दूल्हे अब लग्जरी और विंटेज गाड़ियों में बैठकर वेडिंग वेन्यू तक पहुंचते हैं. बाराती भी बड़ी-बड़ी गाड़ियों में सवार होते हैं. लेकिन इस सब शोबाजी के बीच बिहार के समस्तीपुर में की एक शादी चर्चा का विषय बनी हुई है. खास बात यह है कि शादी में न ही लग्जरी गाड़ियां थीं और न ही डीजे की धुन, फिर भी शादी बहुत ही शाही अंदाज में संपन्न हुई.
ये भी पढ़ें- जिस दुल्हन को सिरफिरे ने मारी गोली, लौट गई उसकी बारात.. कहा-'पहले पता होता तो नहीं आते'
शहर की भागदौड़ भरी जिंदगी में अचानक ठहराव सा आ गया, जब गोला रोड स्थित एक होटल के बाहर बारात निकली. लोग पहले तो हैरान हुए, फिर मुस्कुराए. वजह थी न डीजे, न आतिशबाजी, न चमचमाती कारों की लाइन. इसके बजाय सजी-धजी बैलगाड़ियों का लंबा काफिला सड़क पर धीरे-धीरे बढ़ रहा था. मौका था शहर के चर्चित कारोबारी प्रदीप सेठ के बेटे आलोक की शादी का, जिन्होंने परंपरा को आधुनिकता पर तरजीह दी.

बारात जैसे ही होटल से निकली, राहगीरों की नजरें ठहर गईं. लकड़ी की बैलगाड़ियों की मद्धिम चरमराहट और लोकगीतों की तान के बीच दूल्हा रथ पर सवार था. सिर पर सेहरा, चेहरे पर सादगी और अंदाज पूरी तरह देसी. करीब 22 बैलगाड़ियों का यह कारवां दो किलोमीटर का सफर तय कर मथुरापुर स्थित गजराज पैलेस पहुंचा. इस दौरान सड़क के दोनों ओर लोग मोबाइल से तस्वीरें और वीडियो बनाते नजर आए. कुछ ने इसे पुराने दौर की वापसी कहा, तो कुछ ने इसे “पर्यावरण के प्रति जागरूकता का संदेश” बताया.

इस अनोखी बारात की खासियत केवल बैलगाड़ी नहीं थी, बल्कि उसका उद्देश्य भी था. आयोजन से जुड़े पशुप्रेमी महेंद्र प्रधान ने बताया कि आसपास के गांवों से 35 जोड़ी बैलगाड़ियां मंगाई गई थीं. सभी को पारंपरिक ढंग से सजाया गया. खास मेहमानों के लिए कुछ गाड़ियों पर सोफा सेट लगाए गए थे, जबकि अन्य में गद्दों की व्यवस्था की गई थी. पूरी बारात प्रदूषण-मुक्त रही, न धुएं का गुबार, न कानफोड़ू शोर. बैलों की सधी चाल, फूलों की खुशबू और लोकधुनों ने माहौल को पूरी तरह ग्रामीण रंग में रंग दिया.

शहर की सड़कों पर ऐसा दृश्य कम ही देखने को मिलता है, जहां उत्सव और पर्यावरण साथ-साथ चलें. दूल्हा आलोक ने कहा कि वह अपनी शादी को खास बनाना चाहते थे, लेकिन यह इतनी चर्चित हो जाएगी, इसकी कल्पना नहीं थी. शोर-शराबे और दिखावे के इस दौर में यह देसी थीम वाली बारात एक अलग मिसाल बन गई, जहां सादगी भी भव्य लग सकती है और परंपरा भी आकर्षण का केंद्र बन सकती है.
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं