- बिहार कैबिनेट ने मंत्रियों और वरिष्ठ अधिकारियों को दो-दो सरकारी आवास देने के फैसले को मंजूरी दी है
- सरकार का तर्क है कि अलग-अलग जिम्मेदारियों के लिए एक आवास निजी और दूसरा कार्यालय या अतिथियों के लिए होगा
- विपक्ष खासकर राजद ने इस फैसले को महंगाई और बेरोजगारी के बीच नेताओं की विलासिता बताया है
बिहार में एक बार फिर कैबिनेट के फैसले को लेकर सियासत तेज हो गई है. हाल ही में हुई कैबिनेट बैठक में यह फैसला लिया गया है कि मंत्रियों और कुछ वरिष्ठ पदाधिकारियों और वरिष्ठ सदस्यों को दो-दो सरकारी आवास दिए जा सकेंगे. सरकार का कहना है कि यह फैसला प्रशासनिक ज़रूरतों और कामकाज की सुविधा को ध्यान में रखकर लिया गया है. वहीं, विपक्ष खासकर राष्ट्रीय जनता दल ने इस फैसले का कड़ा विरोध किया है. राजद का आरोप है कि जब आम जनता महंगाई और बेरोज़गारी से जूझ रही है, तब सरकार नेताओं की सुविधाएं बढ़ाने में लगी है.
मंत्रियों को दो सरकारी आवास देने पर बवाल
कैबिनेट के इस फैसले के तहत मंत्रियों और कुछ वरिष्ठ सदस्यों को एक के बजाय दो सरकारी आवास आवंटित किए जा सकेंगे. सरकार के मुताबिक, कई मंत्री ऐसे हैं जिनके पास अलग-अलग जिम्मेदारियां हैं. उन्हें एक आवास निजी निवास के रूप में और दूसरा आवास कार्यालय या अतिथियों से मिलने के लिए इस्तेमाल करने की सुविधा दी जाएगी. सरकार का तर्क है कि इससे कामकाज में आसानी होगी और सुरक्षा व प्रोटोकॉल के मामलों में भी सहूलियत मिलेगी.
सरकार से जुड़े लोगों का ये दावा है कि यह फैसला किसी विशेष व्यक्ति के लिए नहीं, बल्कि व्यवस्था को सुचारू बनाने के लिए लिया गया है. मंत्रियों को दिनभर बैठकों, अधिकारियों से मुलाकात और जनप्रतिनिधियों से संवाद करना होता है. ऐसे में एक ही आवास में सब कुछ संभालना कई बार मुश्किल हो जाता है. सरकार यह भी कह रही है कि इससे सरकारी कामकाज प्रभावित नहीं होगा, खर्च सीमित दायरे में रहेगा और पहले से उपलब्ध संसाधनों का ही उपयोग किया जाएगा. सत्ताधारी पक्ष का ये मानना है कि विपक्ष इस मुद्दे को बेवजह राजनीतिक रंग दे रहा है.
सरकार का नेताओं की सुविधाओं पर ध्यान
वही राजद ने इसे विलासिता का फैसला बताया है. उनका कहना है कि राज्य में कई परिवार आज भी पक्के घर से वंचित हैं, युवाओं को नौकरी नहीं मिल रही और किसान और मज़दूर महंगाई से परेशान हैं. ऐसे समय में मंत्रियों को दो-दो सरकारी आवास देना जनता के साथ अन्याय है. राजद का आरोप है कि सरकार जनता की समस्याओं से ध्यान हटाकर अपने नेताओं की सुविधाओं पर ध्यान दे रही है.
राजद के साथ-साथ विपक्ष के कुछ अन्य नेताओं ने भी सवाल उठाए हैं कि क्या मौजूदा हालात में यह फैसला ज़रूरी था ? क्या इससे सरकारी खर्च नहीं बढ़ेगा. क्या आम जनता को इससे कोई फायदा होगा. विपक्ष का कहना है कि सरकार को पहले शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए था.
बिहार NDA का विपक्ष पर आरोप
सत्ताधारी दल के नेताओं ने विपक्ष के आरोपों को एक सिरे से खारिज करते हुए कहा कि यह फैसला पूरी तरह प्रशासनिक है, इसका राजनीति से कोई लेना-देना नहीं और विपक्ष हर मुद्दे पर सरकार को घेरने की कोशिश करता है, बिना उस मुद्दे के तह में गए. सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे को लेकर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं.
बिहार की राजनीति में यह पहली बार नहीं है जब सरकारी आवास और सुविधाओं को लेकर विवाद हुआ हो. इससे पहले भी बंगलों के आकार, सरकारी गाड़ियों और सुरक्षा व्यवस्था जैसे मुद्दों पर सियासत होती रही है. हर बार सरकार इसे प्रशासनिक ज़रूरत बताती है, जबकि विपक्ष इसे जनता के पैसे की बर्बादी करार देता है.
राजनीतिक जानकार क्या कह रहे?
राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, यह विवाद सिर्फ आवास तक सीमित नहीं है. इसके पीछे राजनीतिक संदेश भी छिपा है. सत्ताधारी दल अपनी मजबूती और नियंत्रण दिखाना चाहता है वही विपक्ष जनता के मुद्दों को सामने रखकर सरकार को घेरना चाहता है. इस फैसले के बाद सरकार पर दबाव बढ़ सकता है कि वह खर्च का पूरा ब्योरा सार्वजनिक करे और यह स्पष्ट करे कि किन-किन लोगों को दो आवास मिलेंगे और इससे सरकारी खजाने पर कितना बोझ पड़ेगा. अगर सरकार इन सवालों का साफ जवाब नहीं देती, तो विपक्ष इसे बड़ा मुद्दा बना सकता है.
कुल मिलाकर, मंत्रियों और वरिष्ठ सदस्यों को दो-दो आवास देने का कैबिनेट फैसला सिर्फ प्रशासनिक नहीं, बल्कि राजनीतिक मुद्दा बन चुका है. सरकार इसे कामकाज की सुविधा बता रही है, जबकि विपक्ष इसे जनता के साथ अन्याय करार दे रहा है. फिलहाल इतना तय है कि बिहार की राजनीति में यह मुद्दा अभी कुछ समय तक गरमाया रहेगा.
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