गुलबर्ग सोसायटी में खंडहर बन चुका एक मकान (फाइल फोटो)
अहमदाबाद:
गुलबर्ग सोसायटी बर्बर हत्याकांड का फैसला आने के बावजूद इस बसाहट में जिंदगी नहीं लौट रही है। गुलबर्ग सोसायटी 28 फरवरी 2002 को हुए हत्याकांड के बाद से ही खंडहर बनी हुई है। सभी लोग यह सोसायटी छोड़कर अलग-अलग जगह रहने चले गए हैं। ज्यादातर लोग उस वक्त भी ठीकठाक हैसियत वाले थे, सो कहीं और रहने लगे हैं। कई लोग अपना घर गुलबर्ग में होते हुए भी कहीं और किराये के मकानों में रह रहे हैं।
खाली पड़े हैं सोसायटी के मकान
गुलबर्ग आज भी भयावह लगता है। सिर्फ गुलबर्ग के एक घर में, जो कि मुख्य सड़क पर है, कासम मंसूरी रहने आए थे। लेकिन उस घर में भी फिलहाल ताला लगा है। वे भी फैसले के वक्त से ही यहां से कहीं और चले गए हैं। गुलबर्ग में अब सिर्फ आसपास के बैंड बाजा वाले अपनी गाड़ियां रखने को इस्तेमाल करते हैं। नई बनी मस्जिद के बाहर पक्षियों की प्यास बुझाने के लिए पानी के मटके लटकाए गए हैं। लेकिन कोई पुराना वाशिंदा यहां रहने के लिए नहीं आना चाहता। फैसला आने के बाद भी किसी में अपने घर में वापस रहने के लिए आने की हिम्मत नहीं हो रही है।
दस परिजन को खोने वाले पठान नहीं जुटा पा रहे वापसी की हिम्मत
हमने ऐसे कुछ लोगों से बात की जिनका अच्छा खासा घर गुलबर्ग में है, लेकिन इसके बावजूद वे वापस नहीं आना चाहते। सईद पठान अब बुढ़ापे में अहमदाबाद के जुहापुरा के अपने दो कमरों के घर में रहते हैं और खुद ही अपना खाना पकाते हैं। बुढ़ापा अब उनके चेहरे पर झलकने लगा है। वे गुलबर्ग सोसायटी हत्याकांड के प्रत्यक्षदर्शी और भुक्तभोगी हैं। 28 फरवरी 2002 को हुए हत्याकांड में गुलबर्ग सोसायटी के उनके 12 कमरों के घर में परिवार के 10 लोग मारे गए थे। अब तक किराये के मकान में रहते थे, लेकिन इतने सालों की मेहनत से इतना जुगाड़ हो गया कि डेढ़ साल पहले जुहापुरा में दो कमरों का एक घर ले लिया है।
सईद पठान का गुलबर्ग का घर अब भी वहीं है, लेकिन वे फैसले के बाद भी वहां जाना नहीं चाहते। उन्हें वहां जाना सुरक्षित नहीं लगता। उन्हें यह भी लगता है कि फैसले में छूट गए लोग आने वाले समय में फिर से हमला कर सकते हैं। उन्हें फैसले के बाद भी न्याय मिलने का एहसास नहीं है। उन्हें लगता है एसआईटी ने पूरी ईमानदारी से काम नहीं किया इसलिए वे ज्यादा लोगों को सजा नहीं दिलवा पाए।
छूट गए लोगों के रंजिश पालने की आशंका
मोहम्मद शरीफ शेख फिर से फ्रिज और टीवी बेचने का कारोबार कर रहे हैं। दंगों के वक्त एहसान जाफरी गुलबर्ग सोसायटी के चेयरमेन और शेख सेक्रेटरी थे। वे भी बड़ी मुश्किल से उस दिन बचे थे लेकिन उन्होंने भी उस दिन अपनी पत्नी और दो बेटियां खोईं। गुलबर्ग सोसायटी के बाहर उनकी तीन दुकानें भी थीं। वे टीवी बेचने का ही व्यवसाय करते थे। गुलबर्ग में उनकी एक करोड़ से ज्यादा की सम्पत्ति है फिर भी उन्हें नहीं लगता कि वे कभी दुबारा वहां रहने जाएंगे।
कोर्ट ने भले ही माना कि वह हत्याकांड किसी साजिश के तहत नहीं हुआ, लेकिन शरीफ शेख मानने को तैयार नहीं हैं। वह मंजर अब भी उनकी आंखों के सामने है। वे कहते हैं कि अगर साजिश नहीं होती तो इतना पेट्रोल कहां से आता... इतना डीजल कहां से आता... इतना केरोसिन कहां से आता...इतने हथियार, पाइप, इतनी तलवारें कहां से आतीं। यहां तक की गैस की बोतलें तक लोगों ने ब्लास्ट की थीं... जिन्हें फोड़ने के लिए भी ट्रेनिंग चाहिए। उन्हें भी लगता है, जो लोग छूट गए हैं उनके मन में कहीं न कहीं रंजिश का भाव जरूर रहेगा। इसलिए उन्हें अब भी डर है और वह रहने नहीं जाना चाहते।
आवासीय सोसायटी के खंडहर बने रहने की नियति
ज्यादातर लोगों की हालत यही है। कोई दोबारा गुलबर्ग में रहने नहीं जाना चाहता। एक समस्या यह भी है कि कुछ लोग घर बेचना चाहते हैं, कुछ नहीं। लेकिन यहां डिस्टर्ब एरिया कानून लागू है इसलिए मुस्लिम किसी हिन्दू को मकान बेच नहीं सकते और कोई मुस्लिम डर के मारे रहने आना नहीं चाहता। लगता है गुलबर्ग सोसायटी के खंडहर ऐसे ही रह जाएंगे, 2002 के दंगों की बर्बरता की निशानियों की खौफनाक कहानी कहने के लिए।
खाली पड़े हैं सोसायटी के मकान
गुलबर्ग आज भी भयावह लगता है। सिर्फ गुलबर्ग के एक घर में, जो कि मुख्य सड़क पर है, कासम मंसूरी रहने आए थे। लेकिन उस घर में भी फिलहाल ताला लगा है। वे भी फैसले के वक्त से ही यहां से कहीं और चले गए हैं। गुलबर्ग में अब सिर्फ आसपास के बैंड बाजा वाले अपनी गाड़ियां रखने को इस्तेमाल करते हैं। नई बनी मस्जिद के बाहर पक्षियों की प्यास बुझाने के लिए पानी के मटके लटकाए गए हैं। लेकिन कोई पुराना वाशिंदा यहां रहने के लिए नहीं आना चाहता। फैसला आने के बाद भी किसी में अपने घर में वापस रहने के लिए आने की हिम्मत नहीं हो रही है।
दस परिजन को खोने वाले पठान नहीं जुटा पा रहे वापसी की हिम्मत
हमने ऐसे कुछ लोगों से बात की जिनका अच्छा खासा घर गुलबर्ग में है, लेकिन इसके बावजूद वे वापस नहीं आना चाहते। सईद पठान अब बुढ़ापे में अहमदाबाद के जुहापुरा के अपने दो कमरों के घर में रहते हैं और खुद ही अपना खाना पकाते हैं। बुढ़ापा अब उनके चेहरे पर झलकने लगा है। वे गुलबर्ग सोसायटी हत्याकांड के प्रत्यक्षदर्शी और भुक्तभोगी हैं। 28 फरवरी 2002 को हुए हत्याकांड में गुलबर्ग सोसायटी के उनके 12 कमरों के घर में परिवार के 10 लोग मारे गए थे। अब तक किराये के मकान में रहते थे, लेकिन इतने सालों की मेहनत से इतना जुगाड़ हो गया कि डेढ़ साल पहले जुहापुरा में दो कमरों का एक घर ले लिया है।
सईद पठान का गुलबर्ग का घर अब भी वहीं है, लेकिन वे फैसले के बाद भी वहां जाना नहीं चाहते। उन्हें वहां जाना सुरक्षित नहीं लगता। उन्हें यह भी लगता है कि फैसले में छूट गए लोग आने वाले समय में फिर से हमला कर सकते हैं। उन्हें फैसले के बाद भी न्याय मिलने का एहसास नहीं है। उन्हें लगता है एसआईटी ने पूरी ईमानदारी से काम नहीं किया इसलिए वे ज्यादा लोगों को सजा नहीं दिलवा पाए।
छूट गए लोगों के रंजिश पालने की आशंका
मोहम्मद शरीफ शेख फिर से फ्रिज और टीवी बेचने का कारोबार कर रहे हैं। दंगों के वक्त एहसान जाफरी गुलबर्ग सोसायटी के चेयरमेन और शेख सेक्रेटरी थे। वे भी बड़ी मुश्किल से उस दिन बचे थे लेकिन उन्होंने भी उस दिन अपनी पत्नी और दो बेटियां खोईं। गुलबर्ग सोसायटी के बाहर उनकी तीन दुकानें भी थीं। वे टीवी बेचने का ही व्यवसाय करते थे। गुलबर्ग में उनकी एक करोड़ से ज्यादा की सम्पत्ति है फिर भी उन्हें नहीं लगता कि वे कभी दुबारा वहां रहने जाएंगे।
कोर्ट ने भले ही माना कि वह हत्याकांड किसी साजिश के तहत नहीं हुआ, लेकिन शरीफ शेख मानने को तैयार नहीं हैं। वह मंजर अब भी उनकी आंखों के सामने है। वे कहते हैं कि अगर साजिश नहीं होती तो इतना पेट्रोल कहां से आता... इतना डीजल कहां से आता... इतना केरोसिन कहां से आता...इतने हथियार, पाइप, इतनी तलवारें कहां से आतीं। यहां तक की गैस की बोतलें तक लोगों ने ब्लास्ट की थीं... जिन्हें फोड़ने के लिए भी ट्रेनिंग चाहिए। उन्हें भी लगता है, जो लोग छूट गए हैं उनके मन में कहीं न कहीं रंजिश का भाव जरूर रहेगा। इसलिए उन्हें अब भी डर है और वह रहने नहीं जाना चाहते।
आवासीय सोसायटी के खंडहर बने रहने की नियति
ज्यादातर लोगों की हालत यही है। कोई दोबारा गुलबर्ग में रहने नहीं जाना चाहता। एक समस्या यह भी है कि कुछ लोग घर बेचना चाहते हैं, कुछ नहीं। लेकिन यहां डिस्टर्ब एरिया कानून लागू है इसलिए मुस्लिम किसी हिन्दू को मकान बेच नहीं सकते और कोई मुस्लिम डर के मारे रहने आना नहीं चाहता। लगता है गुलबर्ग सोसायटी के खंडहर ऐसे ही रह जाएंगे, 2002 के दंगों की बर्बरता की निशानियों की खौफनाक कहानी कहने के लिए।
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