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नेपाल में भारतीय टूरिस्टों को मिलेगी सस्ती फ्लाइट, पर अपनी ही जनता के लिए डबल हो जाएगा टिकट!

नेपाल टूरिज्म बोर्ड के जून 2026 के आंकड़ों के अनुसार, हवाई मार्ग से नेपाल पहुंचने वाले विदेशी पर्यटकों में सबसे बड़ी संख्या भारतीयों की है. जून महीने में कुल 91,363 विदेशी पर्यटक नेपाल पहुंचे, जिनमें से अकेले 41,809 भारतीय थे. पिछले साल के मुकाबले यह 28% ज्यादा हैं.

नेपाल में भारतीय टूरिस्टों को मिलेगी सस्ती फ्लाइट, पर अपनी ही जनता के लिए डबल हो जाएगा टिकट!
नेपाल का 'डॉलर फेयर' विवाद, पर्यटकों को राहत देने की योजना का एयरलाइंस कर रही हैं विरोध. (सांकेतिक तस्वीर)

Nepal Flight Tickets Price: नेपाल सरकार एक ऐसी योजना पर विचार कर रही है जिससे विदेशी पर्यटकों के लिए वहां की डोमेस्टिक उड़ानों का टिकट काफी सस्ता हो जाएगा. सुनने में यह खबर जितनी शानदार है, नेपाल की स्थानीय जनता और एयरलाइन कंपनियों के लिए यह उतनी ही बड़ी मुसीबत बन गई है. स्थिति यह है कि अगर विदेशियों के लिए टिकट सस्ते किए गए, तो खुद नेपाल के नागरिकों के लिए हवाई सफर करना दोगुना महंगा हो जाएगा. आइए आसान भाषा में समझते हैं कि पूरा मामला क्या है.

क्या है नेपाल का 'डॉलर फेयर' सिस्टम?

नेपाल में 1970 के दशक से ही उड़ानों के लिए एक दोहरी किराया प्रणाली (Two-Tier Airfare System) लागू है. इसके तहत, नेपाल के स्थानीय नागरिकों को टिकट के पैसे नेपाली रुपयों में देने होते हैं, जो काफी सस्ते होते हैं. जबकि भारत समेत अन्य देशों से आने वाले विदेशी पर्यटकों को उसी सीट के लिए अमेरिकी डॉलर में पेमेंट करना होता है. यह 'डॉलर फेयर' स्थानीय टिकट के मुकाबले दो से तीन गुना (या उससे भी अधिक) महंगा होता है.

उदाहरण के लिए, काठमांडू से एवरेस्ट के बेस 'लुकला' जाने के लिए एक विदेशी टूरिस्ट को करीब $250 (लगभग 24,000 रुपये) देने पड़ते हैं, जबकि एक नेपाली नागरिक के लिए यही टिकट सिर्फ $80 (लगभग 7,694 रुपये) का होता है.

सरकार ने क्या योजना बनाई?

अप्रैल 2026 में, नेपाल के संस्कृति, पर्यटन और नागरिक उड्डयन मंत्री खड़क राज पौडेल ने घोषणा की थी कि वे इस महंगे 'डॉलर फेयर' को खत्म करेंगे, ताकि पर्यटन को बढ़ावा मिले. योजना थी कि शुरुआत में कम देखे जाने वाले इलाकों (जैसे रारा, शे फोक्सुंडो झील और खप्तड़ नेशनल पार्क) के लिए किराया एक समान किया जाएगा और बाद में इसे पूरे देश में लागू कर दिया जाएगा. हालांकि, हाल ही में ईरान-अमेरिका विवाद के कारण पैदा हुए ईंधन संकट की वजह से फिलहाल इस योजना को रोक दिया गया है.

एयरलाइंस क्यों कर रही हैं इस फैसले का विरोध?

नेपाली मीडिया के E-Kantipur बिजनेस पोर्टल के मुताबिक, इस प्रस्ताव के आते ही नेपाल की एयरलाइन कंपनियों ने कड़ी आपत्ति जताई. उनका कहना है कि पर्यटकों को खुश करने का यह फैसला आर्थिक रूप से पूरी तरह 'अव्यावहारिक' है. एयरलाइंस ऑपरेटर्स एसोसिएशन ऑफ नेपाल के महासचिव मुरली धर जोशी के मुताबिक, 'विदेशी पर्यटकों से लिया जाने वाला भारी-भरकम किराया असल में उड़ानों का 'वास्तविक खर्च' है. विदेशी पर्यटकों से होने वाली इसी डॉलर की कमाई के दम पर एयरलाइंस नेपाली नागरिकों को सब्सिडी देती हैं, जिससे उनका टिकट सस्ता रहता है. अगर विदेशियों का किराया कम कर दिया गया, तो कंपनियों को नुकसान से बचने के लिए नेपालियों का किराया अचानक बहुत ज्यादा बढ़ाना पड़ेगा.'

बुद्धा एयर के मार्केटिंग डायरेक्टर रूपेश जोशी का कहना है कि एयरलाइंस को विमानों के मेंटेनेंस, इंश्योरेंस और लोन की किश्तें डॉलर में ही चुकानी पड़ती हैं. महंगे ईंधन के कारण नेपाल का घरेलू एविएशन मार्केट पहले ही 40% तक गिर चुका है. ऐसे में 'डॉलर फेयर' हटाना पूरी इंडस्ट्री को तबाह कर सकता है.

आम नेपाली जनता पर क्या होगा असर?

नेपाल जैसे देश में, जहां मजदूरों का न्यूनतम मासिक वेतन लगभग 12021 रुपये ($125) है, वहां सस्ती उड़ानें कोई लग्जरी नहीं बल्कि जरूरत हैं. नेपाल के कई दुर्गम पहाड़ी इलाकों में आज भी सड़कें नहीं हैं. वहां के लोगों के लिए अस्पताल पहुंचने, पढ़ाई करने या नौकरी पर जाने के लिए छोटी उड़ानें (STOL - शॉर्ट टेक-ऑफ एंड लैंडिंग) ही इकलौता सहारा हैं. अगर एक समान किराया नीति लागू होती है, तो आम नेपाली नागरिक के लिए हवाई सफर करना लगभग नामुमकिन हो जाएगा.

पर्यटकों के लिए नेपाल में सस्ती उड़ानों का सपना अभी अधर में है, क्योंकि सरकार, एयरलाइंस और स्थानीय जनता के हितों के बीच एक बड़ा टकराव खड़ा हो गया है. देखना यह है कि आने वाले समय में इसका क्या बीच का रास्ता निकाला जाता है.

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