भारत की सीमा से लगा नेपाल का तराई इलाका अभी सुलगा हुआ है. यहां की जमीन सांप्रदायिक हिंसा की आग में झुलस रही है. नेपाल के सुनसारी जिले में दो समुदायों के बीच हुए झगड़े के बाद शुरू हुई हिंसा ने पांव पसार लिया है, जिसके कारण कर्फ्यू लगाना पड़ा है. नए सिरे से विरोध-प्रदर्शन हुए और सुरक्षा बल तैनात करने पड़े. इस अशांति के दौरान पुलिस की फायरिंग में तीन लोगों की मौत हो गई, जबकि सुरक्षाकर्मियों समेत घायलों की संख्या लगातार बढ़ रही है. इन सबके बीच सवाल उठ रहा है कि आखिर यह हिंसा शुरू क्यों हुई और क्या इसे रोका जा सकता था? सवालों के घेरे में खुद पीएम बालेन शाह हैं, उनसे पूछा जा रहा है कि आप हाथ पर हाथ रखकर क्यों बैठे रहे?
नेपाल में क्यों भड़की हिंसा?
AFP की रिपोर्ट के अनुसार हिंसा रविवार देर रात सुनसारी जिले के देवांगंज ग्रामीण नगरपालिका के एक गांव में शुरू हुई, जो भारत की सीमा से लगा हुआ है. यह हिंसा एक हिंदू जुलूस के दौरान तेज आवाज में डीजे बजाने और धार्मिक झंडों के इस्तेमाल को लेकर हुई बहस के बाद भड़की. स्थानीय अधिकारी पोशन लामिछाने ने बताया कि भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिस को गोली चलानी पड़ी. पुलिस प्रवक्ता एबी नारायण काफ्ले के मुताबिक इस हिंसा में दो लोगों की मौत हो गई. अधिकारी इन मौतों की जांच कर रहे हैं और आगे की झड़पों को रोकने के लिए सुनसारी और आस-पास के जिलों में कर्फ्यू लगा दिया गया है. गुरुवार को पास के सिराहा जिले में एक प्रदर्शन के दौरान तीसरे व्यक्ति की मौत हो गई; यह प्रदर्शन उस समय हुआ जब वहां कर्फ्यू लागू था.
क्या बालेन सरकार ने बड़ी गलती की?
काठमांडू पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार सांप्रदायिक हिंसा को रोकने के लिए बालेन सरकार की तरफ से राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर देरी की गई और सुरक्षा विशेषज्ञों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, विपक्षी नेताओं और सांसदों ने इसकी कड़ी आलोचना की है. उनका कहना है कि संकट को रोकने के अहम मौके गंवा दिए गए, जिससे तनाव कई जिलों में फैल गया और पुलिस की गोलीबारी में तीन लोगों की मौत हो गई.
आलोचकों का कहना है कि पीएम बालेन शाह और नेपाल के गृह मंत्री सूडान गुरुंग समय पर राजनीतिक नेतृत्व देने में विफल रहे. मामले को संभालने के लिए ग्राउंड पर मौजूद दोनों समुदाय के स्टेकहोल्डर्स के साथ बातचीत को नजरअंदाज दिया और तनाव कम करने की जगह बंदूक-गोली के दम पर स्थिति संभालने की कोशिश की. भले हिंसा भड़कने के तुरंत बाद गृह मंत्री ने एक सुरक्षा बैठक बुलाई, लेकिन प्रधान मंत्री को नेपाल पुलिस और सशस्त्र पुलिस बल के प्रमुखों से तुरंत ब्रीफिंग भी नहीं मिली. घटना के चार दिन बाद ही उन्होंने यह मुलाकात की और पांचवें दिन गुरुवार को राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की बैठक बुलाई.
काठमांडू पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार नेपाल के नेशनल ह्यूमन राइट्स कमीशन की पूर्व सदस्य और वकील मोहना अंसारी ने कहा कि सरकार तालमेल बिठाने और संकट से निपटने, दोनों ही मामलों में नाकाम रही है. उनका सवाल है कि प्रधान मंत्री और गृह मंत्री ने सुनसारी घटना को शुरू से ही गंभीरता से क्यों नहीं लिया. उन्होंने तर्क दिया कि सिर्फ कर्फ्यू लगाने से जनता का भरोसा बहाल नहीं हो सकता.
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